-सुभाष मिश्र
दुनिया आज केवल आर्थिक या सामरिक संकट से नहीं, बल्कि ऊर्जा संकट की चुनौती से भी जूझ रही है। आधुनिक सभ्यता की पूरी व्यवस्था ऊर्जा पर टिकी हुई है और आज भी विश्व की अधिकांश ऊर्जा आवश्यकताएं पेट्रोलियम, डीजल, प्राकृतिक गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से पूरी होती हैं। लेकिन ये संसाधन सीमित हैं। लगातार बढ़ते दोहन, बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के भरोसे भविष्य सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। यही कारण है कि पूरी दुनिया अब ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में लगी हुई है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को यह भी दिखा दिया कि ऊर्जा केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति का भी महत्वपूर्ण आधार है। युद्ध के कारण कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई, कीमतें बढ़ीं और अनेक देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा। इस संकट ने हर देश को आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में तेजी से सोचने पर मजबूर किया।
भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार घाटे और आम लोगों की जेब पर पड़ता है। इसलिए भारत लंबे समय से वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर काम कर रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत, हरित हाइड्रोजन, बायोगैस और जैव ईंधन जैसे विकल्पों को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य भी यही है कि ऊर्जा उत्पादन का विकेंद्रीकरण हो और लोग स्वयं बिजली उत्पादन में भागीदार बनें।
इसी दिशा में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल भारत की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक बनकर सामने आया है। सरकार का लक्ष्य पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाकर आयातित तेल पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त आय देना और प्रदूषण घटाना है। एथेनॉल मुख्यत: गन्ने के शीरे, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इससे एक ओर किसानों के लिए नया बाजार तैयार होता है तो दूसरी ओर पेट्रोल की खपत भी कम होती है।
दुनिया के कई देशों में एथेनॉल का उपयोग वर्षों से सफलतापूर्वक किया जा रहा है। विशेष रूप से ब्राज़ील और अमेरिका ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। ब्राज़ील में तो अनेक वाहन पूरी तरह एथेनॉल अथवा फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर चलते हैं। अमेरिका में भी लंबे समय से पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण सामान्य व्यवस्था का हिस्सा है। वहां इसे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों की दृष्टि से उपयोगी माना जाता है।
भारत में भी एथेनॉल मिश्रित ईंधन का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ कई विवाद भी सामने आए हैं। कुछ लोगों का दावा है कि अधिक एथेनॉल मिश्रण से पुराने वाहनों के इंजन, रबर पाइप, ईंधन टैंक अथवा अन्य पुर्जों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर वाहन निर्माता कंपनियां और विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि निर्धारित मानकों के अनुरूप बने आधुनिक वाहनों में सरकार द्वारा स्वीकृत स्तर तक एथेनॉल मिश्रित ईंधन सुरक्षित माना जाता है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक अध्ययन और तकनीकी तथ्यों को महत्व देना आवश्यक है।
एथेनॉल को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। निजी कंपनियों को लाइसेंस देने, उत्पादन इकाइयों की स्थापना और संभावित हितों के टकराव जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए जाते हैं। लोकतंत्र में इन आरोपों की निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता आवश्यक है। यदि कहीं अनियमितता है तो उसकी जांच होनी चाहिए, लेकिन ऊर्जा नीति जैसे महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि एथेनॉल ऊर्जा संकट का अंतिम समाधान नहीं है। इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। यदि बड़े पैमाने पर खाद्यान्न फसलों का उपयोग ईंधन बनाने में होने लगे तो खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। जल की अधिक आवश्यकता वाली फसलों पर अत्यधिक निर्भरता भी पर्यावरणीय चुनौतियां बढ़ा सकती है। इसलिए एथेनॉल के साथ-साथ दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन, कृषि अपशिष्ट आधारित ईंधन और नई तकनीकों पर भी समान गति से कार्य करना होगा।
भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था केवल एक स्रोत पर आधारित नहीं होगी। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत, परमाणु ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बायोगैस, बैटरी आधारित ऊर्जा भंडारण, इलेक्ट्रिक वाहन और जैव ईंधन—इन सभी का संतुलित मिश्रण ही ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। आज दुनिया जिस तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है, उसी तेजी से बैटरी तकनीक, चार्जिंग नेटवर्क और हरित बिजली उत्पादन का विस्तार भी आवश्यक होगा।
भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि देश समय रहते ऊर्जा के विविध स्रोत विकसित करता है, घरेलू उत्पादन बढ़ाता है, अनुसंधान में निवेश करता है और ऊर्जा दक्षता पर जोर देता है, तो वह न केवल आयातित ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन का नेतृत्व भी कर सकता है।
ऊर्जा का संकट भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकता है, लेकिन यह संकट दूरदृष्टि, वैज्ञानिक सोच और संतुलित नीति से अवसर में भी बदला जा सकता है। एथेनॉल इस परिवर्तन की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, मंजिल नहीं। इसलिए बहस एथेनॉल के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि ऐसी समग्र ऊर्जा नीति की होनी चाहिए जो पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, किसानों, उपभोक्ताओं और आने वाली पीढिय़ों—सभी के हितों की रक्षा कर सके। यही भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का वास्तविक मार्ग है।