देश और राज्यों पर बढ़ता कर्ज, बंटती रेवडिय़ां

-सुभाष मिश्र

भारत इस समय एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास, कल्याण और चुनावी राजनीति के बीच संतुलन कठिन होता जा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जा रही है, चौथी अर्थव्यवस्था बनने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर केंद्र और राज्य सरकारों पर बढ़ता कर्ज, बढ़ता ब्याज और लगातार फैलती चुनावी उदारता, सरकारी कर्ज पर बढ़ती और बँटती हुई मुफ्त की रेवडिय़ां गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सवाल केवल इतना नहीं है कि सरकारें कितनी योजनाएं चला रही हैं, बल्कि यह भी है कि इन योजनाओं का आर्थिक आधार कितना मजबूत है और आने वाले समय में इसका असर विकास पर कितना पड़ेगा।

आज केंद्र सरकार से लेकर अधिकांश राज्य सरकारें अपनी आय से कहीं अधिक खर्च कर रही हैं। इस अंतर को पूरा करने के लिए लगातार कर्ज लिया जा रहा है। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा अभी भी जीडीपी के लगभग साढ़े चार प्रतिशत के आसपास है और कुल सार्वजनिक ऋण का स्तर चिंताजनक माना जा रहा है। स्थिति केवल केंद्र तक सीमित नहीं है। राज्यों की हालत भी कम गंभीर नहीं है। कई राज्य ऐसे हैं जहाँ बजट का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने, वेतन, पेंशन और सब्सिडी में ही समाप्त हो जाता है। परिणामस्वरूप सड़क, पुल, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे दीर्घकालिक विकास कार्यों के लिए राशि घटती जा रही हैं।

सबसे बड़ी चिंता चुनावी राजनीति के बदलते स्वरूप को लेकर है। अब चुनाव केवल विचारधारा, नीति या विकास के मॉडल पर नहीं लड़े जा रहे, बल्कि प्रत्यक्ष लाभ और मुफ्त सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा में बदलते जा रहे हैं। कहीं महिलाओं को मासिक नकद सहायता देने का वादा है, कहीं मुफ्त बिजली, कहीं मुफ्त यात्रा, कहीं कर्ज माफी, कहीं बेरोजगारी भत्ता। राजनीतिक दल जनता को तत्काल राहत देने वाली योजनाओं की घोषणा करते हैं, लेकिन बहुत कम यह बताते हैं कि इन योजनाओं के लिए पैसा आएगा कहाँ से। यही वह प्रश्न है जो आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे गंभीर रूप में खड़ा है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम जैसे राज्यों की स्थिति अलग-अलग होते हुए भी समान चिंता को जन्म देती है। मध्य प्रदेश लगातार बढ़ते कर्ज और राजकोषीय दबाव से जूझ रहा है। छत्तीसगढ़ जैसे संसाधन सम्पन्न राज्य में भी समर्थन मूल्य, सब्सिडी और नकद सहायता आधारित योजनाएं वित्तीय दबाव बढ़ा रही हैं। पश्चिम बंगाल लंबे समय से भारी कर्ज वाले राज्यों में शामिल है, जहां सामाजिक योजनाओं का राजनीतिक प्रभाव तो दिखाई देता है, लेकिन वित्तीय बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्य में भी मुफ्त और सब्सिडी आधारित योजनाओं का विस्तार हुआ, हालांकि वहाँ मजबूत उद्योग और कर संग्रह इसकी कुछ भरपाई कर देते हैं। असम जैसे राज्यों में सीमित आय के बावजूद चुनावी योजनाओं का दायरा तेजी से बढ़ा है, जिससे केंद्र पर निर्भरता और उधारी दोनों बढ़ रही हैं।

