-सुभाष मिश्र
1966 में एलिजाबेथ टेलर के फिल्म आई थी। जिस पर शरद जोशी ने मध्य प्रदेश की अफसरशाही पर एक व्यंग्य लिखा था। हाल-फिलहाल यह राजनीतिज्ञों पर लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश के एक कथित असावधान वाक्य से कॉकरोच शब्द के नए अर्थ का जन्म हुआ। उस शब्द का जन्म लेना था कि रातों-रात वह कॉकरोच करोड़ों की तादाद में पूरे देश में फैल गया। शुरू में लोग मजाक उड़ाते रहे। अवहेलना करते रहे, हंसी मजाक करते रहे लेकिन दिल्ली में आज की रैली के बाद सारे राजनीतिक दल गंभीर हो गए हैं, बल्कि एक तरह कथित रूप से डर गए हैं। राजनीतिक दलों के भीतर यह डर कॉकरोच की तरह चुपचाप बैठा है। लेकिन देश में बहुत हो-हल्ला और लंबी बहस छेड़ दी है। हाल फिलहाल बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं ने जो क्रांति की है उस क्रांति के परिणाम देखकर भारतीय राजनीति डरी हुई है। युवाओं ने कॉकरोज को अपने प्रतिरोध का प्रतीक बना लिया है।
भारतीय राजनीति में प्रतीकों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। कभी गांधी टोपी एक बड़े अहिंसक आंदोलन का प्रतीक बनी, कभी झाड़ू व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद का प्रतीक बनी और अब सोशल मीडिया के दौर में एक नया प्रतीक चर्चा में है—कॉकरोच। सुनने में यह अजीब लग सकता है, लेकिन जिस कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को कुछ महीने पहले तक सोशल मीडिया का मजाक समझा जा रहा था, वह अब दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंच चुकी है। यही वजह है कि इसे लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया और विश्वविद्यालय परिसरों तक बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर कॉकरोच पार्टी को जिस तरह से रिस्पांस मिला वह बहुत चौंकाने वाला है क्योंकि लगभग सारी प्रतिक्रियाएं कॉकरोच पार्टी के फेवर में है। कॉकरोच को देखकर राजनीतिक दलों के हाथ के तोते उड़ गए हैं। कॉकरोच पार्टी के मुद्दे कुछ ऐसे हैं जिसने सीधे युवाओं के दिल पर असर किया है। कोढ़ में खाज यह हुई कि इधर कॉकरोच पार्टी का उदय हुआ उधर नीट का कांड हुआ। फिर सीबीएसई का कांड हो गया तो किशोर उम्र से लेकर युवाओं तक में आक्रोश फैल गया। और जाहिर है कि उनके पालक भी प्रत्यक्ष या परोक्ष इस आक्रोश में शामिल हो गए।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन ने इस बहस को और व्यापक बना दिया। पार्टी से जुड़े लोगों का दावा है कि यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती अव्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली, बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं की उपेक्षा के खिलाफ है। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि जब इस समूह का नाम पहली बार सामने आया था, तब अधिकांश लोगों ने इसे सोशल मीडिया की क्षणिक सनक माना था। कई राजनीतिक टिप्पणीकारों और सार्वजनिक हस्तियों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। कुछ लोगों ने कहा कि यह इंटरनेट की दुनिया का एक और वायरल प्रयोग है, जो कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि इस नाम के पीछे केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी छिपा है। जिसे युवाओं ने अपना उद्देश्य बना लिया है।
कॉकरोच शब्द का चयन भी अपने आप में प्रतीकात्मक बताया जा रहा है। समर्थकों का तर्क है कि व्यवस्था जिन युवाओं को महत्वहीन समझती है, जिन्हें नजरअंदाज किया जाता है, वही युवा अब अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए इस प्रतीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि व्यवस्था जिन लोगों को अदृश्य मानती है, वे अब सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आना चाहते हैं।
हालांकि आलोचकों की संख्या भी कम नहीं है। कई लोगों का मानना है कि केवल प्रतीकों और नारों से व्यवस्था नहीं बदलती है। उनका सवाल है कि यदि शिक्षा मंत्री इस्तीफा दे भी दें, तो क्या इससे परीक्षा प्रणाली की खामियां दूर हो जाएंगी? क्या इससे पेपर लीक रुक जाएंगे? क्या इससे भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता स्वत: आ जाएगी? इतिहास बताता है कि किसी मंत्री के पद छोडऩे से तात्कालिक राजनीतिक संदेश तो जाता है, लेकिन संस्थागत समस्याओं का समाधान तभी होता है जब पूरी व्यवस्था में सुधार हो।
