फीफा का नया सबक: अब नाम नहीं, खेल जीतता है

-सुभाष मिश्रफुटबॉल को यूं ही दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल नहीं कहा जाता। यह केवल 90 मिनट का मुकाबला नहीं, बल्कि ...

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युद्ध का मौसम और मुनाफे की फसल

- सुभाष मिश्र'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ़ है, क्या मेरे हक़ में फैसला देगा?यह शेर आज की वैश्विक राजनीति पर विचित...

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पाठ्यक्रम का रंग नहीं, ज्ञान का स्तर बदलना चाहिए

-सुभाष मिश्रभारत की शिक्षा व्यवस्था का इतिहास केवल स्कूलों और किताबों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह देश की वैचारि...

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सिनेमा, सत्य और सेंसरशिप के बीच ‘सतलुज’ का सवाल

-सुभाष मिश्रकहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है, लेकिन आईना कभी पूरा समाज नहीं दिखाता। वह केवल वही दिखात...

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चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

-सुभाष मिश्र‘चोरी’ कभी अपराध मानी जाती थी, फिर वह आदत बनी, और अब ऐसा लगता है कि वह व्यवस्था का एक स्वीकृत व्यवहार बनती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस दौर में...

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ऊर्जा का भविष्य: विकल्पों की तलाश और एथेनॉल पर बहस

-सुभाष मिश्रदुनिया आज केवल आर्थिक या सामरिक संकट से नहीं, बल्कि ऊर्जा संकट की चुनौती से भी जूझ रही है। आधुनिक स...

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आखिर नागरिक कौन?

(नागरिकता का सवाल और भारत में सामाजिक संशय और राजीनिक द्वंद्व)-सुभाष मिश्र

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जीवन का सफर और अंतिम पड़ाव का अकेलापन

-सुभाष मिश्रकभी भारतीय समाज में विवाह को केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि जीवन भर का साथ माना जाता था। पति या पत्नी के चले जाने के बाद शेष जीवन यादों के सहारे ...

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शादी से मना करने की अपेक्षा हत्या आसान निर्णय

(प्रेम, विवाह और हत्या : बदलते समाज की भयावह कहानी)-सुभाष मिश्रह...

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हार की समीक्षा में अटका विपक्ष, अगले चुनाव की तैयारी में भाजपा

सुभाष मिश्रभारतीय राजनीति का स्वभाव तेजी से बदल रहा है। कभी देश की राजनीति पर लगभग एकछत्र प्रभाव रखने वाली कांग्रेस आज अपने अस्तित्व और पुनरुत्थान की चुनौती स...

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