-सुभाष मिश्र
क्रिकेट कभी अंग्रेजों के साथ भारत आया एक खेल था, लेकिन आज यह भारत में केवल खेल नहीं, बल्कि एक विशाल उद्योग, मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय माध्यम और करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा जुनून बन चुका है। जिस तरह अंग्रेजी भाषा, पहनावा और जीवनशैली ने भारतीय समाज में अपनी जगह बनाई, उसी तरह क्रिकेट ने भी भारतीय मानस में गहरी पैठ बना ली। समय के साथ इसके नियम, स्वरूप और प्रस्तुति बदलते गए और आज यह खेल ग्लैमर, पूंजी, तकनीक और मनोरंजन के ऐसे संगम में बदल चुका है, जिसकी मिसाल दुनिया में कम ही देखने को मिलती है।
एक समय था जब क्रिकेट पांच दिन के टेस्ट मैच तक सीमित था। फिर एकदिवसीय क्रिकेट आया, उसके बाद टी-20 और अब इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) ने क्रिकेट को पूरी तरह नए युग में पहुंचा दिया। आज क्रिकेट मैदान पर जितना खेला जाता है, उससे कहीं अधिक टीवी स्क्रीन, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर जिया जाता है। चौकों-छक्कों की बरसात, चीयर लीडर्स, रंगारंग कार्यक्रम, फिल्मी सितारे, ब्रांड एम्बेसडर और करोड़ों के विज्ञापन इस खेल को एक संपूर्ण मनोरंजन पैकेज में बदल चुके हैं।
आईपीएल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लगभग दो महीनों तक चलने वाला यह आयोजन केवल क्रिकेट प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक गतिविधि है। खिलाडिय़ों की नीलामी में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। युवा खिलाड़ी रातों-रात स्टार बन जाते हैं। जिन खिलाडिय़ों को कुछ समय पहले तक उनके शहर या राज्य से बाहर कोई नहीं जानता था, वे अचानक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल कर लेते हैं। बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड और छोटे शहरों से निकलकर आने वाले खिलाडिय़ों के लिए आईपीएल अवसरों का सबसे बड़ा मंच बन गया है।
आईपीएल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक उसकी प्रतिभा खोजने की क्षमता है। कभी भारतीय क्रिकेट पर महानगरों और चुनिंदा क्रिकेट केंद्रों का दबदबा हुआ करता था, लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। बिहार के युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी ने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया कि पूरे देश का ध्यान उनकी ओर गया। कश्मीर के उभरते खिलाडिय़ों से लेकर राजस्थान, विदर्भ, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश तक के युवा अब राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना रहे हैं। छत्तीसगढ़ के शशांक सिंह, मध्यप्रदेश के रजत पाटीदार और कई अन्य नए चेहरों ने साबित किया है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर की मोहताज नहीं होती। जिस तरह महेंद्र सिंह धोनी झारखंड जैसे अपेक्षाकृत गैर-पारंपरिक क्रिकेट केंद्र से निकलकर विश्व क्रिकेट के महानतम कप्तानों में शामिल हुए, साकिब हुसैन गोपालगंज (बिहार), रॉबिन मिंज गुमला (झारखंड), आशुतोष शर्मा रतलाम (मध्य प्रदेश), उमरान मलिक गुज्जर नगर (जम्मू), परवेज़ रसूल बिजबेहारा (अनंतनाग), अब्दुल समद कालाकोट (राजौरी), रासिख़ सलाम डार (कुलगाम) आज नई पीढ़ी के खिलाड़ी भी छोटे कस्बों और सीमित संसाधनों से निकलकर करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। आईपीएल ने इन खिलाडिय़ों को केवल मंच ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें वह पहचान, आत्मविश्वास और अवसर भी दिए हैं, जिनके बिना शायद उनकी प्रतिभा देश के सामने नहीं आ पाती। यही कारण है कि आज भारत के दूरदराज़ इलाकों में भी हजारों बच्चे क्रिकेट को केवल खेल नहीं, बल्कि अपने सपनों को साकार करने के माध्यम के रूप में देखने लगे हैं।
