सुभाष मिश्र
यह कहना अब मुश्किल नहीं रह गया है कि मीडिया पर भरोसा तेजी से टूट रहा है। कभी अखबार और चैनल जनता की आंख और कान माने जाते थे, आज वही संदेह के घेरे में हैं। फर्क साफ दिखता है। खबर कम है, शोर ज्यादा है। सवाल कम हैं, बयान ज्यादा हैं। और सच तो यह है कि इस गिरावट को सिर्फ गलती या कमजोरी कहकर नहीं टाला जा सकता। यह एक सुनियोजित बदलाव का नतीजा है , जिसमें मीडिया की रीढ़ धीरे-धीरे तोड़ी गई है।
दुनिया भर में एक खतरनाक ट्रेंड उभरा है। सत्ता में बैठे लोग मीडिया को सहयोगी नहीं बल्कि बाधा मानने लगे हैं। वे चाहते हैं कि खबर वही चले जो उन्हें सूट करे। जो सवाल पूछे, उसे किनारे कर दो। जो झुके, उसे आगे बढ़ा दो। यह खेल नया नहीं है, लेकिन अब यह खुलकर खेला जा रहा है। खासकर बड़े पूंजीपति देशों में यह ज्यादा साफ दिखता है। वहां सरकारें मीडिया को सीधे टारगेट करती हैं। कभी उसे झूठा बताकर, कभी उसकी फंडिंग पर चोट करके, कभी उसे कानूनी जाल में फंसा कर।
जब कोई ताकतवर नेता मीडिया को खुलेआम अपमानित करता है, तो वह सिर्फ एक संस्था को नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को चुनौती देता है। यह संदेश दिया जाता है कि सत्ता सवालों से ऊपर है। और यहीं से खतरा शुरू होता है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे जरूरी चीज है जवाबदेही। अगर सवाल पूछने वाला ही दबा दिया जाएगा, तो जवाब कौन मांगेगा ?
मीडिया पर दबाव सिर्फ राजनीतिक नहीं है, आर्थिक भी है। बड़े मीडिया घरानों का कारोबार बहुत बड़ा हो चुका है। उनके कई तरह के बिजनेस हैं। ऐसे में वे टकराव से बचते हैं। उन्हें डर रहता है कि अगर सरकार नाराज हुई तो नुकसान होगा। यही डर उन्हें कमजोर बनाता है। वे खबर दिखाने से पहले सोचते हैं कि इसका असर क्या होगा। और कई बार खबर दिखाने से ही बचते हैं।
और यह कोई नई बात नहीं है । बरसों पहले यह अमेरिका में शुरू हुआ था और उसी से प्रेरणा लेकर 70 के दशक में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे भारतीय मीडिया पर आजमाया । यानी सत्ता और मीडिया के संबंधों के द्वंद्व की जड़ बहुत पीछे है ।
यहीं से पत्रकारिता का असली संकट शुरू हुआ है। जब खबर का फैसला सच के आधार पर नहीं बल्कि फायदे और नुकसान के आधार पर होने लगे, तो समझिए कि मीडिया अपनी भूमिका से भटक चुका है। वह जनता का नहीं, अपने हितों का प्रतिनिधि बन गया है।
आगे चलकर स्थिति और खराब हुई । अब अखबार यह चैनल में संपादक गैर जरूरी हो गया है। अब मैनेजर महत्वपूर्ण हो गया है। खोजी पत्रकारिता खत्म हो चुकी है । खबरें रेडीमेड रहती हैं या बनाई जाती हैं , उसके लिए प्रतिभा की जरूरत नहीं है , खबरें भी मैनेज की जाती हैं । और मैनेजर सब कुछ करता है । अधिकांश बड़े मीडिया घराने अब वित्तीय लाभ के अवसर देखते हैं । जनता के हित या जनता की आवाज बनने में उनकी दिलचस्पी नहीं रह गई है । कई न्यूज़रूम में संपादकीय विवेक की जगह मार्केटिंग और मैनेजमेंट का दबदबा दिखता है। मीडिया के इस बदलाव की जड़ें 1990 के बाद ज्यादा फैलीं । उदारीकरण के दौर में बड़े कॉर्पोरेट घरानों का मीडिया में प्रवेश हुआ। धीरे-धीरे मीडिया एक सार्वजनिक सेवा से ज्यादा एक व्यावसायिक उत्पाद बन गया। जब खबरें उत्पाद बन जाती हैं, तो उनका मूल्य जनहित नहीं, बल्कि बाजार तय करता है।
इस पूरी तस्वीर में एक दिलचस्प बात यह है कि छोटे और क्षेत्रीय अखबार अभी भी कुछ हद तक लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके पास बड़े संसाधन नहीं हैं, लेकिन उनमें जोखिम उठाने की थोड़ी हिम्मत बची है। वे स्थानीय मुद्दों को उठाते हैं, सीधे लोगों से जुड़े रहते हैं। लेकिन उनका दायरा सीमित है और उन पर भी दबाव कम नहीं है। फिर भी वे इस अंधेरे में एक छोटी सी रोशनी की तरह है ।
