शहरीकरण और बुनियादी ढांचे का संकट

विकास की दौड़ में दम तोड़ते शहर और कराहते पहाड़

-सुभाष मिश्र

भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। गांवों से शहरों की ओर पलायन, रोजगार की तलाश, आधुनिक सुविधाओं की चाह और औद्योगिक विस्तार ने देश के शहरों की तस्वीर बदल दी है। लेकिन यह बदलाव जितना चमकदार दिखता है, उसके पीछे उतनी ही गहरी अव्यवस्था और संकट की परतें भी छिपी हुई हैं। आज शहर विकास के प्रतीक जरूर बन रहे हैं, मगर उसी अनुपात में वे भीड़, प्रदूषण, ट्रैफिक, अवैध निर्माण और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।
यह संकट केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। पहाड़ी शहरों से लेकर छोटे कस्बों और नई कॉलोनियों तक, हर जगह अनियोजित शहरीकरण की मार साफ दिखाई दे रही है। हाल की शिमला यात्रा में यह संकट और गहराई से महसूस हुआ। पहाड़ लगातार काटे जा रहे हैं, जहां जगह मिली वहां होटल, मकान और व्यावसायिक निर्माण खड़े हो गए। पर्यटन बढ़ा, आबादी बढ़ी, लेकिन सड़कें वही रहीं और पार्किंग की व्यवस्था लगभग नदारद रही। हालत यह है कि अधिकांश वाहन सड़कों के किनारे खड़े रहते हैं। स्थानीय निकायों ने पार्किंग व्यवस्था को लेकर नियम बनाए, लेकिन जमीन पर उनका पालन बेहद कमजोर है।
पहाड़ी शहरों में यह स्थिति केवल असुविधा का मामला नहीं, बल्कि भविष्य के बड़े पर्यावरणीय और मानवीय संकट का संकेत है। पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना से लगातार छेड़छाड़ हो रही है। बारिश के समय भूस्खलन, सड़क धंसने और जल निकासी की समस्याएं बढ़ रही हैं। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति की क्षमता और सीमाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
मैदानी शहरों की हालत भी बहुत अलग नहीं है। नई कॉलोनियां तेजी से बस रही हैं, लेकिन उनमें मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। कई जगह लोग घर के अंदर पार्किंग की जगह को भी निर्माण में बदल देते हैं, परिणामस्वरूप सड़कें ही स्थायी पार्किंग स्थल बन जाती हैं। ट्रैफिक जाम अब महानगरों की ही नहीं, छोटे शहरों की भी पहचान बन चुका है।
भारत में शहरीकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विकास की गति के मुकाबले शहरी नियोजन बेहद कमजोर रहा है। मास्टर प्लान कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीन पर अवैध कॉलोनियां, अतिक्रमण और अव्यवस्थित निर्माण तेजी से बढ़ रहे हैं। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण योजनाएं अधूरी रह जाती हैं या वर्षों तक लटकी रहती हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप और वोट बैंक की राजनीति ने भी इस समस्या को और जटिल बना दिया है।
शहरों पर बढ़ते दबाव की सबसे बड़ी वजह ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाल स्थिति भी है। वर्षों से कहा जाता रहा कि “भारत गांवों में बसता है”, लेकिन वास्तविकता यह है कि गांवों में रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी लोगों को शहरों की ओर धकेल रही है। खेती की स्थिति कमजोर हुई है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट में है और युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर हैं। ऐसे में शहर लोगों के लिए मजबूरी बन गए हैं, विकल्प नहीं।
इसी दबाव का परिणाम है झुग्गी बस्तियों का तेजी से फैलना। बड़े शहरों में लाखों लोग अनौपचारिक बस्तियों में रहने को मजबूर हैं, जहां स्वच्छ पानी, सीवर, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। कई बार स्थानीय राजनीति ने इन बस्तियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया, जिससे समस्या का स्थायी समाधान कभी नहीं निकल पाया। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी पहलें महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन आबादी और जरूरतों की तुलना में अभी भी अपर्याप्त हैं।
शहरीकरण का संकट केवल आवास और ट्रैफिक तक सीमित नहीं है। प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। वाहन, उद्योग और निर्माण गतिविधियां हवा को जहरीला बना रही हैं। नदियां और तालाब सीवर और कचरे से प्रदूषित हो रहे हैं। शहरों में हरित क्षेत्र कम होते जा रहे हैं, जिससे तापमान बढ़ रहा है और “हीट आइलैंड प्रभाव” गंभीर रूप ले रहा है। जल संकट भी तेजी से बढ़ रहा है। भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था भारी मात्रा में पानी बर्बाद कर रही है।
विडंबना यह है कि भारत के शहर “स्मार्ट सिटी” बनने की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन कई जगह बुनियादी जरूरतें ही पूरी नहीं हो पा रहीं। विकास दिखाई देता है, मगर वह संतुलित और टिकाऊ नहीं है। चमकती इमारतों और एक्सप्रेसवे के पीछे बदहाल सीवर सिस्टम, अवैध कॉलोनियां और जाम में फंसी जिंदगी छिपी हुई है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। मेट्रो परियोजनाएं, एक्सप्रेसवे, डिजिटल गवर्नेंस और स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम जैसी पहलें उम्मीद जगाती हैं। लेकिन जरूरत केवल आधुनिक परियोजनाओं की नहीं, बल्कि दूरदर्शी और टिकाऊ शहरी नियोजन की है। शहरों को वाहन-केंद्रित नहीं, बल्कि नागरिक-केंद्रित बनाना होगा। सार्वजनिक परिवहन मजबूत करना होगा, पार्किंग नीति सख्ती से लागू करनी होगी, अवैध निर्माण पर नियंत्रण जरूरी होगा और हरित क्षेत्रों को बचाना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण भारत को मजबूत किए बिना शहरी संकट का समाधान संभव नहीं है। गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होगा तभी शहरों पर दबाव कम होगा। अन्यथा आने वाले वर्षों में शहर विकास के इंजन कम और अव्यवस्था के केंद्र अधिक बन जाएंगे।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती “स्मार्ट सिटी” बनाने की नहीं, बल्कि “रहने योग्य और टिकाऊ शहर” बनाने की है। यदि समय रहते योजनाबद्ध विकास नहीं हुआ तो बढ़ता शहरीकरण भविष्य में जल संकट, प्रदूषण, सामाजिक असमानता और पर्यावरणीय आपदाओं का सबसे बड़ा कारण बन सकता है।

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