-सुभाष मिश्र
देश में हर साल लाखों युवा अपने सपनों को सच करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। कोई गांव छोड़कर शहर में कोचिंग करता है, कोई आर्थिक तंगी के बावजूद किताबों और फीस का इंतजाम करता है, तो कोई परिवार की उम्मीदों का बोझ लेकर कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा रहता है। लेकिन जब किसी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है, सामूहिक नकल सामने आती है या परीक्षा प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं उजागर होती हैं, तब केवल एक परीक्षा रद्द नहीं होती, बल्कि लाखों छात्रों का भरोसा टूटता है, उनका समय बर्बाद होता है और भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
अब NEET (UG) 2026 परीक्षा का मामला सामने है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने 3 मई को हुई परीक्षा को पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों के बाद रद्द कर दिया। केंद्र सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी है। जानकारी यह भी सामने आई कि एक तथाकथित “गेस पेपर” में लगभग 600 अंकों के सवाल वास्तविक परीक्षा से मेल खाते थे। यदि यह सच है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में गहरी सेंध का संकेत है। यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी देश में कई बड़ी परीक्षाएं पेपर लीक, नकल या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी हैं। चाहे CBSE के प्रश्नपत्र लीक का मामला हो, व्यापमं घोटाला हो, बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा हो, रेलवे भर्ती परीक्षा विवाद हो, यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा हो या अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं—हर बार सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्रों का हुआ जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की।
सबसे चिंाजनक बात यह है कि आज परीक्षा माफिया एक संगठित नेटवर्क का रूप ले चुका है। इसमें तकनीक का दुरुपयोग हो रहा है, अंदरूनी मिलीभगत के आरोप लगते हैं, फर्जी अभ्यर्थी बैठाए जाते हैं, सॉल्वर गैंग सक्रिय रहते हैं और मोटी रकम लेकर भविष्य बेचा जाता है। कई बार परीक्षा केंद्रों से लेकर सिस्टम के जिम्मेदार लोगों तक पर सवाल उठते हैं। यही कारण है कि मेहनती और प्रतिभावान छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। एक गरीब परिवार का बच्चा वर्षों की तैयारी करता है। माता-पिता अपनी जमा पूंजी खर्च कर देते हैं। कई छात्र मानसिक तनाव और अवसाद तक का सामना करते हैं। ऐसे में परीक्षा रद्द होने का मतलब केवल दोबारा परीक्षा नहीं होता, बल्कि दोबारा वही मानसिक दबाव, आर्थिक बोझ और अनिश्चितता झेलना भी होता है। यह अन्याय है।
देश में पेपर लीक और नकल को रोकने के लिए अब केंद्र सरकार ने “पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024” लागू किया है, जिसके तहत पेपर लीक, सॉल्वर गैंग, फर्जी अभ्यर्थी बैठाने और परीक्षा में धांधली करने वालों के लिए 3 से 10 साल तक की सजा और करोड़ों रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कानून बना देने से समस्या खत्म हो जाएगी? देश ने व्यापमं घोटाला, बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा लीक, यूपी पुलिस भर्ती पेपर लीक, रेलवे भर्ती परीक्षा विवाद और NEET सहित कई बड़े मामलों को देखा है, जिनमें लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ। कई परीक्षाएं रद्द हुईं, वर्षों तक भर्तियां अटकी रहीं और मेहनत करने वाले छात्रों को दोबारा तैयारी के लिए मजबूर होना पड़ा। जांच एजेंसियां बदलती रहीं—कहीं STF, कहीं SIT, कहीं CBI लगी—लेकिन अधिकतर मामलों में कार्रवाई वर्षों तक लंबित रही। कुछ छोटे आरोपियों की गिरफ्तारी जरूर हुई, पर बड़े नेटवर्क और सिस्टम से जुड़े लोगों तक अक्सर जांच नहीं पहुंच पाई। सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों का हुआ जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की थी, क्योंकि उनके जीवन के बहुमूल्य साल, मानसिक संतुलन और परिवार की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा। यही कारण है कि अब केवल जांच और गिरफ्तारी नहीं, बल्कि समयबद्ध न्याय, कठोर सजा और पूरी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाना सबसे जरूरी हो गया है।
अब सवाल यह है कि आखिर इसे रोका कैसे जाए? सबसे पहले परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाना होगा। प्रश्नपत्रों की प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्टेशन और वितरण की प्रक्रिया में डिजिटल एन्क्रिप्शन और मल्टी-लेयर सिक्योरिटी लागू करनी होगी। परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य किया जाना चाहिए ताकि किसी दूसरे व्यक्ति के बैठने की संभावना खत्म हो। CCTV निगरानी, लाइव मॉनिटरिंग और AI आधारित ट्रैकिंग जैसे उपाय भी प्रभावी हो सकते हैं। दूसरी तरफ परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर बार केवल छोटे कर्मचारियों को पकड़ लेने से काम नहीं चलेगा। यदि किसी एजेंसी की लापरवाही साबित होती है तो उसके उच्च अधिकारियों तक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि देश की परीक्षा प्रणाली को “भरोसे” के आधार पर दोबारा खड़ा किया जाए। क्योंकि जब मेहनत करने वाला छात्र यह महसूस करने लगे कि सफलता प्रतिभा से नहीं बल्कि जुगाड़, पैसे या धोखाधड़ी से तय होती है, तब यह केवल शिक्षा व्यवस्था का संकट नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरा बन जाता है। सरकार, जांच एजेंसियों और शिक्षा संस्थानों को यह समझना होगा कि पेपर लीक केवल अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों सपनों की हत्या है। और यदि इस पर कठोर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों का शिक्षा व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।