भारतीय लोकतंत्र में ऐसे उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं। किसी बड़ी दुर्घटना या विवाद के बाद मंत्रियों ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे दिए हैं, लेकिन उसके बाद भी संबंधित समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। यही कारण है कि कुछ विश्लेषक इस आंदोलन को एक जरूरी चेतावनी तो मानते हैं, लेकिन समाधान नहीं।
युवाओं के भीतर मौजूद असंतोष को समझना भी जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में निरंतर धाँधली, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों ने एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है। सोशल मीडिया ने इस असंतोष को संगठित होने का मंच दिया है। पहले जो शिकायतें अलग-अलग कमरों, कोचिंग संस्थानों और व्हाट्सऐप समूहों तक सीमित रहती थीं, वे अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन रही हैं।
यही वजह है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक कॉकरोच जनता पार्टी को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह उस पीढ़ी की अभिव्यक्ति है, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से निराश हो चुकी है और नए मंचों की तलाश कर रही है।
लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी उठ रहे हैं। क्या यह वास्तव में स्वत: स्फूर्त युवा आंदोलन है? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक शक्ति काम कर रही है? क्या यह किसी दल के लिए दबाव समूह का काम करेगा? या फिर यह एक स्वतंत्र जनआंदोलन के रूप में विकसित होगा? फिलहाल इन सवालों का स्पष्ट उत्तर किसी के पास नहीं है।
विपक्ष की स्थिति भी दिलचस्प है। वह इस आंदोलन को लेकर पूरी तरह आश्वस्त दिखाई नहीं देता है। इसके पीछे एक बड़ा कारण अतीत के अनुभव हैं। देश ने पहले भी ऐसे आंदोलनों को देखा है, जो बाद में राजनीतिक दलों में बदल गए। इसलिए बहुत से लोग अभी प्रतीक्षा और अवलोकन की स्थिति में हैं। वे देखना चाहते हैं कि यह आंदोलन अपने मूल मुद्दों पर टिकता है या राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का मंच बन जाता है।
सत्ता पक्ष की रणनीति भी चर्चा का विषय है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दिए जाने को कुछ लोग लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए और शांतिपूर्ण विरोध को स्थान मिलना चाहिए। वहीं कुछ अन्य लोगों का मानना है कि सरकार ने टकराव से बचने के लिए यह रास्ता चुना, क्योंकि युवाओं से सीधे संघर्ष की स्थिति राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकती थी।
आने वाले दिनों में सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा कि यह आंदोलन अपनी ऊर्जा को किस दिशा में ले जाता है। क्या यह केवल इस्तीफों की मांग तक सीमित रहेगा या शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक सुधारों की माँग पर दृढ़ प्रतिज्ञ रहकर ठोस नीतिगत सुझाव भी सामने रखेगा? किसी भी आंदोलन की वास्तविक परीक्षा वहीं होती है, जहां वह विरोध से आगे बढ़कर वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करता है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में युवाओं की आवाज को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि केवल भावनात्मक नारों से संस्थागत सुधार नहीं होते। व्यवस्था बदलने के लिए दीर्घकालिक दृष्टि, नीतिगत स्पष्टता और सतत जनदबाव की आवश्यकता होती है।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिस कॉकरोच को बहुत से लोग सोशल मीडिया का मजाक समझ रहे थे, वह अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है। यह बहस कितनी दूर जाएगी, आंदोलन कितना बड़ा होगा और इसका राजनीतिक भविष्य क्या होगा, इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि देश का युवा वर्ग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नए प्रतीक, नए मंच और नए तरीके तलाश रहा है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।