मानसून सत्र : टकराव की राजनीति या लोकतंत्र का अवसर?

-सुभाष मिश्र

कभी भारतीय जनता पार्टी ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, लेकिन भारतीय राजनीति का वर्तमान परिदृश्य यह बताता है कि किसी राजनीतिक दल को चुनावी रूप से कमजोर करना और उसकी राजनीतिक भूमिका को समाप्त कर देना दो अलग-अलग बातें हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव के बाद संसद का अंकगणित बदला है और उसके साथ सत्ता तथा विपक्ष के रिश्तों का स्वरूप भी बदला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में सरकार पहले की तरह अपने दम पर प्रचंड बहुमत की स्थिति में नहीं है और उसे सहयोगी दलों के साथ आगे बढऩा पड़ रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस और विपक्षी दलों को भी यह एहसास हुआ है कि संख्या कम होने के बावजूद यदि वे एकजुट होकर अपनी रणनीति बनाएं तो संसद के भीतर सरकार पर राजनीतिक और वैचारिक दबाव बनाया जा सकता है। यही कारण है कि पिछले कुछ सत्रों में संसद बहस से अधिक टकराव के लिए चर्चा में रही है।
राहुल गांधी से लेकर विपक्ष के दूसरे नेताओं तक ने संसद के भीतर संविधान की प्रति दिखाने से लेकर विभिन्न मुद्दों पर प्रदर्शन और विरोध के नए-नए तरीके अपनाए हैं। सरकार भी विपक्ष पर संसद नहीं चलने देने का आरोप लगाती रही है, जबकि विपक्ष का कहना है कि उसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने और चर्चा कराने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाता। इन दोनों आरोपों के बीच वास्तविक नुकसान संसद का होता है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन जब मतभेद संवाद की जगह स्थायी गतिरोध में बदल जाएं तो संसद की मूल भूमिका ही कमजोर होने लगती है। मानसून सत्र से पहले जिस तरह विपक्षी दलों की गतिविधियां तेज हुई हैं, उससे संकेत मिल रहे हैं कि इस बार भी संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा संघर्ष देखने को मिल सकता है। सर्वदलीय बैठक में दिखाई दिया प्रारंभिक विरोध और उसके बाद विपक्षी दलों की एकजुटता की कोशिशें बताती हैं कि इंडिया गठबंधन फिर संसद के भीतर साझा रणनीति बनाने की तैयारी में है। सवाल यह है कि यह एकजुटता सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए होगी या संसद को ठप करने की रणनीति में बदल जाएगी।
विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक से लेकर युवाओं के असंतोष, शिक्षा और रोजगार तक अनेक प्रश्न हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े मुद्दे हैं। केंद्र और राज्यों के संबंधों को लेकर भी क्षेत्रीय दलों की अपनी शिकायतें हैं। विपक्षी दलों को यह आशंका भी लगातार परेशान करती रही है कि भाजपा उनकी राजनीतिक जमीन कमजोर करने के लिए उनके नेताओं, सांसदों और विधायकों को अपने साथ जोडऩे की रणनीति पर काम करती है। पिछले वर्षों में कई राजनीतिक दलों में विभाजन और टूट के घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति में दल-बदल, जनादेश और राजनीतिक नैतिकता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर हुए विभाजन भारतीय राजनीति के बड़े उदाहरण हैं। विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के नेताओं के भाजपा के साथ जाने की घटनाओं ने भी क्षेत्रीय दलों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा की है।
यही कारण है कि वैचारिक रूप से एक-दूसरे से अलग कई दल भी भाजपा के राजनीतिक विस्तार को अपने लिए साझा चुनौती के रूप में देखने लगे हैं। संसद का मानसून सत्र इसलिए केवल सरकार और कांग्रेस के बीच संघर्ष नहीं होगा, बल्कि इसमें क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक चिंताएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसके पीछे संसद का अंकगणित भी है। सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण विधायी और संवैधानिक प्राथमिकताएं हैं, लेकिन कुछ बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। ऐसे मामलों में संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत और कई परिस्थितियों में राज्यों की सहमति भी आवश्यक होती है, इसलिए सरकार के लिए अपने सहयोगी दलों को साथ रखने के साथ-साथ विपक्ष या क्षेत्रीय दलों के बीच भी समर्थन तलाशना राजनीतिक आवश्यकता बन जाती है। विपक्ष इसी स्थिति को अपनी ताकत के रूप में देख रहा है।
