0 विनोद कुमार शुक्ल से प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष बातचीत
विनोदजी को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की सूचना पर जब मैं उनके पास सपरिवार उनके घर गया तो वहां बहुत सारे मीडिया और साहित्य से जुड़े लोगों की आवाजाही बनी हुई थी। विनोदजी आपसी बातचीत में कहते हैं कि यह पुरस्कार बहुत बड़ा है, यह मेरी जिंदगी के लिए एक जिम्मेदारी की तरह है जिसे मैं महसूस करता हूं। पुरस्कार मिलने से अच्छा तो लगता है, खुश होता हूं। मेरे लिखने के लिए अभी बहुत कुछ बचा हुआ है।
विनोदजी कहते हैं कि मेरी बहुत सी अधूरी कविताएं हैं जिन्हें मैं लिखना चाहता हूं। मैं लिखने को जरुरी काम की तरह समझता हूं। मुझे लिखना बहुत था, बहुत कम लिख पाया, मैंने देखा बहुत सुना भी मैंने बहुत, महसूस भी किया बहुत लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिख पाया। कितना कुछ लिखना बाकी है। मैं सोचता हूं तो लगता है बहुत कुछ बाकी है। एक बचे हुए को मैं लिख लेता हूं। बचे हुए को मैं अगर ज्यादा नहीं लिख पाऊंगा तो मैं क्या करूं मैं बड़ी दुविधा में बैठा हूं। मैं अपनी जिंदगी का पीछा अपने लेखन से करना चाहता हूं लेकिन मेरी ये जिंदगी कम होने के रास्ते पर तेजी से बढ़ती है और मैं लेखन को उतनी तेजी से बढ़ा नहीं पाता तो कुछ अफसोस भी होता है। विनोदजी कहते हैं कि अपने लिखने को मैं जरुरी काम की तरह महसूस करता हूं। मैंने कविता लिखना छोड़ दिया, लोग ऐसा ना कहें जब भी लोग मेरे बारे में बात करें तो उन्हें लगना चाहिए कि मैं कविता लिख रहा हूं।
विनोदजी की यह बात सुनते हुए मुझे विनोदजी की ही कविता ‘सब कुछ होना बचा रहेगा याद आती है-
जाते जाते ही मिलेंगे लोग उधर के
जाते जाते जाया जा सकेगा उस पार
जाकर ही वहां पहुंचा जा सकेगा
जो बहुत दूर संभव है
पहुंच कर संभव होगा
जाते जाते छूटता रहेगा पीछे
जाते जाते बचा रहेगा आगे
जाते जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब
तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा
और कुछ भी नहीं में
सब कुछ होना बचा रहेगा
इधर के दिनों में बच्चों को लेकर लिखने को लेकर विनोद जी कहते हैं कि मुझे लिखने का एक नया आधार मिला है। मैं बच्चों के बारे में, उनके बचपन के बारे में सोचता हूं। बच्चों को लेकर लिखना मुझे बहुत सहज लगता है, जिम्मेदारी का एहसास होता है।
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा वर्ष 2024 के लिए जब विनोदजी के नाम की घोषणा की गई तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। 1971 में ‘लगभग जयहिंद कविता पुस्तिका के प्रकाशन से अपनी लेखन यात्रा की विधिवत शुरूआत करने वाले विनोद कुमार शुक्ल की अब तक प्रमुख रचनाओं में ‘नौकर की क़मीज़, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी (उपन्यास) ‘पेड़ पर कमरा तथा ‘महाविद्यालय (कहानी-संग्रह) के अलावा कविता-संग्रह लगभग जयहिंद वर्ष 1971, वह आदमी चला गया, नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह वर्ष 1981, सब कुछ होना बचा रहेगा वर्ष 1992, अतिरिक्त नहीं वर्ष 2000, कविता से लंबी कविता वर्ष 2001, आकाश धरती को खटखटाता है वर्ष 2006 पुस्तकें आ चुकी हैं। तीन पुस्तकें शीघ्र आने वाली है। उन्हें अब तक साहित्य अकादमी पुरस्कार, ‘राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान व ‘रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार आदि पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
