(नागरिकता का सवाल और भारत में सामाजिक संशय और राजीनिक द्वंद्व)
-सुभाष मिश्र
नागरिकता का प्रश्न पूरे भारत में चर्चा, बहस, संदेह और उलझ का विषय बन गया है। भारत में यह सवाल पहचान, अधिकार, सुरक्षा, राष्ट्रवाद, और मानवाधिकार की बहस के साथ हमारे समय का सबसे बड़ा प्रश्न बन चुका है। कुछ लोग इसे राजनीतिक सवाल भी बना रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सत्तारूढ़ पार्टी या कहें भाजपा नागरिकता के सवाल को एक राजनीतिक हथियार में बदलकर विपक्ष के वोट काट रही है। इसी के साथ बरसों से भारत में रह रहे बांग्लादेशियों को देश-निकाला दे रही है, लेकिन इन आरोपों में पूरी सच्चाई नहीं है। क्योंकि ये सवाल इतने आसान नहीं हैं। बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों को बाहर करना आर्थिक, सामाजिक और सीमा सुरक्षा हितों से जुड़ी बात भी है। बांग्लादेश की आजादी के तत्काल बाद ही तत्कालीन भारत सरकार ने इस कार्य को कर देना था और शरणार्थियों को वापस बांग्लादेश भेज देना था। किन्हीं कारणों से यह संभव नहीं हो पाया और फिर यह सवाल एक विकट समस्या में बदला और राजनीतिक लाभ-हानि से जुड़ गया, लेकिन नागरिकता के सवाल सिर्फ भारत में ही नहीं है।
अमेरिका से लेकर यूरोप तक, भारत से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक और खाड़ी देशों से लेकर एशिया के छोटे-छोटे देशों तक, लगभग हर जगह नागरिकता के नियमों पर पुनर्विचार हो रहा है। कहीं सीमाएं सख्त की जा रही हैं, कहीं अवैध प्रवासियों की पहचान हो रही है, कहीं जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर बहस है और कहीं दशकों से रह रहे लोगों की वैधानिक स्थिति पर प्रश्न उठ रहे हैं। भारत भी इस बहस से अछूता नहीं है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ, नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों और पहचान की प्रक्रिया को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। स्वाभाविक है कि आम नागरिक के मन में सवाल उठे, आखिर नागरिक कौन है? कौन-सा दस्तावेज उसकी नागरिकता का अंतिम प्रमाण है? क्या आधार कार्ड नागरिकता साबित करता है? क्या मतदाता पहचान पत्र ही पर्याप्त है? यदि कोई व्यक्ति वर्षों से भारत में रह रहा है तो उसकी स्थिति क्या होगी? और यदि कोई भारतीय विदेश जाकर बस जाता है तो उसकी नागरिकता का क्या होगा?
दरअसल, नागरिकता केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह लोकतंत्र की आधारशिला है। मतदान का अधिकार, संविधान द्वारा प्रदत्त संरक्षण, सरकारी योजनाओं का लाभ और राज्य के प्रति कर्तव्य, इन सबका आधार नागरिकता ही है, इसलिए जब नागरिकता पर बहस होती है तो उसका असर केवल कानून तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और राजनीति में दूर तक पहुंचता है। भारत के इतिहास को देखें तो यह प्रश्न और जटिल हो जाता है। 1947 से पहले जिस भूभाग को भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता था, उसमें आज के भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बड़े हिस्से शामिल थे। विभाजन के बाद सीमाएं बदल गईं, लेकिन लोगों के रिश्ते, भाषाएं और सांस्कृतिक संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों का आना-जाना जारी रहा। यही कारण है कि नागरिकता का प्रश्न आज केवल कानूनी नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा तथा मानवीय प्रश्न भी बन गया है।
भारत का नागरिकता कानून स्पष्ट रूप से नागरिकता प्राप्त करने के विभिन्न आधार निर्धारित करता है, जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण और किसी क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर। समय-समय पर इनमें संशोधन भी हुए हैं। आज केवल भारत में जन्म लेना नागरिकता की गारंटी नहीं है। दूसरी ओर भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति भी नहीं देता है। यदि कोई भारतीय स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार करता है तो सामान्यत: उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाती है। विदेशों में बसे भारतीयों के लिए ओसीआई की व्यवस्था है, लेकिन वह नागरिकता नहीं, बल्कि सीमित सुविधाओं वाली विशेष श्रेणी है। यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को लेकर तीखी राजनीतिक बहस चल रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस व्यवस्था में बदलाव के पक्षधर रहे हैं और यह विषय अदालतों तक पहुंच चुका है। ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों ने भी पिछले वर्षों में नागरिकता और स्थायी निवास के नियम पहले से अधिक कठोर किए हैं। वहीं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अन्य खाड़ी देशों में लाखों भारतीय वर्षों से काम कर रहे हैं, लेकिन वहां नागरिकता मिलना आज भी असंभव या अपवाद है।
