-सुभाष मिश्र
कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत की एकता का नारा अक्सर गर्व से भरा हुआ सुनाई देता है। लेकिन अगर उसी वाक्य को व्यंग्य की दृष्टि से पढ़ें, तो यह एक और कड़वी सच्चाई उजागर करता है—क्या भ्रष्टाचार भी उतनी ही मजबूती से पूरे देश को जोड़ता है? भारतमाला परियोजना, जो देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का सपना लेकर आई थी, आज उसी पर सवालों के बादल मंडरा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में सामने आया मुआवजा घोटाला इस पूरे सिस्टम की एक झलक मात्र है। जमीनों को टुकड़ों में बांटना, रिश्तेदारों के नाम पर खरीद-फरोख्त, और फिर भारी मुआवजा वसूलना, यह कोई आकस्मिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खेल प्रतीत होता है। हालिया छापेमारी में प्रवर्तन निदेशालय ने रायपुर, भिलाई, बिलासपुर, कोरबा और अंबिकापुर में जिस तरह से दस्तावेज और डिजिटल सबूत खंगाले हैं, उससे साफ संकेत मिलता है कि मामला सतही नहीं, बल्कि गहरे नेटवर्क से जुड़ा हुआ है।
और यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। प्रारंभिक जांच में जो पैटर्न सामने आया है, राजनीतिक रसूखदारों द्वारा पहले जमीन खरीदना और बाद में उसी पर मोटा मुआवजा लेना, वह पूरे तंत्र की मिलीभगत की ओर इशारा करता है। दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि इसमें किसी एक दल के लोग नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के नाम सामने आ रहे हैं। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है, क्या भ्रष्टाचार अब विचारधारा से ऊपर उठकर साझा हित बन चुका है?
मामला सिर्फ जमीन मुआवजे तक सीमित नहीं है। जांच की परतें खुलते-खुलते दुबई कनेक्शन तक पहुंच रही हैं, और अन्य घोटालों से इसके तार जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। यानी विकास परियोजना के नाम पर जो धन जनता के हित में लगना था, वह कहीं और खपाया जा रहा है।
यहां सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। कभी सूचना का अधिकार अधिनियम को एक क्रांतिकारी कदम माना गया था, जिसने व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का वादा किया था। लेकिन आज हालात यह हैं कि सूचनाएं हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है, और जो आवाज उठाता है, उसे किसी न किसी तरीके से मैनेज कर लिया जाता है।
चुनावी व्यवस्था भी इस चक्र का अहम हिस्सा बन चुकी है। चुनाव इतने महंगे हो गए हैं कि बिना भारी फंडिंग के लडऩा मुश्किल है। यह फंडिंग कहां से आती है? जाहिर है, कहीं न कहीं से वही पैसा आता है, जो बाद में वसूली के रूप में जनता पर ही लौटता है—ठेकों, परियोजनाओं और मुआवजों के जरिए।
तो क्या समाधान है?
क्या पारदर्शिता, सुशासन और ईमानदारी जैसे शब्द केवल भाषणों और सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह गए हैं? सच यह है कि समस्या केवल किसी एक परियोजना या राज्य की नहीं है। यह एक व्यापक संरचनात्मक संकट है, जिसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और जन-जागरूकता—तीनों की कमी साफ दिखाई देती है।
भारतमाला परियोजना का उद्देश्य देश को सड़कों से जोडऩा था, लेकिन अगर इसी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की परतें देश को जोडऩे लगें, तो यह विकास नहीं, विडंबना बन जाती है।
अब समय आ गया है कि केवल जांच एजेंसियों की छापेमारी से आगे बढ़कर, जवाबदेही तय हो, प्रक्रियाएं डिजिटल और पारदर्शी हों, और दोषियों को वास्तविक सजा मिले। वरना कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है, यह नारा एक दिन विकास की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की एकता का प्रतीक बनकर रह जाएगा।
भारतमाला या भारत-घोटाला?

02
May