-सुभाष मिश्र
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भी भारत के पास है। लंबे समय तक इसे भारत की सबसे बड़ी ताकत कहा गया। यह माना गया कि जिस देश के पास सबसे ज्यादा युवा होंगे, वही आने वाले समय में दुनिया की आर्थिक और सामाजिक शक्ति बनेगा। लेकिन आज यही सवाल सबसे गंभीर रूप में सामने खड़ा है कि क्या भारत का युवा वास्तव में उस दिशा में आगे बढ़ रहा है जिसकी कल्पना की गई थी? क्या उसके पास रोजगार है? क्या उसके पास स्थिर भविष्य है? क्या उसकी शिक्षा उसे जीवन के लिए तैयार कर रही है? या फिर वह डिग्रियों के बोझ और बेरोजगारी की निराशा के बीच धीरे-धीरे दिशाहीन होता जा रहा है?
पिछले कुछ दशकों में देश में शिक्षा का विस्तार तेजी से हुआ। गांवों तक स्कूल पहुंचे, छोटे शहरों में कॉलेज खुले, विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी। स्कूल छोडऩे वालों की संख्या पहले की तुलना में कम हुई। बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा तक पहुंचे। यह बदलाव सकारात्मक भी था क्योंकि शिक्षा किसी भी समाज के विकास की पहली शर्त मानी जाती है। लेकिन इसी शिक्षा व्यवस्था के भीतर एक बड़ा विरोधाभास भी पैदा हुआ। डिग्रियां बढ़ती गईं, लेकिन रोजगार नहीं बढ़े। शिक्षित युवाओं की संख्या बढ़ी, लेकिन रोजगार बाजार उनकी गति से तैयार नहीं हो पाया।
आज स्थिति यह है कि लाखों युवा स्नातक, परास्नातक, इंजीनियरिंग और तकनीकी डिग्रियां लेकर भी बेरोजगार हैं। कई बार ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जहां चपरासी या क्लर्क की कुछ सौ नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आते हैं और उनमें इंजीनियर, एमबीए और पीएचडी धारक तक शामिल होते हैं। यह केवल बेरोजगारी का संकट नहीं है, बल्कि शिक्षा और रोजगार व्यवस्था के बीच गहरे असंतुलन का संकेत है।
देश का युवा आज सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियों की ओर देखता है क्योंकि वहां स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान दिखाई देता है। लेकिन सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार सीमित होती गई है। कई विभागों में वर्षों तक पद खाली रहते हैं। भर्ती प्रक्रियाएं इतनी लंबी हो चुकी हैं कि विज्ञापन निकलने से लेकर नियुक्ति तक कई बार पांच-पांच साल गुजर जाते हैं। इस बीच पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, कोर्ट केस और भ्रष्टाचार जैसी घटनाएं युवाओं का भरोसा तोड़ देती हैं। लाखों युवा अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में निकाल देते हैं। कई लोग आयु सीमा के करीब पहुंच जाते हैं। असफलता केवल आर्थिक नहीं रहती, वह मानसिक और सामाजिक संकट बन जाती है।
निजी क्षेत्र से उम्मीद थी कि वह रोजगार का बड़ा आधार बनेगा, लेकिन वहां भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। निजी कंपनियों में नौकरी की स्थिरता कम है, शुरुआती वेतन कम है और काम का दबाव अत्यधिक है। आर्थिक मंदी आते ही सबसे पहले कर्मचारियों की छंटनी शुरू हो जाती है। गिग इकॉनमी के नाम पर बड़ी संख्या में युवा फूड डिलीवरी, कैब सेवा और अस्थायी कामों में लगे हैं, लेकिन वहां सामाजिक सुरक्षा लगभग नहीं है। युवा काम तो कर रहा है, लेकिन भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की है। नई शिक्षा नीति में कौशल आधारित शिक्षा और रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रमों की बात जरूर की गई, लेकिन जमीन पर आज भी शिक्षा अधिकतर डिग्री आधारित ही है। कॉलेजों में व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी है। उद्योगों की जरूरत और पाठ्यक्रमों के बीच कोई स्पष्ट तालमेल नहीं दिखता। छात्र डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उन्हें यह तक स्पष्ट नहीं होता कि वे वास्तव में किस काम के लिए तैयार हैं। शिक्षा ने उन्हें परीक्षा पास करना सिखाया, लेकिन जीवन और रोजगार की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार नहीं किया।
