भारत की जनसंख्या: क्या एलन मस्क की चेतावनी भविष्य का आईना है!

सुभाष मिश्रएक समय था जब भारत की सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती जनसंख्या को माना जाता था। हम दो, हमारे दो जैसे नारे सरका...

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हूज़ अफ्रेड ऑफ़ वर्जिनिया वुल्फ़? -सब डरते हैं

-सुभाष मिश्र1966 में एलिजाबेथ टेलर के फिल्म आई थी। जिस पर शरद जोशी ने मध्य प्रदेश की अफसरशाही पर एक व्यंग्य लिख...

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दो कौड़ी का कौन? शिक्षक, मीडिया और समाज की बहस !

-सुभाष मिश्रहाल के दिनों में एक टीवी बहस के दौरान शिक्षकों को लेकर की गई एक टिप्पणी ने देशभर में नई बहस छेड़ दी...

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गंगोत्री से गंगासागर तक : राजनीति की वही धारा, वही प्रदूषण

-सुभाष मिश्रभारतीय राजनीति में इन दिनों जो कुछ घटित हो रहा है, उसे देखकर ऐसा लगता है, मानो गंगोत्री से निकलकर ग...

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मनोरंजन, बाजार और जुनून का नया नाम क्रिकेट

-सुभाष मिश्रक्रिकेट कभी अंग्रेजों के साथ भारत आया एक खेल था, लेकिन आज यह भारत में केवल खेल नहीं, बल्कि एक विशाल...

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स्याही से स्क्रीन तक की पत्रकारिता की यात्रा

-सुभाष मिश्रहिन्दी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने पर

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साहित्य, चिंतन और सृजन का संगम, 75वें वर्ष पर सम्मानित हुए बलराम जी

भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन, साहित्यकारों की कृतियों का भव्य विमोचन

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मीडिया का वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियां

-सुभाष मिश्रलोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता को समाज की आँख, कान और चेतना मानता है। मीडिया की दुनिया में बीते क...

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बढ़ती कंफर्ट इकॉनामी और उसके साइड इफेक्ट

-सुभाष मिश्रकभी एक दौर था जब बाजार तक पहुंचने के लिए इंसान को घर से निकलना पड़ता था। लोग सूची बनाकर किराना खरीद...

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देश और राज्यों पर बढ़ता कर्ज, बंटती रेवडिय़ां

-सुभाष मिश्रभारत इस समय एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास, कल्याण और चुनावी राजनीति के बीच संतुलन कठिन ...

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