यहीं से भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है। क्या राजनीतिक दलों को तोड़कर संख्या जुटाना लोकतांत्रिक राजनीति का स्वीकार्य रास्ता है? और इसके समानांतर यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या सरकार के किसी विधायी एजेंडे का विरोध करने के लिए संसद को लगातार बाधित करना उचित है? यदि सत्ता संख्या बढ़ाने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ का सहारा ले और विपक्ष अपनी बात मनवाने के लिए सदन को ही न चलने दे, तो दोनों परिस्थितियों में नुकसान लोकतांत्रिक संस्थाओं का ही होता है।
सरकार स्वाभाविक रूप से चाहेगी कि मानसून सत्र में उसका विधायी एजेंडा आगे बढ़े और लंबित विधेयकों पर चर्चा तथा निर्णय हो। विपक्ष चाहेगा कि सरकार उन मुद्दों पर जवाब दे जिन्हें वह जनता के बीच महत्वपूर्ण मानता है। लोकतंत्र में दोनों भूमिकाएं जरूरी हैं।पिछले कुछ वर्षों में संसद की कार्यवाही बार-बार व्यवधान का शिकार हुई है। सदन स्थगित होते हैं, नारे लगते हैं, सदस्य वेल में पहुंचते हैं और कई बार महत्वपूर्ण विधेयक अपेक्षित विस्तृत बहस के बिना पारित हो जाते हैं। यह स्थिति सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन जनता के लिए नहीं। जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में नारे लगाने भर के लिए नहीं भेजती। वह चाहती है कि उसके सवाल उठें, सरकार जवाब दे, विपक्ष तथ्यों के साथ सरकार को घेरे और कानूनों पर गंभीर चर्चा हो। विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। विरोध और व्यवधान के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। संसद में सरकार को घेरना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन संसद को चलने ही न देना लोकतांत्रिक समाधान नहीं हो सकता। उसी तरह बहुमत के आधार पर विपक्ष की आवाज को नजरअंदाज करना भी लोकतंत्र नहीं है।
संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि यहां असहमति को भी स्थान मिलता है और अंतत: निर्णय बहस तथा संवैधानिक प्रक्रिया से होता है। मानसून सत्र ऐसे समय हो रहा है जब देश के सामने रोजगार, शिक्षा, महंगाई, कृषि, सामाजिक तनाव, संघीय संबंध और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। युवाओं में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर चिंता है। राज्यों और केंद्र के बीच अधिकारों तथा संसाधनों को लेकर बहस है। राजनीतिक दलों में टूट और नेताओं के पाला बदलने से राजनीतिक नैतिकता पर सवाल उठ रहे हैं। इन सभी विषयों पर चर्चा के लिए संसद से बेहतर कोई मंच नहीं हो सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल भारतीय संसदीय राजनीति के लिए भी एक नई परीक्षा है। पहले दो कार्यकालों में मजबूत बहुमत वाली सरकार के सामने अब गठबंधन और बदले हुए संसदीय समीकरणों की चुनौती है। इसी तरह विपक्ष के सामने भी यह साबित करने की चुनौती है कि उसकी बढ़ी हुई राजनीतिक ताकत केवल सदन में व्यवधान पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि बेहतर और प्रभावी संसदीय हस्तक्षेप के लिए है। सरकार को अधिक संवाद करना होगा और विपक्ष को अधिक जिम्मेदारी दिखानी होगी। यह भी समझना होगा कि संसद किसी एक दल की नहीं है। न वह सरकार की संपत्ति है और न विपक्ष के विरोध का अखाड़ा। संसद देश की जनता का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। सत्ता और विपक्ष दोनों वहां जनता के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित होते हैं। इसलिए संसद का एक-एक घंटा जनता के सवालों, नीतियों और भविष्य से जुड़ा है।
आने वाला मानसून सत्र इसी कसौटी पर परखा जाएगा। क्या विपक्ष अपनी एकजुटता को सार्थक बहस और जवाबदेही का माध्यम बनाएगा या संसद को ठप करने की रणनीति अपनाएगा? क्या सरकार विपक्ष की चिंताओं और सवालों को पर्याप्त स्थान देगी या केवल अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर जोर देगी? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष राजनीतिक टकराव से ऊपर उठकर संसद को वास्तव में लोकतांत्रिक संवाद का मंच बना पाएंगे? लोकतंत्र में टकराव होगा, मतभेद होंगे और तीखी बहस भी होगी। यही उसकी जीवंतता है, लेकिन जब बहस समाप्त हो जाती है और उसकी जगह केवल शोर बचता है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। देश की जनता को हंगामा नहीं, जवाब चाहिए; बहिष्कार नहीं, बहस चाहिए और राजनीतिक जोड़-तोड़ नहीं, जवाबदेह शासन चाहिए। मानसून सत्र की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि सरकार ने कितने विधेयक पारित कराए या विपक्ष ने कितनी बार सदन स्थगित कराया। उसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि संसद ने देश के सवालों पर कितनी गंभीरता से चर्चा की। यही लोकतंत्र का अवसर है और यही सत्ता तथा विपक्ष दोनों की सबसे बड़ी परीक्षा भी।

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