मंत्री नेताम के दावे में छिपा पैगाम !

0 कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना नेताम की रणनीति पर उठे सवाल

0 नेताम का बयान-लाइमलाइट की राजनीति या सत्ता की तैयारी

कृष्ण कुमार सिकंदर

रायपुर। प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बयानबाज़ी का तापमान चढ़ गया है, और इस बार केंद्र में हैं रामविचार नेताम। उनके ताज़ा दावे कि बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस के कई विधायक भाजपा का दामन थाम लेंगे ने राजनीतिक हलकों में हलचल तो मचा दी है, लेकिन इस दावे की गंभीरता से ज्यादा उसकी मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। क्योंकि जिस अंदाज़ में यह बयान सामने आया है, वह ज़्यादा एक सियासी तीर जैसा लगता है, जिसका निशाना कहीं और है और दिखावा कहीं और।

कांग्रेस ने इस दावे को न केवल खारिज किया, बल्कि पलटवार भी उसी तीखेपन से किया। प्रदेश कांग्रेस संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने सीधा आरोप जड़ दिया कि खुद नेताम ही कांग्रेस के संपर्क में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने उनके जूनियर को मुख्यमंत्री बनाकर नेताम की राजनीतिक हैसियत को ठेस पहुंचाई है, और अगर कांग्रेस सिर्फ इशारा कर दे, तो नेताम अपने समर्थकों के साथ सरकार गिराने की स्थिति में आ सकते हैं। यह बयान केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक चोट है, जो नेताम के दावे को उल्टा उन्हीं पर ही खड़ा कर देता है।

यहीं नहीं, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने भी इस पूरे प्रकरण को “कोरा और निराधार” करार देते हुए इसे मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश बताया। पायलट का संकेत साफ है, जब सरकार या सत्ताधारी दल के पास ठोस उपलब्धियां दिखाने को कम हों, तो इस तरह की अटकलों और दावों के सहारे राजनीतिक माहौल गरमाने की कोशिश की जाती है।

दरअसल, छत्तीसगढ़ की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकार इस पूरे घटनाक्रम को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं। उनका मानना है कि रामविचार नेताम की निगाहें सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्ता के शीर्ष तक जाती हैं। प्रदेश में आदिवासी नेतृत्व को लेकर भाजपा की रणनीति किसी से छिपी नहीं है, और नेताम खुद को उस संभावित चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं। ऐसे में लगातार सुर्खियों में बने रहना, बड़े और चौंकाने वाले दावे करना, और राजनीतिक विमर्श को अपने इर्द-गिर्द घुमाना यह सब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

लेकिन सियासत की सच्चाई इतनी सीधी नहीं होती। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसे आगे करेगा, यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब अक्सर आखिरी वक्त तक रहस्य ही बना रहता है। खुद पार्टी के भीतर भी इस पर अंतिम निर्णय कुछ चुनिंदा चेहरों तक ही सीमित रहता है। ऐसे में नेताम के बयान भले ही सतह पर लहरें पैदा कर दें, लेकिन क्या वे गहराई में कोई वास्तविक राजनीतिक प्रवाह ला पाएंगे, इस पर संदेह बना हुआ है।

कुल मिलाकर, यह पूरा घटनाक्रम छत्तीसगढ़ की राजनीति में “कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना” वाली कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करता नजर आता है। बयानबाज़ी की यह गर्मी फिलहाल सुर्खियां जरूर बटोर रही है, लेकिन इसके पीछे छिपी महत्वाकांक्षा और रणनीति को समझना ही असली सियासी कहानी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *