हार की समीक्षा में अटका विपक्ष, अगले चुनाव की तैयारी में भाजपा

सुभाष मिश्र

भारतीय राजनीति का स्वभाव तेजी से बदल रहा है। कभी देश की राजनीति पर लगभग एकछत्र प्रभाव रखने वाली कांग्रेस आज अपने अस्तित्व और पुनरुत्थान की चुनौती से जूझ रही है। दूसरी ओर, कभी लोकसभा में मात्र दो सांसदों तक सीमित रहने वाली भारतीय जनता पार्टी आज राष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली ताकत बन चुकी है। यह परिवर्तन केवल जनसमर्थन का परिणाम नहीं है, बल्कि संगठन, रणनीति और लगातार चुनावी तैयारी की उस संस्कृति का भी नतीजा है जिसे भाजपा ने वर्षों में विकसित किया है।
लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं होते, बल्कि राजनीतिक दलों की संगठनात्मक क्षमता, नेतृत्व की स्वीकार्यता और जनता से उनके निरंतर संवाद की भी परीक्षा होते हैं। चुनाव समाप्त होते ही जहां अधिकांश विपक्षी दल हार के कारणों की समीक्षा, बैठकों और आरोप-प्रत्यारोप में उलझे दिखाई देते हैं, वहीं भाजपा अगले चुनाव की तैयारियों में जुट जाती है। यही दोनों राजनीतिक संस्कृतियों के बीच सबसे बड़ा अंतर बनकर उभर रहा है।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन माना जाता है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क, नियमित प्रशिक्षण, सामाजिक समीकरणों पर लगातार काम, डेटा आधारित चुनावी रणनीति और चुनावों के बीच भी जनता से संवाद बनाए रखना उसकी कार्यशैली का हिस्सा है। भाजपा के लिए चुनाव परिणाम अंत नहीं, बल्कि अगले चुनाव की शुरुआत होते हैं। यही कारण है कि किसी राज्य में जीत मिले या हार, संगठनात्मक गतिविधियां कभी थमती नहीं हैं।
इसके विपरीत अधिकांश विपक्षी दल चुनावी पराजय के बाद अक्सर ईवीएम, चुनाव आयोग, सरकारी मशीनरी या संसाधनों के असमान उपयोग जैसे मुद्दों को प्रमुख कारण बताते हैं। लोकतंत्र में संस्थाओं पर सवाल उठाना किसी भी राजनीतिक दल का अधिकार है, लेकिन यदि आत्ममंथन केवल बाहरी कारणों तक सीमित रह जाए और संगठन की कमजोरियों, नेतृत्व की चुनौतियों तथा कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता पर गंभीर चर्चा न हो, तो सुधार की संभावनाएं भी सीमित हो जाती हैं।
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पिछले एक दशक में पार्टी कई बार चिंतन शिविर, समीक्षा बैठकें और संगठनात्मक सुधार के संकल्प ले चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिवर्तन अभी तक दिखाई नहीं देता। अनेक राज्यों में नेतृत्व को लेकर असमंजस, वरिष्ठ और युवा नेताओं के बीच मतभेद तथा राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व का अभाव लगातार उसकी चुनावी संभावनाओं को प्रभावित करता रहा है।
क्षेत्रीय दलों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी जैसे दल भी लगातार संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कई राज्यों में विधायकों और सांसदों का दल बदलना, नेतृत्व संघर्ष तथा गठबंधन की अनिश्चित राजनीति विपक्ष की सामूहिक ताकत को कमजोर करती रही है। चुनाव के बाद कई दलों में टूट-फूट और असंतोष का जो सिलसिला देखने को मिलता है, वह यह संकेत देता है कि केवल करिश्माई नेतृत्व किसी दल को लंबे समय तक मजबूत नहीं रख सकता।
इसके विपरीत भाजपा चुनावों के बीच के समय को भी राजनीतिक निवेश का दौर मानती है। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में संगठनात्मक फेरबदल, नए सामाजिक वर्गों तक पहुंच, बूथ समितियों का पुनर्गठन और कार्यकर्ताओं की जवाबदेही तय करना इसी रणनीति का हिस्सा है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और दक्षिण भारत के राज्यों में भी पार्टी लगातार अपने संगठन का विस्तार करने में लगी हुई है। सरकार और संगठन के बीच समन्वय बनाकर भविष्य की राजनीतिक जमीन तैयार करना उसकी कार्यशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
भारतीय राजनीति में एक और बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। अनेक छोटे और क्षेत्रीय दलों में टूट-फूट के बाद उनके नेता या तो भाजपा में शामिल हो रहे हैं या फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा बन रहे हैं। यह केवल राजनीतिक अवसरवाद का प्रश्न नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के भीतर संगठनात्मक अस्थिरता का भी संकेत है। जब किसी दल के अपने कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं होते, तब राजनीतिक पलायन स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
निस्संदेह, किसी भी लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष उतना ही आवश्यक है जितनी मजबूत सरकार। लेकिन मजबूत विपक्ष केवल सरकार की आलोचना से नहीं बनता। इसके लिए स्पष्ट विचारधारा, अनुशासित संगठन, निरंतर जनसंपर्क, प्रशिक्षित कार्यकर्ता और विश्वसनीय नेतृत्व की आवश्यकता होती है। जनता अब केवल चुनावी घोषणाओं से प्रभावित नहीं होती, वह यह भी देखती है कि कौन-सा दल चुनाव खत्म होने के बाद भी उसके बीच मौजूद रहता है और उसकी समस्याओं पर लगातार काम करता है।
भारतीय राजनीति का अगला दौर केवल नेताओं की लोकप्रियता का नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक प्रबंधन की प्रतिस्पर्धा का होगा। भाजपा ने इस दिशा में अपनी बढ़त बना ली है। यदि विपक्ष इस चुनौती का प्रभावी जवाब देना चाहता है तो उसे हार के कारणों की सूची बनाने से आगे बढ़कर अपनी कार्यप्रणाली बदलनी होगी। चुनावी मौसम का इंतजार करने के बजाय जनता के बीच स्थायी उपस्थिति दर्ज करानी होगी, क्योंकि लोकतंत्र में मतदान भले पांच वर्ष में एक बार होता हो, लेकिन राजनीति की तैयारी हर दिन होती है। यही तैयारी अंतत: चुनावी परिणामों का आधार बनती है।

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