लेकिन इस सफलता के पीछे बाजार की ताकतों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज क्रिकेट का हर पहलू व्यावसायिक दृष्टि से संचालित होता दिखाई देता है। विज्ञापन एजेंसियां, प्रसारण कंपनियां, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कॉरपोरेट घराने मिलकर क्रिकेट को एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत करते हैं। खिलाडिय़ों की छवि गढ़ी जाती है, प्रतिद्वंद्विताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और हर मैच को किसी युद्ध से कम नहीं दिखाया जाता। सोशल मीडिया पर लगातार चलने वाले अभियान खिलाडिय़ों को नायक और कभी-कभी खलनायक तक बना देते हैं। कई आलोचक यह सवाल भी उठाते हैं कि क्या क्रिकेट का मूल स्वरूप इस चकाचौंध में कहीं खो नहीं रहा? इस बार आईपीएल में रिकॉर्ड स्तर पर रन बने। कई मैचों में 200 और 250 रन का आंकड़ा सामान्य दिखाई दिया। ऐसे में यह बहस भी उठी कि क्या पिचों को बल्लेबाजों के अनुकूल बनाया जा रहा है ताकि दर्शकों को अधिक मनोरंजन मिल सके। दर्शक अब धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी नहीं, बल्कि चौके-छक्कों की आतिशबाजी देखना चाहते हैं और बाजार भी उसी मांग को पूरा कर रहा है।
इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि क्रिकेट की लोकप्रियता केवल प्रचार का परिणाम नहीं है। इसमें खेल की अनिश्चितता, रोमांच और भावनात्मक जुड़ाव भी शामिल है। आईपीएल ने क्षेत्रीय पहचान को भी एक नया आयाम दिया है। गुजरात, राजस्थान, पंजाब, चेन्नई, बेंगलुरु, कोलकाता या मुंबई की टीमें अपने-अपने क्षेत्रों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती हैं। भले ही टीमों में स्थानीय खिलाडिय़ों की संख्या सीमित हो, लेकिन समर्थकों को उनमें अपनी पहचान नजर आती है।
भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) आज दुनिया का सबसे समृद्ध क्रिकेट संगठन है। उसकी आर्थिक शक्ति का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की नीतियों और वैश्विक क्रिकेट व्यवस्था में भी दिखाई देता है। दुनिया भर के खिलाड़ी भारत में खेलना चाहते हैं क्योंकि यहां उन्हें सम्मान, लोकप्रियता और आर्थिक अवसर मिलते हैं। पाकिस्तान को छोड़ दें तो लगभग सभी प्रमुख क्रिकेट देशों के खिलाड़ी आईपीएल का हिस्सा बनते हैं। यह भारत की क्रिकेटीय शक्ति का प्रमाण है।
आईपीएल की सफलता के बाद महिला क्रिकेट में भी इसी तरह की लीग शुरू हुई है और अन्य देशों ने भी इस मॉडल को अपनाने का प्रयास किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि क्रिकेट अब केवल खेल नहीं, बल्कि वैश्विक मनोरंजन उद्योग का हिस्सा बन चुका है। टिकटों की मारामारी, ब्लैक में बिकते पास, स्टेडियमों में महंगे खाद्य पदार्थ, करोड़ों के प्रसारण अधिकार और विज्ञापन राजस्व इस उद्योग की विशालता को दर्शाते हैं।
क्रिकेट का यह बाजार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव भी पैदा कर रहा है। आज एक सफल क्रिकेटर केवल खिलाड़ी नहीं रह जाता, बल्कि वह ब्रांड, सेलिब्रिटी और सोशल मीडिया आइकन बन जाता है। विज्ञापन कंपनियां उसे हाथोंहाथ लेती हैं, ग्लैमर जगत उसे अपनाता है और करोड़ों युवा उसकी जीवनशैली का अनुसरण करने लगते हैं। यही कारण है कि क्रिकेट अब खेल के मैदान से निकलकर भारतीय समाज के सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
फिर भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रिकेट ने सपनों को नया आकार दिया है। छोटे कस्बों के युवाओं को यह भरोसा मिला है कि प्रतिभा के दम पर वे भी राष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकते हैं। यही कारण है कि क्रिकेट आज भी लोगों को आकर्षित करता है।
आईपीएल का यह सीजन समाप्त हो जाएगा, अगले साल फिर लौटेगा, लेकिन क्रिकेट का यह कारवां चलता रहेगा। बदलते नियम, बदलते तेवर और बढ़ती पूंजी के बीच क्रिकेट का भविष्य शायद और अधिक व्यावसायिक होगा।
चुनौती यह होगी कि मनोरंजन और बाजार के इस दौर में खेल की आत्मा, प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता और प्रतिभा के सम्मान को बचाए रखा जाए। क्योंकि अंतत: क्रिकेट की असली ताकत केवल उसकी चमक-दमक नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के दिलों में बसा उसका जुनून है।