मानसून सत्र : टकराव की राजनीति या लोकतंत्र का अवसर?

-सुभाष मिश्रकभी भारतीय जनता पार्टी ने 'कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, लेकिन भारतीय राजनीति का वर्तमान परि...

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पूजा स्थल में सुविधाओं के लिए दान

-सुभाष मिश्रयह बाजार का समय है और बाजार का एक सीधा-सा नियम है कि जिसके पास परचेजिंग पावर है, वह अपनी क्षमता के ...

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विरोध का सबसे शक्तिशाली अहिंसक हथियार—अनशन

-सुभाष मिश्रसत्ता के पास पुलिस होती है, प्रशासन होता है, कानून होता है, जेल होती है और आदेश देने की ताकत होती ह...

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बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर छत्तीसगढ़

बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर छत्तीसगढ़

-सुभाष मिश्रछत्तीसगढ़ राज्य जब वर्ष 2000 में अस्तित्व में आया था, तब यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था, बल्कि एक नए विकास मॉडल की शुरुआत थी। छोटे राज्यों के ...

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नेता का अदृश्य होना : राजनीति में अनुपस्थिति भी एक संदेश बन जाती है

-सुभाष मिश्रराजनीति में कई बार शब्दों से ज़्यादा ख़ामोशी बोलती है। कई बार भाषण से ज़्यादा असर किसी नेता की अनुप...

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फीफा का नया सबक: अब नाम नहीं, खेल जीतता है

-सुभाष मिश्रफुटबॉल को यूं ही दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल नहीं कहा जाता। यह केवल 90 मिनट का मुकाबला नहीं, बल्कि ...

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आस्था की थाली में मिलावट का कलंक

-सुभाष मिश्रदेश अभी राम जन्मभूमि निर्माण के लिए हुए चंदे से जुड़े विवादों की चर्चा से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया...

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युद्ध का मौसम और मुनाफे की फसल

- सुभाष मिश्र'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ़ है, क्या मेरे हक़ में फैसला देगा?यह शेर आज की वैश्विक राजनीति पर विचित...

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पाठ्यक्रम का रंग नहीं, ज्ञान का स्तर बदलना चाहिए

-सुभाष मिश्रभारत की शिक्षा व्यवस्था का इतिहास केवल स्कूलों और किताबों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह देश की वैचारि...

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सिनेमा, सत्य और सेंसरशिप के बीच ‘सतलुज’ का सवाल

-सुभाष मिश्रकहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है, लेकिन आईना कभी पूरा समाज नहीं दिखाता। वह केवल वही दिखात...

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