1 जनवरी 1931 को राजनांदगांव में जन्मे विनोदजी ने 89वें वर्ष में प्रवेश किया है और उनकी लेखन यात्रा निरंतर जारी है। उम्र के इस पड़ाव पर वे चाय पीना, खाना खाना तक भूल जाते हैं।
किन्तु रात में जब भी उन्हें कुछ याद आता है, वे उठकर लिख लेते हैं ताकि बाद में भूले नहीं।
विनोद कुमार शुक्ल हमारे बहुत आत्मीय हैं उनसे मिलकर हम सभी को बहुत अच्छा लगता है। मेरी ऐसे तो उनसे बहुत बात होती है, किन्तु आज ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने की सूचना पर उनसे जो बातचीत हुई उसके अंश-
विनोद कुमार शुक्ल की कविता में पड़ोस बहुत अच्छा है किन्तु वास्तविक में वैसा पड़ोस नहीं है, इस बारे में पूछने पर विनोदजी कहते हैं कि मैंने अपनी कविता में उम्मीद की बात की थी। पड़ोस में अच्छे पड़ोस की कल्पना तो की जा सकती है। उम्मीद के बिना जीवन सुखद नहीं है।
मैं विनोदजी से कहता हूं कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म और लल्लन टॉप जैसे प्लेटफार्म पर सौरभ द्विवेदी और बहुत से लोग आपकी किताबों के बारे में बात करते हुए लोगों को उन्हें पढऩे की सलाह देते हैं, क्या आपको यह पता है।
विनोदजी कहते हैं कि मेरी जानकारी में है कुछ लोग जो मुझसे मिलने आते हैं। अभी तीन दिन पहले ही राजस्थान के बूंदी से कुछ लोग मिलने आये थे, वे कुछ दूर तक पैदल चलकर आये। उन्हें मेरे पास आना किसी अभियान की तरह लगता है। वे पर्यटक की तरह आते हैं। मुझसे मिलने आना जैसे उन्हें किसी पर्यटन स्थल तक आना लगता है।
मैं सिरहाने के पास एक डायरी रखा रहता हूं और जब भी याद आता है उसमें नोट कर लेता हूं। रात को जब उठना हूं चाहे 2.00 बजे हो चाहे 2.30 बजे हो बत्ती जला लेता हूं। उसके बाद जो एक दो लाइन लिखना होता है उसे लिख लेता हूं ताकि सुबह की याददाश्त में रहे।
अभी आपने जैसे लंबी उम्र के बाद कंप्यूटर चलाना सीखा था आपने बहुत सारी चीज की जो इस उम्र में लोग छोड़ देते हैं आपने कंप्यूटर चलाया। अभी टेक्नोलॉजी में इतना नयापन आ गया है अभी कुछ दिनों से चैट जीपीटी है, अभी एक ग्रोक करके साफ्टवेयर आया है उसमें आप जो भी टाइप करो वो आपका जवाब देगा अभी इतनी ज्यादा टेक्नॉलाजी आई है और अपने मोबाइल में हम बहुत सारी चीजें अपने पेड में लिखते हैं।
चूंकि, आप मोबाइल इस्तेमाल नहीं करते तो पुच्चा (विनोदजी का बेटा) के पास रहता है तो आप कागज में ही लिखते हैं क्या हां, मैं कागज पे ही लिखता हूं। बेटा अपने काम में व्यस्त रहता है उसको जो कुछ भी मिला है। वह मेरी रचनाओं को सहेजने में उसको छपवाने का कम उसकी देखरेख का काम करता है। उसके सिवा और किसी को नहीं मालूम क्या वह बहुत व्यस्त रहता है।
पुरस्कार के लिए लेखकों के नाम की अनुशंसा या आवेदन की प्रक्रिया को विनोदजी सहज भाव से लेते हैं। वे कहते हैं कि लेखकों से प्रविष्टि मंगवाना इसलिए भी किया जाता होगा ताकि उन्हें ये ना लगे कि हमने अपने स्तर पर चुनाव ठीक से ना किया होगा। प्रविष्टि से उन्हें चुनने में आसानी होती होगी। वैसे तो विनोदजी से बहुत सारी बातें हुई और होती रहती है पर घर में किसी संत की तरह चुपचाप से बैठे रहने वाले विनोदजी आज मीडिया के लोगों से घिरे हुए थे। विनोदजी को थोड़ा कम सुनाई आता है इसलिए उनसे जोर से बात करनी होती है।
आज विनोदजी को कुछ ज्यादा ही सुनना और बोलना पड़ रहा था इसलिए मैंने ज्यादा बातें नहीं की फिर किसी दिन फुर्सत से बात होगी। विनोदजी से बात करना हमेशा अच्छा लगता है।