स्पष्ट है कि पूरी दुनिया अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार नागरिकता की नई परिभाषाएं गढ़ रही है। रोजगार, सुरक्षा, जनसंख्या का दबाव और स्थानीय राजनीति इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं। भारत भी इससे अलग नहीं रह सकता। किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अधिकार और कर्तव्य है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा करे, अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण रखे और यह सुनिश्चित करे कि उसके संसाधनों का लाभ उसके वैध नागरिकों को मिले, लेकिन यहीं से भारत के सामने एक बड़ा वैचारिक प्रश्न खड़ा होता है।
हम वही देश हैं जिसने दुनिया को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्Ó का संदेश दिया। हमने कहा- ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:।Ó हमारी संस्कृति ने पूरी पृथ्वी को एक परिवार माना। हमने कभी मानवता को सीमाओं से बड़ा माना और पूरी सृष्टि में एक ही परमात्मा का वास देखा। आज भी जब भारत विश्वगुरु बनने का सपना प्रस्तुत करता है तो इसी सांस्कृतिक विरासत को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बताता है तो क्या आधुनिक भारत इस आदर्श और वर्तमान राष्ट्रीय नीतियों के बीच संतुलन बना पा रहा है? यह प्रश्न असहज अवश्य है, लेकिन अनावश्यक नहीं।
एक ओर हम चाहते हैं कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और दुनिया के अन्य देशों में रहने वाले भारतीयों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो। हम चाहते हैं कि उन्हें अवसर मिले, भेदभाव न हो और उनके अधिकार सुरक्षित रहें। विदेशों में किसी भारतीय के साथ अन्याय होता है तो पूरा देश उसकी चिंता करता है। दूसरी ओर, जब हमारे यहां दशकों से रह रहे लोगों की बात होती है, चाहे वे सीमावर्ती क्षेत्रों से आए हों, मजदूर हों, घरेलू कामगार हों या छोटे-छोटे रोजगार करने वाले लोग तो बहस का स्वर बदल जाता है। निश्चित रूप से अवैध घुसपैठ और शरणार्थी का प्रश्न अलग है, और किसी भी देश को कानून लागू करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि कानून के साथ न्याय और मानवीय संवेदना भी दिखाई दे। किसी वास्तविक नागरिक को केवल दस्तावेजों की कमी के कारण अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
हाल के वर्षों में नागरिकता की बहस धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ गई है। सार्वजनिक जीवन में ऐसे विचार भी सामने आते हैं कि भारत में रहने वालों को किसी विशेष सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन भारत का संविधान नागरिकता का आधार धर्म नहीं, बल्कि कानून और समान अधिकारों को मानता है। भारतीय होने की पहली पहचान संविधान से निर्धारित होती है। यही संविधान हर नागरिक को समानता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, इसलिए आज आवश्यकता किसी एक पक्ष की जीत की नहीं, बल्कि संतुलन की है। सीमा सुरक्षा भी आवश्यक है, संविधान की मर्यादा भी। अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण भी जरूरी है और वास्तविक नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी। राष्ट्रीय हित भी सर्वोपरि है और मानवीय संवेदना भी भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है।
आखिरकार, नागरिकता केवल पासपोर्ट, आधार या मतदाता सूची में दर्ज एक नाम नहीं है। यह व्यक्ति और राष्ट्र के बीच विश्वास का संबंध है। नागरिकता वह आधार है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है। यदि नागरिक अपने ही अधिकारों को लेकर असमंजस में रहेगा तो लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर होंगी। भारत यदि वास्तव में विश्वगुरु बनने का सपना देखता है तो उसे दुनिया को केवल आर्थिक विकास या सैन्य शक्ति का मॉडल नहीं देना होगा। उसे यह भी दिखाना होगा कि एक राष्ट्र कैसे अपनी सीमाओं की रक्षा करते हुए संविधान, न्याय, मानवीय संवेदना और अपनी सभ्यतागत विरासत, इन सभी के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है। शायद यही भारत की सबसे बड़ी परीक्षा है।