सुभाष मिश्र
एक समय था जब भारत की सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती जनसंख्या को माना जाता था। हम दो, हमारे दो जैसे नारे सरकारी अभियानों का हिस्सा थे और परिवार नियोजन को विकास का आधार माना जाता था। लेकिन आज तस्वीर तेजी से बदल रही है। दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों में शामिल टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने भारत की घटती जन्म दर को लेकर जो चिंता जताई है, वह केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की एक गंभीर जनसांख्यिकीय चुनौती की ओर संकेत है।
मस्क ने हाल ही में कहा कि भारत की जन्म दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है और देश के सबसे शिक्षित वर्ग में यह स्थिति कई वर्ष पहले ही आ चुकी थी। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) घटकर 1.9 बच्चे प्रति महिला रह गई है, जबकि 2.1 को रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि यदि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक जारी रहती है तो भविष्य में भारत की जनसंख्या वृद्धि रुक सकती है और धीरे-धीरे घटने भी लग सकती है।
विडंबना यह है कि यह वही भारत है जो आज लगभग 146 करोड़ से अधिक आबादी के साथ दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश है, लेकिन जनसंख्या घनत्व के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग है। भारत में प्रतिवर्ग किलोमीटर लगभग 500 लोग निवास करते हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा करीब 37, रूस में 9 और ऑस्ट्रेलिया में मात्र 3 से 4 लोगों का है। सीमित भूमि पर बढ़ती आबादी ने दशकों तक भारत के विकास की चुनौतियों को बढ़ाया, लेकिन अब वही देश एक नए मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है।
भारत की आबादी की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा जनसंख्या मानी जाती है। देश की लगभग 68 प्रतिशत आबादी 15 से 64 वर्ष के आयु वर्ग में है, जिसे कार्यशील आयु समूह कहा जाता है। औसत आयु लगभग 30 वर्ष है, जो चीन, यूरोप और जापान जैसे देशों की तुलना में काफी कम है। यही कारण है कि भारत को लंबे समय से डेमोग्राफिक डिविडेंड अर्थात जनसांख्यिकीय लाभांश का देश कहा जाता रहा है लेकिन यह लाभ तभी तक है जब तक युवा आबादी पर्याप्त संख्या में कार्यबल में प्रवेश करती रहे। यदि जन्मदर लगातार गिरती रही तो आने वाले दशकों में भारत भी उन देशों की श्रेणी में पहुंच सकता है जहां बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ती है और कामकाजी आबादी घटने लगती है।
यहीं से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच जनसंख्या को लेकर नई बहस शुरू होती है। दक्षिण भारत के राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। इन राज्यों में प्रजनन दर काफी पहले रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच गई थी। इसके विपरीत उत्तर भारत के कई राज्यों में लंबे समय तक उच्च जन्मदर बनी रही, जिसके कारण वहां आबादी तेजी से बढ़ी।
अब जब संसद में भविष्य के परिसीमन की चर्चा हो रही है, दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ तो उत्तर भारत को अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा और दक्षिण का प्रभाव घट जाएगा। दक्षिण के नेताओं का तर्क है कि जिन्होंने परिवार नियोजन को सफल बनाया, उन्हें राजनीतिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
इसी संदर्भ में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर आर्थिक प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल जनसंख्या बढ़ाने की योजना नहीं है, बल्कि घटती जन्म दर, वृद्ध होती आबादी और संभावित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संकट को लेकर उभर रही चिंता का प्रतीक है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कुछ हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि से परिवारों के बच्चे पैदा करने के निर्णय में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा, क्योंकि आज शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन-यापन की लागत कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक बन चुके हैं। भारत की स्थिति इसलिए भी अनूठी है क्योंकि यहां एक ही समय में दो अलग-अलग जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं मौजूद हैं। एक ओर उत्तर भारत के कुछ हिस्से अभी भी बड़ी आबादी और रोजगार के दबाव से जूझ रहे हैं वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत के कई राज्य भविष्य में श्रमिकों की कमी और बढ़ती वृद्ध आबादी को लेकर चिंतित हैं। यही विरोधाभास भारत को चीन, जापान और यूरोप से अलग बनाता है।
एलन मस्क की चिंता को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा। उनका संकेत केवल भारत की वर्तमान जनसंख्या नहीं, बल्कि आने वाले 20 से 30 वर्षों की तस्वीर की ओर है। दुनिया के कई विकसित देशों ने पहले जनसंख्या विस्फोट का भय देखा और फिर घटती जन्म दर के संकट का सामना किया। जापान, दक्षिण कोरिया, इटली और चीन इसी समस्या से जूझ रहे हैं। भारत अभी उस स्थिति में नहीं पहुंचा है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यात्रा उसी दिशा में शुरू हो चुकी है।
इसलिए भारत के सामने असली प्रश्न यह नहीं है कि आबादी बढ़ रही है या घट रही है। असली प्रश्न यह है कि क्या देश अपनी विशाल युवा आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाएं दे पाएगा, और क्या वह भविष्य में संभावित जनसंख्या वृद्धावस्था के लिए समय रहते तैयारी कर पाएगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी भी अवसर नहीं बल्कि बोझ बन सकती है। लेकिन यदि सही नीतियां अपनाई गईं तो यही आबादी भारत को 21वीं सदी की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनाने की क्षमता रखती है।
एलन मस्क की चेतावनी को भय के रूप में नहीं, बल्कि एक समय रहते मिले संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत के लिए चुनौती अब जनसंख्या नियंत्रण नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन और मानव संसाधन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी भारत की सबसे बड़ी ताकत बनेगी या सबसे बड़ी चुनौती।