(प्रेम, विवाह और हत्या : बदलते समाज की भयावह कहानी)
-सुभाष मिश्र
हाल के वर्षों में देश में कुछ ऐसी आपराधिक घटनाएं सामने आई हैं, जिसने केवल कानून व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि हमारे समाज की बदलती मानसिकता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड और पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड ऐसी ही दो घटनाएं हैं। दोनों मामलों की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है। यदि विवाह स्वीकार नहीं था, यदि प्रेम किसी और से था, यदि परिवार का दबाव था या सामाजिक प्रतिष्ठा का भय था तो संवाद, असहमति या संबंध समाप्त करने के बजाय हत्या को एक सहज और निर्भय विकल्प की तरह चुना गया। मां-बाप या परिवार को शादी से मना करने के संकोच में लड़की ने हत्या कर देने की निर्भयता को प्राथमिकता दी। यह बहुत अजीब और बड़ी बात है। यह केवल अपराध नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना में आ रहे एक गहरे परिवर्तन का संकेत भी है।
इन घटनाओं पर चर्चा करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी मामले में अंतिम तथ्य न्यायालय की प्रक्रिया से ही स्थापित होते हैं। फिर भी, जिन परिस्थितियों का उल्लेख जाँच एजेंसियों और मीडिया रिपोर्टों में सामने आया, वे समाज की मानसिक संरचना पर विचार करने के लिए पर्याप्त हैं।
भारतीय समाज में विवाह को हमेशा केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं माना गया। यह दो परिवारों का जुड़ाव, सामाजिक विश्वास और नैतिक जिम्मेदारी का बंधन भी रहा है। प्रेम विवाह हो या पारंपरिक विवाह, दोनों में एक बात समान थी कि यदि रिश्ता स्वीकार नहीं है तो उसे तोडऩे की सामाजिक और व्यक्तिगत कीमत तो चुकानी पड़ सकती है, लेकिन किसी की जान लेना कभी विकल्प नहीं माना जाता था। आज कुछ घटनाएं यह संकेत देती हैं कि असफल संबंध का सामना करने की क्षमता कमजोर पड़ रही है और उसकी जगह हिंसा ले रही है।
राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल जैसे मामलों ने एक नया प्रश्न पैदा किया है। क्या अब कुछ लोगों के लिए मंगनी तोडऩे, परिवार का विरोध सहने या समाज की आलोचना झेलने से अधिक आसान किसी व्यक्ति को रास्ते से हटा देना हो गया है? यदि ऐसा है तो यह केवल कानून का विषय नहीं है। यह समाज के नैतिक ढांचे में आई दरार का संकेत है।
इन घटनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हिंसा को केवल पुरुष अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता। लंबे समय तक समाज में यह धारणा रही कि वैवाहिक या प्रेम संबंधों में हिंसा का अपराध मुख्यत: पुरुष करते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें महिलाओं पर भी अपने प्रेमी या अन्य लोगों के साथ मिलकर मंगेतर या पति की हत्या की साजिश रचने के आरोप लगे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं में अपराध बढ़ गया है या पुरुषों और महिलाओं के अपराध समान हैं। इसका अर्थ केवल इतना है कि अपराध की प्रवृत्ति स्त्री पुरुष का भेद नहीं देखती। जब नैतिक सीमाएं कमजोर होती हैं तो हिंसा किसी भी व्यक्ति के भीतर जन्म ले सकती है।
यह परिवर्तन केवल व्यक्तिगत नहीं है। इसके पीछे कई सामाजिक कारण भी दिखाई देते हैं। आज व्यक्ति पहले से अधिक स्वतंत्र है, लेकिन भावनात्मक रूप से अधिक अकेला भी है। संबंधों में धैर्य कम हुआ है। असहमति को स्वीकार करने की क्षमता घट रही है। तुरंत परिणाम पाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। डिजिटल दुनिया ने भी इस मानसिकता को प्रभावित किया है, जहां हर समस्या का त्वरित समाधान खोजने की आदत बनती जा रही है। वास्तविक जीवन में जब संबंध जटिल होते हैं, तब कुछ लोग संवाद और धैर्य के बजाय हिंसा का रास्ता चुन लेते हैं।
