शहरीकरण और बुनियादी ढांचे का संकट

विकास की दौड़ में दम तोड़ते शहर और कराहते पहाड़-सुभाष मिश्र

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डिजिटल इंडिया और डेटा सुरक्षा : सुविधा की क्रांति या भविष्य का बड़ा खतरा?

-सुभाष मिश्रभारत तेजी से डिजिटल युग की ओर बढ़ रहा है। आज गांवों तक इंटरनेट पहुंच चुका है, मोबाइल फोन बैंक बन चु...

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बदलाव समाज को करना है

-सुभाष मिश्रकिसी भी समाज में चली रही है परंपराएं तभी बदल सकती हैं या उनका दुरूपयोग रोका जा सकता है जब समाज के ल...

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डिग्री, बेरोजगारी और दिशाहीन युवा

-सुभाष मिश्रभारत आज दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भी भारत के पास है। लं...

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स्क्रीन की निकटता दिल के कितने करीब ?

-सुभाष मिश्रडिजिटल युग में रिश्तों का व्याकरण बदल गया है। भावनाओं की वर्तनी बदल गई है। आपसी रिश्तों की दुनिया ज...

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‘उलटफेर का चुनाव 2026: क्या यह 2029 की प्रस्तावना है?’

-सुभाष मिश्रभारतीय राजनीति में 4 मई 2026 का दिन एक निर्णायक मोड़ की तरह उभरकर सामने आया है। पश्चिम बंगाल, तमिलन...

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मीडिया और लोकतंत्र की आवाज

सुभाष मिश्रयह कहना अब मुश्किल नहीं रह गया है कि मीडिया पर भरोसा तेजी से टूट रहा है। कभी अखबार और चैनल जनता की आ...

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रफ्तार, लापरवाही और मौतें: बढ़ते टूरिज्म के बीच हादसों का देश बनता भारत?

-सुभाष मिश्रभारत तेजी से बदल रहा है। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, ट्रेनें तेज़ हो रही हैं ...

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भारतमाला या भारत-घोटाला?

-सुभाष मिश्रकश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत की एकता का नारा अक्सर गर्व से भरा हुआ सुनाई देता है। लेकिन अगर उसी वाक्य को व्यंग्य की दृष्टि से पढ़ें, तो यह एक और ...

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राजपाट – प्रफुल्ल पारे

पाठक ने बढ़ाई भाजपाइयों की चिंता

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