-सुभाष मिश्र
भारतीय राजनीति में इन दिनों जो कुछ घटित हो रहा है, उसे देखकर ऐसा लगता है, मानो गंगोत्री से निकलकर गंगासागर तक बहने वाली गंगा की धारा हर जगह एक जैसी हो गई है। फर्क सिर्फ भूगोल का है, राजनीतिक चरित्र का नहीं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार, कर्नाटक से लेकर पश्चिम बंगाल तक सत्ता की राजनीति का एक ही चेहरा दिखाई देता है-जनता जिस दल के नाम पर प्रतिनिधि चुनकर भेजती है, वही प्रतिनिधि अवसर मिलते ही दल बदल की नई राह खोज लेते हैं। दल-बदल विरोधी कानून की कमियों का लाभ उठाकर कभी समूह में टूट, कभी विलय और कभी ‘बहुमत वाले गुट का दावा कर राजनीतिक निष्ठा को सुविधानुसार परिभाषित किया जा रहा है।
राजनीतिक दल विचारधारा, सिद्धांत और जनसेवा की बातें अवश्य करते हैं, लेकिन व्यवहार में सत्ता ही अंतिम लक्ष्य दिखाई देती है। जिस प्रकार गंगा को पवित्र मानते हुए भी उसे प्रदूषित करने का सिलसिला लगातार जारी है, उसी तरह राजनीति में शुचिता और नैतिकता की बातें होती हैं, पर सत्ता प्राप्ति और संरक्षण के लिए हर प्रकार के समझौते स्वीकार्य हो जाते हैं।
कल तक जो नेता ममता बनर्जी, ठाकरे परिवार या पवार परिवार के गुणगान करते दिखाई देते थे, वे आज किसी दूसरे राजनीतिक खेमे में जाकर उसी उत्साह से नए नेतृत्व की प्रशंसा करते नजर आते हैं। उर्दू का एक शेर याद आता है—
‘एक ही मौसम में जिन्हें तोड़ दिया गया,
इतने नाज़ुक तो ये रिश्ते बनाए होते हैं।
राजनीतिक रिश्तों की यही नाजुकता आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना बन चुकी है। पश्चिम बंगाल की ताजा राजनीतिक हलचल इसी प्रवृत्ति का नया उदाहरण है। विधानसभा के भीतर नेता प्रतिपक्ष को लेकर पैदा हुआ विवाद अब संवैधानिक और राजनीतिक दोनों रूप ले चुका है। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी की ओर से शोभनदेब चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए आगे बढ़ाया था, लेकिन पार्टी के भीतर ही इस निर्णय को लेकर असहमति सामने आ गई। बड़ी संख्या में विधायकों ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताई और ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में खड़े हो गए। यदि वास्तव में 80 में से 60 विधायक किसी अन्य नेतृत्व के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं, तो यह केवल एक पद का विवाद नहीं, बल्कि संगठनात्मक नियंत्रण और नेतृत्व की स्वीकार्यता का प्रश्न बन जाता है।
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि पश्चिम बंगाल इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा, फिर तीन दशकों से अधिक समय तक वामपंथी सत्ता में रहे और उसके बाद ममता बनर्जी का दौर आया। हर राजनीतिक परिवर्तन के साथ बड़ी संख्या में नेता और कार्यकर्ता नए सत्ता केंद्र की ओर आकर्षित होते रहे। सत्ता बदलती रही, लेकिन राजनीतिक प्रवास की संस्कृति बनी रही।
आज यदि भाजपा राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रही है तो तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और टूट की चर्चाएं भी स्वाभाविक रूप से बढ़ रही हैं। यह केवल बंगाल की कहानी नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन, मध्य प्रदेश में सरकारों के गिरने-बनने, पंजाब और अन्य राज्यों में राजनीतिक पुनर्संरेखण की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दलों की वैचारिक सीमाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीली हो चुकी हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जनता किसे अपना जनादेश सौंपती है व्यक्ति को, दल को या विचारधारा को? यदि मतदाता किसी दल की नीति और कार्यक्रम को देखकर वोट देता है, तो फिर निर्वाचित प्रतिनिधि का बार-बार राजनीतिक पाला बदलना लोकतांत्रिक नैतिकता के विरुद्ध माना जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कानूनी प्रावधानों की व्याख्या और राजनीतिक गणित अक्सर नैतिकता पर भारी पड़ जाते हैं।
पश्चिम बंगाल का यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल नेता प्रतिपक्ष की मान्यता का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब है जिसमें संगठन से अधिक शक्ति, विचारधारा से अधिक अवसर और जनादेश से अधिक सत्ता का महत्व दिखाई देता है।
गंगोत्री से गंगासागर तक बहती गंगा की तरह भारतीय राजनीति की यह धारा भी पूरे देश में समान रूप से प्रवाहित हो रही है। सवाल यह है कि क्या कभी इस धारा का शुद्धिकरण संभव होगा, या फिर लोकतंत्र में दल-बदल, विभाजन और सत्ता-समीकरण ही नई राजनीतिक सामान्यता बनकर रह जाएंगे? जनता आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में है।