यह भी सच है कि गरीबों और जरूरतमंदों को सहायता देना किसी भी कल्याणकारी राज्य का दायित्व है। सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ आवश्यक हैं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सहायता और राजनीतिक लाभ के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। आर्थिक सहायता शारीरिक रूप से अक्षम, बूढ़े या निराश्रित लोगों को देना चाहिए, लेकिन वोट के लालच ने स्थिति यह कर दी है कि प्रत्येक राजनीतिक दल हर किसी को कोई ना कोई योजना बनाकर, नया नाम देकर लगातार नकद या मुफ्त की सुविधा दी जा रही है जिसे आम जनता में कहा जा रहा है कि रेवडिय़ा बांटी जा रही है। इस पैसे की भरपाई के लिए या तो कर्ज लिया जा रहा है या फिर आम आदमी पर जो टैक्स लगाया जा रहा है उसे उसके भरपायी की जा रही है। जब योजनाएँ आर्थिक क्षमता से अधिक हो जाती है, तब सरकारों को विकास कार्यों की कीमत पर खर्च बढ़ाना पड़ता है। यानी अनेक जरूरी विकास कार्यों को रोक कर इस तरह की योजनाओं पर उस पैसे को लगाया जाता है। इसका परिणाम आने वाले वर्षों में दिखाई देता है- अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर, सीमित रोजगार, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और धीमी आर्थिक वृद्धि के रूप में।

एक और बड़ा मुद्दा बैंकिंग व्यवस्था और बड़े कर्जदारों से जुड़ा है। वर्षों से यह बहस चलती रही है कि बड़े उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपये के फंसे कर्ज और बैंकिंग व्यवस्था के संकट का बोझ अंतत: जनता पर ही आता है। सरकारी बैंकों को बचाने के लिए सरकार को पूंजी डालनी पड़ती है और इसका असर भी वित्तीय घाटे पर पड़ता है। पुरानी पेंशन बहाली ही नहीं, बड़े कॉरपोरेट कर्ज माफी से भी आर्थिक दवाव बढ़ा है। बताया जा रहा है कि पूंजीपतियों के 16 लाख करोड़ कर्ज माफी से आर्थिक बोझ में इजाफा हुआ है और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। आम नागरिक जब यह देखता है कि एक ओर सरकारें मुफ्त योजनाओं के लिए कर्ज ले रही हैं और दूसरी ओर बड़े कॉरपोरेट कर्ज भी डूब रहे हैं और कई बार बड़े उद्योगपतियों का कर्ज बैंक कथित रूप से माफ कर देती है तब आर्थिक न्याय पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब समय आ गया है कि चुनावी घोषणाओं को भी वित्तीय जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को वादे करने का अधिकार है, लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार भी होना चाहिए कि उन वादों की आर्थिक वास्तविकता क्या है। यदि कोई दल मुफ्त बिजली, नकद सहायता या कर्ज माफी की घोषणा करता है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि राज्य की वर्तमान वित्तीय स्थिति क्या है, कुल कर्ज कितना है, ब्याज भुगतान कितना है और नई योजना के लिए धन कहां से आएगा? चुनावी घोषणा पत्र के साथ एक वित्तीय श्वेेत पत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिसमें यह स्पष्ट हो कि यदि सभी वादे लागू किए गए तो राज्य की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर फ्रीबीज संस्कृति पर चिंता व्यक्त की है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बन पाया है। चुनाव आयोग भी केवल आचार संहिता तक सीमित रहता है, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्र में पारदर्शिता बढ़े और मतदाता केवल भावनात्मक घोषणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक वास्तविकता को समझकर निर्णय ले सके।
भारत को यह तय करना होगा कि वह अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के रास्ते पर आगे बढ़ेगा या दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता और विकास के मॉडल को प्राथमिकता देगा। यदि कर्ज बढ़ता गया, ब्याज भुगतान बढ़ता गया और पूंजीगत निवेश घटता गया तो आने वाले समय में राज्यों की आर्थिक स्वतंत्रता और विकास क्षमता दोनों कमजोर होंगी। लोकतंत्र में वादे जरूरी है, लेकिन उनसे भी ज्यादा जरूरी है वित्तीय ईमानदारी। जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार जो सपने दिखा रही है, उन्हें पूरा करने की वास्तविक क्षमता भी उसके पास है या नहीं।

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