-सुभाष मिश्र
राजनीति में कई बार शब्दों से ज़्यादा ख़ामोशी बोलती है। कई बार भाषण से ज़्यादा असर किसी नेता की अनुपस्थिति छोड़ जाती है। लोकतंत्र में जनता सिफऱ् यह नहीं देखती कि नेता क्या बोल रहा है, बल्कि यह भी देखती है कि वह कहाँ है, क्या कर रहा है और जब उसकी ज़रूरत है, तब वह दिखाई दे रहा है या नहीं। इसी संदर्भ में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी एक बार फिर चर्चा में हैं।
नीट पेपर लीक के विरोध में कांग्रेस ने छात्रों की गूंज अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत राहुल गांधी का छात्रों के साथ संवाद कार्यक्रम पहले पटना में प्रस्तावित था, लेकिन बाद में उसे स्थगित कर देहरादून स्थानांतरित कर दिया गया। इस बीच राहुल गांधी कुछ समय से सार्वजनिक गतिविधियों और सोशल मीडिया पर भी अपेक्षाकृत कम दिखाई दिए। उनकी अनुपस्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएँ शुरू हो गईं। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उनके विदेश दौरे और बिहार कांग्रेस की आंतरिक परिस्थितियों जैसे कारणों का उल्लेख किया गया, लेकिन इन पर पार्टी की ओर से विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया। यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
आज का दौर केवल राजनीति का नहीं, बल्कि दृश्य राजनीति का है। अगर कोई नेता मंच पर नहीं है, कैमरे में नहीं है, सोशल मीडिया पर नहीं है, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। पहले किसी नेता के कुछ दिन दिखाई न देने से शायद कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन अब हर दिन, हर घंटे और हर पोस्ट जनता की निगाह में होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, कई केंद्रीय मंत्री हों या विभिन्न दलों के मुख्यमंत्री आज अधिकांश बड़े नेता अपनी गतिविधियों की नियमित जानकारी सार्वजनिक करते हैं। सोशल मीडिया केवल प्रचार का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि जवाबदेही का भी माध्यम बन गया है। जनता यह जानना चाहती है कि उसका प्रतिनिधि किस मुद्दे पर क्या कर रहा है।
राहुल गांधी भी पिछले कुछ वर्षों में इस मामले में पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय दिखाई दिए हैं। संसद से लेकर सड़क तक, यात्राओं से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक, उन्होंने विपक्ष की राजनीति में अपनी स्पष्ट मौजूदगी दर्ज कराई है। एक समय जिस नेता को राजनीतिक व्यंग्य का सबसे आसान निशाना बनाया जाता था, वही आज सत्ता के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपनी राजनीतिक छवि को बदलने का प्रयास किया है और उसमें काफी हद तक सफल भी रहे हैं। यही कारण है कि जब ऐसा नेता अचानक कुछ दिनों के लिए सार्वजनिक जीवन से ओझल हो जाता है, तब उसकी अनुपस्थिति स्वयं एक राजनीतिक घटना बन जाती है।
यह भी सच है कि हर सार्वजनिक व्यक्ति का निजी जीवन होता है। उसे विश्राम का अधिकार है, परिवार के साथ समय बिताने का अधिकार है और निजी यात्राएं करने का भी अधिकार है। लोकतंत्र किसी नेता से चौबीसों घंटे कैमरे के सामने रहने की अपेक्षा नहीं करता। दूसरी ओर, सार्वजनिक जीवन में जितनी बड़ी भूमिका होती है, उतनी ही बड़ी पारदर्शिता की अपेक्षा भी होती है। नेताओं का कार्यक्रम पहले से सार्वजनिक करना केवल औपचारिकता नहीं है। यह लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा है। इससे अफवाहों की गुंजाइश कम होती है और राजनीतिक विरोधियों को अनावश्यक नैरेटिव गढऩे का अवसर भी नहीं मिलता।
आज राजनीति का बड़ा हिस्सा नैरेटिव की लड़ाई बन चुका है। कई बार मुद्दों से अधिक चर्चा इस बात पर होती है कि कौन दिखाई दे रहा है और कौन नहीं। ऐसे में यदि कोई प्रमुख नेता अचानक सार्वजनिक मंचों से गायब हो जाए और उसकी अनुपस्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध न हो, तो राजनीतिक अटकलें तेज होना स्वाभाविक है। यह स्थिति केवल राहुल गांधी तक सीमित नहीं है। यह बात हर दल और हर बड़े नेता पर समान रूप से लागू होती है। जनता आज अपने सांसदों और विधायकों की उपस्थिति, सदन में पूछे गए प्रश्न, क्षेत्र में सक्रियता और सोशल मीडिया पर संवाद, सबका हिसाब रख रही है। कई जगहों पर तो वर्षों क्षेत्र में न पहुँचने वाले जनप्रतिनिधियों के पोस्टर लापता तक लगाए जाते हैं। लोकतंत्र में जनता का यह अधिकार है कि वह अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगे, इसलिए यह बहस किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि बदलती राजनीति की है। आज नेता का मौन भी संदेश देता है और उसकी अनुपस्थिति भी। जितनी तेजी से सूचना फैलती है, उतनी ही तेजी से भ्रम भी फैलता है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों और नेताओं की जिम्मेदारी केवल सक्रिय रहने की नहीं, बल्कि स्पष्ट और पारदर्शी संवाद बनाए रखने की भी है।
लोकतंत्र में विश्वास केवल चुनाव जीतने से नहीं बनता, बल्कि लगातार जनता के बीच उपस्थित रहने से बनता है। क्योंकि राजनीति में कई बार विरोधियों के सवालों से ज्यादा नुकसान अपनी चुप्पी कर देती है और शायद यही इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा सबक है आज के दौर में राजनीति में केवल मौजूद होना पर्याप्त नहीं, बल्कि दिखाई देना भी उतना ही जरूरी है।