चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

चोरी : क्या यह हमारे सिस्टम का चरित्र बनती जा रही है?

-सुभाष मिश्र
‘चोरी’ कभी अपराध मानी जाती थी, फिर वह आदत बनी, और अब ऐसा लगता है कि वह व्यवस्था का एक स्वीकृत व्यवहार बनती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस दौर में देश डिजिटल क्रांति, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन निगरानी, सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन सर्विलांस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात कर रहा है, उसी दौर में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और सार्वजनिक धन की लूट के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि तकनीक जितनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, चोरी के तरीके भी उतनी ही तेजी से आधुनिक होते जा रहे हैं।
एक समय था जब भ्रष्टाचार को छिपाने की कोशिश की जाती थी। आज स्थिति कई बार ऐसी दिखाई देती है कि चोरी होती है और पकड़े जाने पर सीनाज़ोरी भी। ‘ना खाऊँगा, ना खाने दूँगा’ जैसे राजनीतिक संकल्पों और पारदर्शिता के तमाम दावों के बावजूद यदि मंदिरों से लेकर मंत्रालयों तक, पंचायतों से लेकर परियोजनाओं तक और भर्ती परीक्षाओं से लेकर खनिज निधियों तक गड़बडिय़ों की खबरें लगातार आती रहें, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर समस्या कहाँ है?

धार्मिक आस्था के केंद्र भी इससे अछूते नहीं रहे। देश के अनेक मंदिरों और धार्मिक ट्रस्टों में दान-पेटियों की राशि, चढ़ावे के आभूषणों और आय-व्यय के रिकॉर्ड को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आए हैं। कहीं सीसीटीवी कैमरों ने कर्मचारियों की करतूत उजागर की तो कहीं ऑडिट रिपोर्टों ने गड़बडिय़ों की परतें खोलीं। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि यहां केवल धन की नहीं, जनता की आस्था की भी चोरी होती है।
शराब नीति से जुड़े विवादों ने भी देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया है। विभिन्न राज्यों में आबकारी नीतियों, लाइसेंस वितरण और कथित कमीशनखोरी के आरोपों ने यह दिखाया कि नीति निर्माण और निजी हितों के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो सकती है। कई मामलों में केंद्रीय और राज्य जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, अदालतों तक मामले पहुंचे, लेकिन इससे व्यवस्था की साख पर लगे प्रश्नचिन्ह समाप्त नहीं हुए।
खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाए गए जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) फंड का उद्देश्य उन गांवों तक विकास पहुंचाना था, जहां से देश की खनिज संपदा निकलती है। लेकिन, अनेक राज्यों में आरोप लगे कि अस्पताल, स्कूल, सडक़ और पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतों पर खर्च होने वाला पैसा कहीं और चला गया। जिन लोगों के नाम पर योजनाएं बनीं, वे आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ग्रामीण विकास योजनाओं की स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। मनरेगा, आवास योजना, पंचायत निधि और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में फर्जी मस्टर रोल, कागजों पर बने तालाब, बिना निर्माण के भुगतान, मृत व्यक्तियों के नाम पर मजदूरी और एक ही काम के लिए कई बार भुगतान जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं। यह केवल सरकारी धन की चोरी नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकारों की चोरी है।
निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप दिखाई देता है। जब पुल उद्घाटन से पहले गिर जाएं, सडक़ें कुछ महीनों में उखड़ जाएं और भवनों में दरारें पड़ जाएं, तब सवाल केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं रह जाता। यह सीधे नागरिकों की सुरक्षा और जीवन से जुड़ा मामला बन जाता है। बिहार सहित कई राज्यों में पुलों के गिरने की घटनाओं ने यह प्रश्न उठाया है कि आखिर भुगतान गुणवत्ता के लिए होता है या केवल कागजों के लिए?
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, फर्जी नियुक्तियां, छात्रवृत्ति घोटाले और कोविड काल में चिकित्सा उपकरणों की खरीद से जुड़े विवाद बताते हैं कि जब व्यवस्था का नैतिक संतुलन बिगड़ता है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर तकनीक होने के बावजूद चोरी रुक क्यों नहीं रही? ई-टेंडरिंग है, ऑनलाइन भुगतान है, आधार सत्यापन है, ड्रोन हैं, जीपीएस है, सीसीटीवी है, सोशल मीडिया है। फिर भी गड़बडिय़ां सामने आती रहती हैं। इसका अर्थ साफ है कि समस्या केवल तकनीक की नहीं है। समस्या जवाबदेही की है, दंड प्रक्रिया की है, संस्थागत निगरानी की है और सबसे बढक़र नैतिकता की है।
कानून का भय तब समाप्त हो जाता है जब दोषियों को यह विश्वास हो जाए कि जांच वर्षों चलेगी, मुकदमे दशकों तक लंबित रहेंगे और अंतत: मामला किसी फाइल में दब जाएगा। यही कारण है कि भ्रष्टाचार के अनेक मामले उजागर होने के बावजूद व्यवस्था में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता।
फिर भी पूरे देश और पूरे सिस्टम को भ्रष्ट घोषित कर देना न्यायसंगत नहीं होगा। आज भी लाखों ईमानदार अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक, डॉक्टर, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और धार्मिक संस्थाएं पूरी निष्ठा से काम कर रही हैं। व्यवस्था इन्हीं लोगों के कारण चल रही है। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि कुछ लोगों की बेईमानी पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाती है।

असल सवाल यह नहीं है कि चोरी कहाँ-कहाँ हो रही है। सवाल यह है कि क्या हमने चोरी को एक सामान्य सामाजिक व्यवहार के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया है? यदि सार्वजनिक धन की लूट, संसाधनों की बंदरबांट और अधिकारों की चोरी को हम केवल खबरों तक सीमित रखेंगे, तो यह धीरे-धीरे व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन जाएगी। लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव नहीं, बल्कि जवाबदेही है। जब तक चोरी करने वालों को त्वरित और कठोर दंड नहीं मिलेगा, जब तक जांच निष्पक्ष और समयबद्ध नहीं होगी, और जब तक समाज ईमानदारी को सम्मान तथा भ्रष्टाचार को सामाजिक तिरस्कार नहीं देगा, तब तक तकनीक भी इस बीमारी का इलाज नहीं बन सकेगी।
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते-लड़ते उस स्थिति तक पहुंच गए हैं जहां चोरी अब अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का एक स्वीकार्य हिस्सा समझी जाने लगी है? यदि ऐसा है, तो यह किसी घोटाले से भी बड़ा राष्ट्रीय संकट है।

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