शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बीच चमके 84 शेयर, निवेशकों को मिला बंपर रिटर्न

भारतीय शेयर बाजार के लिए पिछला कुछ समय काफी उठापटक वाला रहा है। विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई ने भारतीय बाजार से करीब साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड तोड़ बिकवाली की है। इस भारी बिकवाली से एक बार तो दलाल स्ट्रीट पूरी तरह हिल गया था। हर तरफ बाजार के गिरने और निवेशकों के पैसे डूबने की खबरें चल रही थीं। लेकिन इस बड़े आर्थिक संकट के बीच भी भारतीय बाजार के अंदर एक अलग ही कहानी लिखी जा रही थी। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस मंदी के माहौल में भी 84 ऐसे छिपे रुस्तम शेयर मौजूद थे, जो न सिर्फ डटे रहे बल्कि उन्होंने निवेशकों को छप्परफाड़ रिटर्न देकर मालामाल कर दिया।

विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली और घरेलू निवेशकों का भरोसा

दुनियाभर में ब्याज दरों में अनिश्चितता और तनाव के कारण विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से अपने पैसे तेजी से निकाले। इतनी बड़ी रकम का बाजार से बाहर जाना किसी भी मार्केट को क्रैश करने के लिए काफी था। लेकिन इस बार भारत के घरेलू और छोटे खुदरा निवेशकों ने बाजार को संभाल लिया। जब विदेशी निवेशक बैंकिंग और आईटी जैसे बड़े शेयरों को बेचकर भाग रहे थे, तब भारतीय निवेशकों के भरोसे ने मार्केट को एक मजबूत सुरक्षा कवच दिया और निफ्टी-सेंसक्स को थामे रखा।

मंदी के तूफान को मात देने वाले चैंपियन शेयर

बाजार के जानकारों के मुताबिक, जिन 84 शेयरों ने इस मंदी में इतिहास रचा है, उनकी कमाई की रफ्तार बेहद मजबूत थी। इन कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर बाहरी या वैश्विक झटकों का कोई असर नहीं पड़ा। इनमें मुख्य रूप से डिफेंस, इंफ्रास्ट्रक्चर, रिन्यूएबल एनर्जी और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं। इन सेक्टर्स को सरकार के बजट खर्च और घरेलू खपत का सीधा फायदा मिल रहा है। जब बड़े विदेशी संस्थान बिकवाली कर रहे थे, तब समझदार घरेलू फंड्स और आम निवेशकों ने इन चुनिंदा शेयरों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी शुरू कर दी थी।

खुदरा निवेशकों के लिए बड़ा सबक

बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि यह डेटा साबित करता है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली का मतलब बाजार का खत्म होना नहीं होता। जब हर तरफ बाजार डूबने का शोर हो, तब शांत पड़े अच्छी क्वालिटी वाले मिड और स्मॉल कैप शेयरों में कमाई के बेहतरीन मौके बन रहे होते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का घरेलू ग्रोथ इंजन अब काफी मजबूत और आत्मनिर्भर हो चुका है, जो वैश्विक बिकवाली के दबाव को आसानी से झेल सकता है।

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