पूजा स्थल में सुविधाओं के लिए दान

-सुभाष मिश्रयह बाजार का समय है और बाजार का एक सीधा-सा नियम है कि जिसके पास परचेजिंग पावर है, वह अपनी क्षमता के ...

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विरोध का सबसे शक्तिशाली अहिंसक हथियार—अनशन

-सुभाष मिश्रसत्ता के पास पुलिस होती है, प्रशासन होता है, कानून होता है, जेल होती है और आदेश देने की ताकत होती ह...

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नेता का अदृश्य होना : राजनीति में अनुपस्थिति भी एक संदेश बन जाती है

-सुभाष मिश्रराजनीति में कई बार शब्दों से ज़्यादा ख़ामोशी बोलती है। कई बार भाषण से ज़्यादा असर किसी नेता की अनुप...

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फीफा का नया सबक: अब नाम नहीं, खेल जीतता है

-सुभाष मिश्रफुटबॉल को यूं ही दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल नहीं कहा जाता। यह केवल 90 मिनट का मुकाबला नहीं, बल्कि ...

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युद्ध का मौसम और मुनाफे की फसल

- सुभाष मिश्र'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ़ है, क्या मेरे हक़ में फैसला देगा?यह शेर आज की वैश्विक राजनीति पर विचित...

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पाठ्यक्रम का रंग नहीं, ज्ञान का स्तर बदलना चाहिए

-सुभाष मिश्रभारत की शिक्षा व्यवस्था का इतिहास केवल स्कूलों और किताबों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह देश की वैचारि...

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सिनेमा, सत्य और सेंसरशिप के बीच ‘सतलुज’ का सवाल

-सुभाष मिश्रकहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है, लेकिन आईना कभी पूरा समाज नहीं दिखाता। वह केवल वही दिखात...

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चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

-सुभाष मिश्र‘चोरी’ कभी अपराध मानी जाती थी, फिर वह आदत बनी, और अब ऐसा लगता है कि वह व्यवस्था का एक स्वीकृत व्यवहार बनती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस दौर में...

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ऊर्जा का भविष्य: विकल्पों की तलाश और एथेनॉल पर बहस

-सुभाष मिश्रदुनिया आज केवल आर्थिक या सामरिक संकट से नहीं, बल्कि ऊर्जा संकट की चुनौती से भी जूझ रही है। आधुनिक स...

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आखिर नागरिक कौन?

(नागरिकता का सवाल और भारत में सामाजिक संशय और राजीनिक द्वंद्व)-सुभाष मिश्र

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