यह भी एक कड़वा सच है कि अधिकांश मीडिया-घर अब प्रायः खुद ही जज और जांच एजेंसी की भूमिका में आने लगे है। बिना पर्याप्त तथ्यों के फैसले सुनाना, ट्रायल बाय मीडिया चलाना और व्यक्तियों या समुदायों को कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक प्रवृत्ति है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ मामलों में मीडिया की भूमिका पर टिप्पणी भी इसी चिंता को दर्शाती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है; उसके साथ जिम्मेदारी और संवैधानिक मर्यादाएँ भी जुड़ी हैं।
सबसे मुश्किल स्थिति उन पत्रकारों की है जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। वे सिस्टम के भीतर रहते हुए भी उससे लड़ते हैं। लेकिन उन्हें न तो संस्थान का पूरा समर्थन मिलता है और न ही सुरक्षा। कई बार उन्हें नौकरी खोने का डर रहता है, कई बार कानूनी कार्रवाई का। यह डर ही सबसे बड़ा हथियार है, जिससे मीडिया को काबू में रखा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो यह संकट और गहरा है। बड़ी ताकतें अब सूचना को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। वे तय करती हैं कि कौन सी खबर चलेगी, कौन सी दबाई जाएगी। अमेरिका -ईरान युद्ध में अमेरिका के लोभी और साम्राज्यवादी आक्रमण को एक देश के न्याय की तरह दिखाया जा रहा है। अलबत्ता सोशल मीडिया ट्रम्प के सारी कुटिल पोल खोल रहा है । हालांकिअमेरिका जैसा देश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी इस खेल का हिस्सा बना चुका है। एल्गोरिदम तय करते हैं कि आप क्या देखेंगे। और यह सब इतनी चुपचाप होता है कि आम आदमी को पता भी नहीं चलता कि उसके सामने जो सच है, वह पूरी तस्वीर नहीं है।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए सीधी चुनौती है। लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है। यह जानकारी पर आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया है। अगर जानकारी ही गलत या अधूरी होगी, तो फैसले कैसे सही होंगे। यही वजह है कि मीडिया की आजादी को लोकतंत्र की नींव माना जाता है।
लेकिन आज वही नींव कमजोर की जा रही है। कभी कानून के जरिए, कभी बाजार के जरिए, कभी दबाव के जरिए। और सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सब धीरे-धीरे हो रहा है। कोई बड़ा धमाका नहीं होता, बस धीरे धीरे स्पेस कम होता जाता है। और एक दिन पता चलता है कि अब बोलने की जगह ही नहीं बची।
इस माहौल में सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की ही है। उसे तय करना होगा कि वह किसके साथ खड़ा है। पूँजी के साथ या जनता के साथ। यह आसान फैसला नहीं है, क्योंकि इसके साथ जोखिम जुड़ा है। लेकिन अगर यह फैसला नहीं लिया गया, तो मीडिया का अस्तित्व ही सवाल में पड़ जाएगा।
साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी है। अगर लोग सिर्फ मनोरंजन चाहते रहेंगे और गंभीर खबरों से मुंह मोड़ेंगे, तो मीडिया भी वही दिखाएगा जो बिकता है। इसलिए जागरूक दर्शक और पाठक होना भी जरूरी है। सवाल पूछना सिर्फ पत्रकार का काम नहीं है, यह हर नागरिक का अधिकार और जिम्मेदारी है।
अंत में बात साफ है। मीडिया की लड़ाई सिर्फ मीडिया की नहीं है। यह लोकतंत्र की लड़ाई है। अगर मीडिया कमजोर होगा, तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा। और अगर लोकतंत्र कमजोर हुआ, तो उसका असर हर नागरिक पर पड़ेगा।आज अमेरिका ही नहीं पूरा यूरोप बल्कि विश्व के अधिकांश देश इस युद्ध से पैदा हुए संक टको झेल रहे हैं । इसलिए इस संकट को समझना और इसके खिलाफ आवाज उठाना आज पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।