रफ्तार, लापरवाही और मौतें: बढ़ते टूरिज्म के बीच हादसों का देश बनता भारत?

-सुभाष मिश्र

भारत तेजी से बदल रहा है। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, ट्रेनें तेज़ हो रही हैं और पर्यटन, खासकर जल पर्यटन एक नए उत्साह के साथ फैल रहा है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में नदियों, डैम और जलाशयों को पर्यटन के नए केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। बरगी डैम, गंगरेल, हसदेव, इंद्रावती—ये नाम अब सिर्फ जल संसाधन नहीं, बल्कि पर्यटन के आकर्षण बन चुके हैं। परिवार, युवा, पर्यटक—हर कोई इन जगहों पर जा रहा है, बोटिंग कर रहा है, वाटर स्पोर्ट्स का आनंद ले रहा है।
लेकिन इसी उत्साह के बीच एक खतरनाक सच्चाई भी आकार ले रही है—हम विकास की रफ्तार तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन सुरक्षा की समझ और व्यवस्था पीछे छूट रही है। सवाल यह नहीं है कि हादसे क्यों हो रहे हैं, सवाल यह है कि क्या ये हादसे अब ‘नियम बनते जा रहे हैं?
भारत में हर साल लाखों सड़क हादसे होते हैं और डेढ़ लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा देते हैं। रेल हादसे अपेक्षाकृत कम होते हैं, लेकिन जब होते हैं तो सैकड़ों जिंदगियां एक साथ खत्म कर देते हैं—जैसे Odisha train collision 2023 ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हवाई दुर्घटनाएं कम हैं, लेकिन उनमें बचने की संभावना बेहद कम होती है।
और अब, जल मार्ग जो लंबे समय तक अपेक्षाकृत सुरक्षित और शांत माना जाता था, वह भी लगातार हादसों की खबरों में शामिल होने लगा है।
हाल ही में Bargi Dam में हुआ हादसा सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि यह उस पूरी सोच और सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है, जिसके सहारे हम पर्यटन को बढ़ा रहे हैं। लोग नाव में सवार थे, लेकिन लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी। मौसम खराब होने के संकेत थे, फिर भी बोटिंग जारी रही। सुरक्षा ब्रीफिंग, आपातकालीन तैयारी, प्रशिक्षित स्टाफ ये सब या तो अनुपस्थित थे या औपचारिकता बनकर रह गए थे।
हादसे के बाद वही परिचित तस्वीर सामने आती है, अधिकारियों का सस्पेंशन, जांच समिति का गठन, बयान और आश्वासन। लेकिन क्या यह सिलसिला हर बार नहीं दोहराया जाता?
हर हादसे के बाद कार्रवाई होती है, लेकिन क्या कभी व्यवस्था बदलती है?
सच यह है कि ये हादसे अचानक नहीं होते। ये बनते हैं धीरे-धीरे, लगातार जब नियमों को हल्के में लिया जाता है, जब सुरक्षा को खर्च समझा जाता है, जब निगरानी ढीली होती है और जब जवाबदेही तय नहीं होती।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जल पर्यटन का विस्तार एक सकारात्मक कदम है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाता है, रोजगार देता है और लोगों को नए अनुभव प्रदान करता है। लेकिन अगर इस विस्तार के साथ सुरक्षा का ढांचा मजबूत नहीं किया गया, तो यही पर्यटन ‘आकर्षण से ‘खतरा बन सकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि जल पर्यटन को सिर्फ एक गतिविधि नहीं, बल्कि एक उच्च जोखिम संचालन के रूप में देखा जाए। हर नाव, हर बोट, हर ऑपरेटर के लिए सख्त नियम हों और उनका पालन जमीन पर दिखे, कागजों में नहीं।
क्या हर यात्री को लाइफ जैकेट पहनाना अनिवार्य है? क्या हर यात्रा से पहले सुरक्षा ब्रीफिंग दी जाती है? क्या मौसम की चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाता है? क्या आपातकालीन स्थिति में तुरंत बचाव की व्यवस्था मौजूद है?
अगर इन सवालों के जवाब ‘नहीं हैं, तो फिर हादसे ‘अपरिहार्य नहीं, बल्कि ‘निश्चित हैं।
यह भी समझना होगा कि समस्या सिर्फ सरकार या सिस्टम की नहीं है। हमारी अपनी मानसिकता भी इसमें शामिल है। हम अक्सर सुरक्षा नियमों को नजर अंदाज करते हैं, लाइफ जैकेट पहनने में लापरवाही, ओवरलोडेड नाव में बैठ जाना, जोखिम को ‘मज़ा समझ लेना, ये सब हमारे व्यवहार का हिस्सा बन चुका है।
लेकिन क्या यह ‘मज़ा किसी की जान से बड़ा है? आज जब जल पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है, तो यह जरूरी है कि हम इसे उसी गंभीरता से लें, जैसे हवाई या रेल यात्रा को लेते हैं। वहां एक-एक नियम का पालन होता है, एक-एक प्रक्रिया तय होती है तभी दुर्घटनाएं कम होती हैं।
हमें यह तय करना होगा कि क्या हम हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक दुख जताकर आगे बढ़ जाएंगे, या इस बार सच में सीखेंगे? क्योंकि सच्चाई यही है
अगर हमने अभी नहीं सीखा, तो हादसे रुकेंगे नहीं। वे बढ़ेंगे—रफ्तार के साथ, लापरवाही के साथ। और अगली बार जब कोई नाव पलटेगी, कोई ट्रेन पटरी से उतरेगी या कोई सड़क हादसा होगा, तो वह सिर्फ एक ‘खबर नहीं होगी।
वह किसी घर का चिराग बुझा देगी।

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