एक और महत्वपूर्ण कारण सामाजिक प्रतिष्ठा का भय है। आज भी अनेक परिवारों में विवाह टूटना असफलता माना जाता है। कई युवाओं को लगता है कि यदि उन्होंने मंगनी तोड़ी तो परिवार की बदनामी होगी, रिश्तेदार बातें करेंगे और सामाजिक दबाव झेलना पड़ेगा। दुखद यह है कि कुछ मामलों में यह भय इतना विकृत रूप ले लेता है कि हत्या जैसे अपराध को भी कम नुकसान वाला विकल्प समझ लिया जाता है। यह सोच किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि उस सामाजिक वातावरण की भी विफलता है जहां प्रतिष्ठा को जीवन से बड़ा बना दिया जाता है।
यह भी सच है कि प्रेम की हमारी समझ बदल रही है। प्रेम का अर्थ दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना है। यदि कोई व्यक्ति साथ नहीं रहना चाहता तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन आज कई बार प्रेम अधिकार में बदल जाता है। उसमें स्वामित्व की भावना आ जाती है। फिर यदि संबंध बाधा बनता है तो उसे समाप्त करने के बजाय उस व्यक्ति को ही समाप्त करने का विचार जन्म लेने लगता है। यह प्रेम नहीं है। यह हिंसक स्वार्थ है।
परिवारों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अनेक बार माता पिता बच्चों से खुलकर संवाद नहीं कर पाते। बच्चे भी अपने वास्तविक संबंधों और इच्छाओं को छिपाते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि विवाह जैसी गंभीर प्रक्रिया झूठ और दबाव के बीच आगे बढ़ती रहती है। यदि समय रहते सच स्वीकार कर लिया जाए तो संबंध टूट सकता है, लेकिन किसी का जीवन तो नहीं जाएगा। इसलिए परिवारों में संवाद का वातावरण बनाना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। यह कितनी अजीब और डरावनी बात है कि इन दोनों प्रकरण में लड़की ने अपने पति या मंगेतर से अपनी असहमति नहीं बताई जो की एक आसान हल था। जहां संबंधों की पृथकता संभव थी। इसकी अपेक्षा उसने हत्या को आसान उपाय समझा।
अब यहाँ शिक्षा व्यवस्था पर भी प्रश्न उठते हैं। हमारे विद्यालय और विश्वविद्यालय व्यावसायिक सफलता तो सिखा रहे हैं, लेकिन भावनात्मक परिपक्वता, संबंधों का सम्मान, अस्वीकार को स्वीकार करना और विवाद का शांतिपूर्ण समाधान जैसी जीवन संबंधी शिक्षा लगभग अनुपस्थित है। उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी यदि हत्या को समाधान समझने लगे तो यह स्पष्ट है कि केवल डिग्रियाँ समाज को सभ्य नहीं बनातीं।
मीडिया और सामाजिक माध्यमों की भी जिम्मेदारी है। अपराध की सनसनी से अधिक आवश्यकता इस बात की है कि समाज को यह समझाया जाए कि किसी भी संबंध का अंत जीवन का अंत नहीं होता। विवाह टूटना दुखद हो सकता है, लेकिन वह हत्या का औचित्य कभी नहीं बन सकता। कानून भी तभी प्रभावी होगा जब समाज की नैतिक चेतना उसके साथ खड़ी हो। इन घटनाओं को किसी एक पीढ़ी,पुरुष या स्त्री या किसी एक वर्ग की समस्या मानना भी उचित नहीं होगा। अधिकांश युवा आज भी जिम्मेदार, संवेदनशील और कानून का सम्मान करने वाले हैं। कुछ भयावह घटनाओं के आधार पर पूरी पीढ़ी का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि इन घटनाओं को केवल अपवाद कहकर टाल न दिया जाए। वे हमें चेतावनी देती हैं कि संबंधों की दुनिया में संवाद, धैर्य और नैतिकता की जगह स्वार्थ, अहंकार और हिंसा लेने लगे तो समाज का ताना बाना कमजोर हो जाएगा।
सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि वहां प्रेम संबंध कभी नहीं टूटते। उसकी पहचान यह है कि संबंध टूटने पर भी लोग कानून, संवाद और मानवीय गरिमा का रास्ता चुनते हैं। किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन साथी का चुनाव करने या संबंध समाप्त करने का अधिकार है। उसी तरह दूसरे व्यक्ति को जीवित रहने और सुरक्षित रहने का भी अधिकार है। जब पहला अधिकार दूसरे अधिकार को निगलने लगता है तब समाज केवल आधुनिक नहीं होता, बल्कि खतरनाक भी होने लगता है।
राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल जैसे मामले हमें यही याद दिलाते हैं कि आधुनिकता का अर्थ केवल अधिक स्वतंत्रता नहीं है। उसके साथ उतनी ही गहरी नैतिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। यदि स्वतंत्रता से करुणा, संवेदना और उत्तरदायित्व अलग हो जाएं तो वह समाज को आगे नहीं ले जाती, बल्कि हिंसा के ऐसे अँधेरे में धकेल देती है जहां प्रेम का नाम बचता है, लेकिन उसके भीतर मनुष्यता नहीं बचती।