ना तुम जीते, ना हम हारे

ना तुम जीते, ना हम हारे

-सुभाष मिश्रलोकसभा में महिला आरक्षण को लागू करने की ताज़ा कोशिश जिस तरह अंतत: विफल हुई, उसने भारतीय राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ जीत और हार ...

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शक्ति और शोषण: कॉर्पोरेट गलियारों से उठता धुआँ

-सुभाष मिश्रमहाराष्ट्र के नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज की बीपीओ यूनिट से सामने आए कथित यौन उत्पीड़न, शोषण...

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परिसीमन: बढ़ती सीटें, सिकुड़ता संतुलन और सवालों के घेरे में नीयत

-सुभाष मिश्रभारत आज दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है यह उपलब्धि कम, चुनौती अधिक है। सीमित भूगोल, सीमित ...

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भारतीय संविधान और बाबासाहेब अंबेडकर

-सुभाष मिश्रभारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यदि किसी एक व्यक्ति ने विचार, संघर्ष और व्यवस्था तीनों स्तरों पर स्थायी छाप छोड़ी है, तो वह नाम है। दुर्भाग्य यह है...

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सुरों की वह लौ जो कभी नहीं बुझेगी

सुरों की वह लौ जो कभी नहीं बुझेगी

-सुभाष मिश्रआशा भोसले के निधन के साथ भारतीय संगीत जगत ने केवल एक महान गायिका को नहीं खोया, बल्कि एक पूरे युग को विदा होते देखा है। कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो...

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महिला आरक्षण: नीति, राजनीति और नीयत के बीच

-सुभाष मिश्रभारत की लोकतांत्रिक यात्रा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रश्न नया नहीं है, लेकिन हर बार यह प्...

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गिरता रुपया, बढ़ता दबाव: सबसे बड़ा बोझ आखिर किस पर?

-सुभाष मिश्रभारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा परिदृश्य में रुपये की गिरती कीमत अब महज एक वित्तीय आंकड़ा नहीं रह गई ...

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नक्सलवाद की समाप्ति का दावा और सियासत की धार

नक्सलवाद की समाप्ति का दावा और सियासत की धार

-सुभाष मिश्रसंसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का हालिया बयान केवल एक सुरक्षा उपलब्धि का ब्योरा नहीं था, बल्कि उसमें सियासत की तीखी धार भी साफ दिखाई दी। उन्...

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बदलते बस्तर में उमड़ता जनसैलाब : शांति, विकास और चुनौती का संगम

-सुभाष मिश्रबस्तर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां अतीत की छाया और भविष्य की संभावनाएँ आमने-सामने दिखाई देती हैं। दशकों तक नक्सल हिंसा और भय के पर्याय रहे इस क...

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धुरंधर 2: सिनेमा, सियासत और सनसनी के बीच फंसी एक ‘नैरेटिव फिल्म’

-सुभाष मिश्रनिर्देशक आदित्य धर की फिल्म धुरंधर: द रिवेंज आज सिर्फ एक फिल्म नहीं रह गई है, यह एक ऐसा आईना बन गई ...

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