-सुभाष मिश्र
कहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है, लेकिन आईना कभी पूरा समाज नहीं दिखाता। वह केवल वही दिखाता है, जो उसके सामने होता है। इसलिए किसी भी फिल्म को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। फिल्मकार अपनी दृष्टि, अपनी संवेदना और अपने विचारों के आधार पर किसी घटना को प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि आज वह विचार निर्माण, जनमत निर्माण और वैचारिक संघर्ष का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है। एक अच्छी फिल्म लाखों लोगों की सोच बदल सकती है, समाज को झकझोर सकती है। इतिहास के किसी भूले हुए अध्याय को फिर से चर्चा में ला सकती है, लेकिन यही शक्ति उसे अत्यंत जिम्मेदार भी बनाती है।
पिछले एक दशक में भारत में वास्तविक घटनाओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और जीवित अथवा दिवंगत व्यक्तित्वों पर आधारित फिल्मों का एक नया दौर शुरू हुआ है। 12वीं फेल जैसी प्रेरक फिल्मों से लेकर ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘उरी’, ‘शेरशाह’, ‘मैरी कॉम’, ‘एम.एस. धोनी’, ‘भाग मिल्खा भाग’ समेत अनेक बायोपिक तथा ऐतिहासिक फिल्मों ने यह साबित किया है कि दर्शक अब केवल काल्पनिक कहानियां नहीं, बल्कि वास्तविक घटनाओं को भी पर्दे पर देखना चाहते हैं। जैसे-जैसे सिनेमा वास्तविक घटनाओं के करीब आया है, वैसे-वैसे विवाद भी बढ़े हैं। किसी फिल्म पर इतिहास को तोडऩे-मरोडऩे का आरोप लगता है, किसी पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का, किसी पर राजनीतिक एजेंडा चलाने का और किसी पर समाज को बांटने का। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इतिहास को किसकी नजर से देखा जाए और किसकी नजर से दिखाया जाए।
इसी बहस के केंद्र में इन दिनों अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ है, जिसका प्रारंभिक नाम ‘पंजाब 95’ था। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है। खालरा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार का मामला उजागर किया था। बाद में उनका अपहरण हुआ और उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में कुछ पुलिस अधिकारियों को न्यायालय ने दोषी भी ठहराया। यह पूरा विषय भारतीय इतिहास के सबसे संवेदनशील दौरों में से एक से जुड़ा है, जब पंजाब आतंकवाद, अलगाववाद, हिंसा और सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई के बीच झुलस रहा था। हजारों निर्दोष नागरिक, पुलिसकर्मी, सुरक्षाबल और आम परिवार उस दौर की त्रासदी का हिस्सा बने।
फिल्म कई वर्षों तक सेंसर बोर्ड और निर्माताओं के बीच विवाद का विषय बनी रही। बताया गया कि फिल्म में बड़ी संख्या में संशोधनों की मांग की गई। थिएटर रिलीज संभव नहीं हो सकी। बाद में यह ओटीटी मंच पर बिना कट्स के उपलब्ध हुई, लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसकी उपलब्धता रोक दी गई। इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा, संवेदनशील परिस्थितियों और कानून-व्यवस्था से जुड़े कारण बताए गए। फिल्म के निर्माता और समर्थकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात और इतिहास को दबाने का प्रयास बताया। यही विवाद आज पूरे देश में बहस का विषय बन गया है।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है। संविधान नागरिकों को अपनी बात कहने और रचनात्मक अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। साहित्य, पत्रकारिता, रंगमंच और सिनेमा का दायित्व केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज के कठिन प्रश्नों को सामने लाना भी है। यदि किसी फिल्म में किसी ऐतिहासिक घटना के ऐसे पहलुओं को दिखाया जाता है, जिन पर पहले कम चर्चा हुई हो, तो केवल इस कारण उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह असहज प्रश्न पूछती है। लोकतंत्र की ताकत ही यही है कि वह असहमति और असुविधाजनक प्रश्नों को भी स्थान देता है। लेकिन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
फिल्म किसी शोध प्रबंध की तरह नहीं होती। उसमें घटनाओं को नाटकीय रूप दिया जाता है, पात्रों को भावनात्मक बनाया जाता है और कई बार रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर तथ्यों में परिवर्तन भी किया जाता है। यदि किसी संवेदनशील ऐतिहासिक दौर को एकतरफा ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो उसका असर समाज की सोच पर पडऩा स्वाभाविक है। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग फिल्मों को इतिहास की तरह स्वीकार कर लेता है। यही कारण है कि इतिहास आधारित फिल्मों से अपेक्षा की जाती है कि वे अधिक संतुलित और तथ्यपरक हों।
भारत ने पिछले चार दशकों में आतंकवाद के विरुद्ध कठिन संघर्ष किया है। पंजाब, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर सहित अनेक क्षेत्रों में हजारों सैनिकों, पुलिसकर्मियों और नागरिकों ने अपने प्राण गंवाए हैं, इसलिए जब उस दौर की कोई कहानी पर्दे पर आती है तो केवल मानवाधिकार का प्रश्न नहीं उठता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और उन परिवारों की पीड़ा भी सामने आती है, जिन्होंने आतंकवाद की कीमत चुकाई है। यदि किसी फिल्म में केवल राज्य की गलतियां दिखाई जाएं और आतंकवाद की भयावहता को पर्याप्त संदर्भ न मिले तो चित्र अधूरा रह जाता है। उसी प्रकार यदि केवल आतंकवाद दिखाया जाए और मानवाधिकार से जुड़े प्रश्नों की अनदेखी कर दी जाए, तब भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
वास्तव में इतिहास कभी पूरी तरह काला या सफेद नहीं होता। उसमें अनेक परतें होती हैं। राज्य की अपनी मजबूरियां होती हैं, सुरक्षा बलों की अपनी चुनौतियां होती हैं और कई बार व्यवस्था की गंभीर गलतियां भी सामने आती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबी यही है कि वह इन गलतियों की जांच भी करती है और दोषियों को दंडित भी करती है, इसलिए किसी भी ऐतिहासिक फिल्म का मूल्यांकन उसी संतुलन के आधार पर होना चाहिए।
आज ओटीटी प्लेटफॉर्म को अभिव्यक्ति की सबसे बड़ी आजादी का माध्यम माना जाता है। यहां ऐसी अनेक फिल्में और वेब सीरीज उपलब्ध हैं, जिनमें हिंसा, अपराध, अश्लीलता और अत्यंत विवादास्पद विषयों को खुलकर दिखाया जाता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि इतने विविध प्रकार की सामग्री उपलब्ध है तो किसी ऐतिहासिक फिल्म को लेकर अलग दृष्टिकोण क्यों अपनाया जाता है?