यह संकट केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक भी नहीं बना पा रही। यदि किसी युवा को नौकरी नहीं मिलती, तो उसके पास जीवन को सकारात्मक दिशा देने की वैचारिक तैयारी भी कम दिखाई देती है। उसे यह नहीं सिखाया गया कि वह स्वयं रोजगार कैसे पैदा कर सकता है, समाज में अपनी भूमिका कैसे तय कर सकता है या असफलताओं से कैसे लड़ सकता है। यही कारण है कि बेरोजगारी अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है।
ग्रामीण भारत में स्थिति और जटिल है। खेती पर निर्भरता अभी भी बहुत बड़ी है, लेकिन नई पीढ़ी खेती की ओर लौटना नहीं चाहती। कारण साफ हैं-कम आय, अनिश्चित भविष्य और सामाजिक सम्मान की कमी। पारंपरिक व्यवसायों से भी युवा दूरी बना रहे हैं। हर कोई सफेदपोश नौकरी चाहता है। लेकिन जब उद्योग और अर्थव्यवस्था पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर पा रहे, तब यह आकांक्षा और अवसर का टकराव समाज में असंतोष पैदा कर रहा है।
आज डिग्री की भी अपनी असमानता है। अब केवल यह मायने नहीं रखता कि आपके पास डिग्री है या नहीं, बल्कि यह मायने रखता है कि वह डिग्री किस संस्थान से ली गई है। बड़े और प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्रों को अवसर ज्यादा मिलते हैं, जबकि छोटे शहरों और सामान्य कॉलेजों से निकले युवा शुरुआत में ही पीछे छूट जाते हैं। यानी शिक्षा भी अब सामाजिक और आर्थिक असमानता का हिस्सा बनती जा रही है।
बेरोजगारी का असर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा है। लगातार प्रतियोगिता, असफलता, सामाजिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता युवाओं में तनाव और अवसाद बढ़ा रही है। सोशल मीडिया इस दबाव को और तीखा कर देता है, जहां दूसरों की सफलता दिखती है लेकिन संघर्ष नहीं। कई जगहों पर भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ युवा सड़क पर उतर रहे हैं। रोजगार अब सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है क्योंकि युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाबदेही मांग रहा है।
सरकारें आत्मनिर्भर भारत, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं की बात करती हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य सकारात्मक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या जमीनी व्यवस्था उन सपनों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मजबूत है? जब बैंकिंग व्यवस्था में भ्रष्टाचार और सिफारिश की शिकायतें हों, छोटे उद्यमियों को आसानी से ऋण न मिले, और व्यवस्था में भाई-भतीजावाद हावी हो, तब केवल योजनाओं और नारों से वास्तविक परिवर्तन नहीं आता। हर युवा उद्यमी नहीं बन सकता और हर युवा स्टार्टअप भी नहीं शुरू कर सकता। देश को बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले उद्योगों, मजबूत विनिर्माण क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत देने की जरूरत है।
सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच वास्तविक संतुलन बनाने की है। स्कूल और कॉलेज स्तर पर कौशल आधारित प्रशिक्षण को गंभीरता से लागू करना होगा। उद्योगों की जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे। भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध और पारदर्शी बनाना होगा। एमएसएमई और ग्रामीण उद्योगों को वास्तविक समर्थन देना होगा। युवाओं को करियर मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध करानी होगी। समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल सरकारी नौकरी ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं है।
भारत का युवा पूरी तरह दिशाहीन नहीं है। उसके भीतर ऊर्जा है, मेहनत है, सपने हैं और संघर्ष करने की क्षमता भी है। लेकिन समस्या यह है कि व्यवस्था उसे स्पष्ट दिशा नहीं दे पा रही। यदि शिक्षा केवल डिग्री देने तक सीमित रही और रोजगार अवसरों का विस्तार नहीं हुआ, तो देश की सबसे बड़ी ताकत ही असंतोष का कारण बन सकती है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत अपनी युवा आबादी को केवल डिग्रीधारी बेरोजगारों की भीड़ बनने देगा, या फिर शिक्षा, कौशल, उद्योग और रोजगार के बीच ऐसा संतुलन बना पाएगा जिससे यही युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति साबित हो सके।