-सुभाष मिश्र
लोकसभा चुनाव 2029 अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों यह समझते हैं कि अगले चुनाव केवल मुद्दों से नहीं, बल्कि चुनावी संरचना, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी प्रभावित होंगे। ऐसे में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे विषय केवल संवैधानिक या प्रशासनिक मुद्दे नहीं रह गए हैं, बल्कि आने वाले राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाले विषय बन चुके हैं।
मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में परिसीमन प्रमुख एजेंडे के रूप में दिखाई देता है। सरकार का तर्क है कि बदलती जनसंख्या के अनुरूप लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व भी बदलना चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष, विशेषकर दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल, आशंकित हैं कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो राजनीतिक शक्ति का संतुलन उत्तर भारत की ओर अधिक झुक सकता है। यही कारण है कि परिसीमन की चर्चा शुरू होते ही यह केवल संसदीय सीटों का नहीं, बल्कि संघीय ढांचे, राज्यों के अधिकारों और राजनीतिक संतुलन का प्रश्न बन जाती है।
इसी बीच प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (श्व्रष्ट-क्करू) के एक वर्किंग पेपर ने इस बहस को नई दिशा दी है। इसमें लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर 824 करने का सुझाव दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी संसदीय क्षेत्रों का पुनर्गठन करने के बजाय केवल 170 बड़े संसदीय क्षेत्रों को विभाजित करने का प्रस्ताव है। 273 सीटें यथावत रहेंगी, जबकि 170 सीटों को दो या तीन हिस्सों में बांटकर 281 नई सीटें बनाई जा सकती हैं। यह मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक असंतुलन की आशंकाओं को भी कम करने का प्रयास किया गया है।
भारत में पिछले कई वर्षों से यह बहस चल रही है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफलतापूर्वक लागू किया, क्या उन्हें इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी? दक्षिण भारत के राज्यों का यही सबसे बड़ा तर्क रहा है। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ेंगी तो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलेगा, जबकि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है। यही आशंका इस बहस को केवल संवैधानिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक भी बना देती है।
वर्किंग पेपर का दावा है कि उसका ‘टार्गेटेड डिलिमिटेशन मॉडलÓ इस विवाद का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार दक्षिण भारत की कुल हिस्सेदारी लगभग स्थिर रहेगी और बड़े राज्यों को भी अतिरिक्त प्रतिनिधित्व मिलेगा। यदि यह मॉडल व्यवहार में सफल होता है तो संभव है कि वर्षों से चली आ रही उत्तर-दक्षिण की राजनीतिक खाई कुछ कम हो सके। लेकिन यह अभी केवल एक अध्ययन है, अंतिम निर्णय नहीं।
परिसीमन की आवश्यकता को भी नकारा नहीं जा सकता। आज देश के अनेक लोकसभा क्षेत्रों में 20 से 30 लाख तक मतदाता हैं। एक सांसद के लिए इतने विशाल क्षेत्र में प्रभावी जनसंपर्क बनाए रखना, विकास कार्यों की निगरानी करना और जनता की समस्याओं तक पहुंचना आसान नहीं है। यदि निर्वाचन क्षेत्र छोटे होते हैं तो प्रतिनिधित्व अधिक प्रभावी हो सकता है। लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि जनता और उसके प्रतिनिधि के बीच मजबूत संवाद से भी तय होती है।
लेकिन इसके साथ कई गंभीर प्रश्न भी जुड़े हैं। क्या केवल सीटों की संख्या बढ़ाने से लोकतंत्र मजबूत हो जाएगा? क्या संसद की कार्यक्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ेगी? क्या संसदीय समितियां, संसदीय प्रक्रियाएं और विधायी गुणवत्ता भी समान रूप से मजबूत होगी? नया संसद भवन अधिक सांसदों के लिए तैयार है, लेकिन क्या राजनीतिक संवाद और संसदीय परंपराएं भी उसी गति से विकसित हो पाएंगी?
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न जनगणना का है। वर्तमान वर्किंग पेपर 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है, जबकि वास्तविक परिसीमन नई जनगणना के बाद ही संभव होगा। यदि नई जनगणना के आंकड़े बदलते हैं तो राजनीतिक गणित भी बदल सकता है। इसलिए अभी किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह विषय कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि भविष्य में महिला आरक्षण लागू होता है और उसके साथ परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होती है तो देश का चुनावी नक्शा व्यापक रूप से बदल सकता है। कई संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं बदलेंगी, नए निर्वाचन क्षेत्र बनेंगे और राजनीतिक दलों को अपनी पूरी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी होगी। इसलिए इस बहस को केवल सीटों की संख्या तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
अंतत: परिसीमन केवल गणित का विषय नहीं है। यह लोकतंत्र में समान प्रतिनिधित्व, राज्यों के बीच विश्वास, संघीय ढांचे की मजबूती और राष्ट्रीय एकता की परीक्षा भी है। सरकार की जिम्मेदारी केवल संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि सभी राज्यों और राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर ऐसा समाधान निकालना भी है, जिस पर व्यापक सहमति बन सके।
यदि परिसीमन राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक सुधार के रूप में लागू होता है तो यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े चुनावी सुधारों में गिना जाएगा। लेकिन यदि यह राजनीतिक अविश्वास और क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ाता है, तो आने वाले वर्षों में यही मुद्दा देश की सबसे बड़ी संवैधानिक और राजनीतिक बहस का केंद्र भी बन सकता है। लोकतंत्र की मजबूती केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि विश्वास बढ़ाने से होती है। यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।