दूसरी ओर सरकार का भी यह दायित्व है कि यदि उसे किसी सामग्री से वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंसा या अलगाववाद को बढ़ावा मिलने की आशंका है तो वह कानून के दायरे में उचित निर्णय ले। ऐसे निर्णयों में अधिकतम पारदर्शिता आवश्यक है। यदि किसी फिल्म पर रोक लगती है तो उसके स्पष्ट और तर्कसंगत कारण सार्वजनिक होने चाहिए, ताकि जनता भी समझ सके कि निर्णय किन आधारों पर लिया गया है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि डिजिटल युग में प्रतिबंध हमेशा समाधान नहीं बनता। जिस फिल्म को कुछ लोग शायद सामान्य रूप से देखते, प्रतिबंध लगते ही वही फिल्म जिज्ञासा का विषय बन जाती है। इंटरनेट के दौर में किसी सामग्री को पूरी तरह रोक पाना लगभग असंभव है, इसलिए लोकतांत्रिक समाज में विचारों का उत्तर विचारों से, तथ्यों का उत्तर तथ्यों से और इतिहास का उत्तर शोध एवं प्रमाणों से दिया जाना अधिक प्रभावी होता है।
दूसरी ओर फिल्म निर्माताओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। जब वे किसी वास्तविक घटना, न्यायिक मामले या संवेदनशील ऐतिहासिक दौर पर फिल्म बनाते हैं तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे पर्याप्त शोध करें, विभिन्न पक्षों को समझें और दर्शकों के सामने ऐसा चित्र प्रस्तुत करें जो भावनात्मक होने के साथ-साथ तथ्यात्मक ईमानदारी भी रखता हो। रचनात्मक स्वतंत्रता का अर्थ तथ्यात्मक लापरवाही नहीं हो सकता।
भारतीय सिनेमा वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है। कुछ फिल्में राष्ट्रवाद को केंद्र में रखती हैं, कुछ सत्ता की आलोचना करती हैं, कुछ सामाजिक अन्याय को उजागर करती हैं और कुछ धार्मिक या सांस्कृतिक विमर्श को। यह विविधता लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन किसी भी विचारधारा को स्थापित करने के लिए इतिहास का चयनात्मक उपयोग लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। समाज को विभाजित करने के बजाय सिनेमा का उद्देश्य संवाद और समझ बढ़ाना होना चाहिए।
‘सतलुज’ का विवाद केवल एक फिल्म का विवाद नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न का प्रतीक है कि क्या लोकतंत्र कठिन और असहज इतिहास का सामना करने के लिए तैयार है? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच ऐसा संतुलन संभव है जिसमें न तो इतिहास दबे और न ही समाज में अनावश्यक वैमनस्य फैले? क्या सरकारों के निर्णय पारदर्शी होंगे और क्या फिल्मकार अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे? इन प्रश्नों के उत्तर केवल इस फिल्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भविष्य में बनने वाली हर ऐतिहासिक और राजनीतिक फिल्म पर लागू होंगे।
भारत जैसा विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र तभी मजबूत माना जाएगा, जब वह न तो असहमति से डरे, न इतिहास से भागे और न ही राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करे। सिनेमा को सच बोलने का अधिकार अवश्य होना चाहिए, लेकिन वह सच तथ्यों, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी पर आधारित होना चाहिए। वहीं सरकारों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी प्रकार की सेंसरशिप अंतिम विकल्प हो, पहला नहीं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह विचारों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें सुनता है, परखता है और कानून तथा संविधान की कसौटी पर उनका मूल्यांकन करता है।
अंतत: ‘सतलुज’ का विवाद हमें यही सिखाता है कि इतिहास को न तो पूरी तरह फिल्मों के भरोसे छोड़ा जा सकता है और न ही उसे प्रतिबंधों के पीछे हमेशा के लिए छिपाया जा सकता है। इतिहास का सम्मान, संविधान की गरिमा, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—इन चारों के बीच संतुलन ही किसी परिपक्व लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है। यही संतुलन भारतीय सिनेमा और भारतीय लोकतंत्र दोनों की वास्तविक परीक्षा भी है।