सिनेमा, सत्य और सेंसरशिप के बीच ‘सतलुज’ का सवाल

-सुभाष मिश्रकहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है, लेकिन आईना कभी पूरा समाज नहीं दिखाता। वह केवल वही दिखात...

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चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

-सुभाष मिश्र‘चोरी’ कभी अपराध मानी जाती थी, फिर वह आदत बनी, और अब ऐसा लगता है कि वह व्यवस्था का एक स्वीकृत व्यवहार बनती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस दौर में...

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जब तंबूरा मौन हुआ : क्या हमारी लोक स्मृतियां भी मौन हो जाएंगी?

-सुभाष मिश्रकिसी सभ्यता की पहचान केवल उसके स्मारकों से नहीं होती, बल्कि उन आवाज़ों से होती है जो उसकी लोक स्मृत...

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ऊर्जा का भविष्य: विकल्पों की तलाश और एथेनॉल पर बहस

-सुभाष मिश्रदुनिया आज केवल आर्थिक या सामरिक संकट से नहीं, बल्कि ऊर्जा संकट की चुनौती से भी जूझ रही है। आधुनिक स...

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आखिर नागरिक कौन?

(नागरिकता का सवाल और भारत में सामाजिक संशय और राजीनिक द्वंद्व)-सुभाष मिश्र

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क्या अब शिक्षा भी सिर्फ विजेताओं के लिए रह गई है?

सुभाष मिश्रशिक्षा का उद्देश्य केवल मेधावी विद्यार्थियों को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि हर बच्चे के भीतर छिपी संभावना...

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जीवन का सफर और अंतिम पड़ाव का अकेलापन

-सुभाष मिश्रकभी भारतीय समाज में विवाह को केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि जीवन भर का साथ माना जाता था। पति या पत्नी के चले जाने के बाद शेष जीवन यादों के सहारे ...

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शादी से मना करने की अपेक्षा हत्या आसान निर्णय

(प्रेम, विवाह और हत्या : बदलते समाज की भयावह कहानी)-सुभाष मिश्रह...

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हार की समीक्षा में अटका विपक्ष, अगले चुनाव की तैयारी में भाजपा

सुभाष मिश्रभारतीय राजनीति का स्वभाव तेजी से बदल रहा है। कभी देश की राजनीति पर लगभग एकछत्र प्रभाव रखने वाली कांग्रेस आज अपने अस्तित्व और पुनरुत्थान की चुनौती स...

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परिसीमन का नया फार्मूला: प्रतिनिधित्व बढ़ेगा या राजनीति बदलेगी?

-सुभाष मिश्रलोकसभा चुनाव 2029 अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता पक्ष और व...

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