ईरान-अमेरिका तनाव के बीच मोदी की ‘समझाइश’ :क्या यह चेतावनी है या राजनीतिक अवसर?

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच मोदी की ‘समझाइश’ :क्या यह चेतावनी है या राजनीतिक अवसर?

-सुभाष मिश्र
दुनिया के किसी भी हिस्से में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। उसका असर बाजार, तेल, मुद्रा, रोजगार और आम आदमी की रसोई तक पहुंचता है। आज पश्चिम एशिया में बढ़ता ईरान-अमेरिका तनाव भी भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं है, बल्कि यह एक संभावित आर्थिक संकट का संकेत है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से मितव्ययिता, ईंधन बचत, सोने की खरीद कम करने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने और स्वदेशी उपभोग बढ़ाने जैसी अपीलों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है।
एक पक्ष इसे दूरदर्शिता बता रहा है, तो दूसरा इसे सरकार की विफलता का प्रमाण मान रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह अपील वास्तव में किसी गहरे संकट की आहट है, या फिर राजनीति के शोर में वास्तविक आर्थिक चिंताओं को अनदेखा किया जा रहा है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढऩे का सबसे पहला असर तेल की कीमतों पर पड़ता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो उसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, गैस, खाद, परिवहन और अंतत: महंगाई पर पड़ता है। ऐसे में सरकार का जनता से ईंधन बचाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और गैर-जरूरी आयात कम करने की अपील पूरी तरह अव्यावहारिक नहीं कही जा सकती।
दरअसल, सरकार की चिंता केवल पेट्रोल की कीमत तक सीमित नहीं है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार घाटा और रुपये की स्थिति भी इससे जुड़ी हुई है। सोने का भारी आयात, बढ़ता तेल बिल और डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाते हैं। इसलिए यदि सरकार जनता से कुछ समय के लिए संयम बरतने को कहती है, तो उसे केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा।

लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि सरकार पहले से ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर आश्वस्त थी, तो अचानक इस तरह की अपीलों की जरूरत क्यों पड़ी? विपक्ष का तर्क यही है कि ‘संकट नहीं है’ कहने वाली सरकार अब जनता से त्याग मांग रही है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेताओं ने इसी विरोधाभास को मुद्दा बनाया है। उनका कहना है कि यदि अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है, तो फिर जनता से सोना न खरीदने, विदेश यात्रा टालने और पेट्रोल बचाने की अपील क्यों करनी पड़ रही है?
राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, लेकिन हर राष्ट्रीय संकट को केवल सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई में बदल देना भी खतरनाक है। इतिहास गवाह है कि युद्ध, महामारी या आर्थिक संकट के समय दुनिया के लगभग हर देश ने अपने नागरिकों से सहयोग और संयम की अपील की है। 1962 के चीन युद्ध में नेहरू का आह्वान हो या कोरोना काल में मोदी की अपीलें—इनका उद्देश्य राष्ट्रीय संसाधनों को बचाना और सामाजिक मनोबल बनाए रखना था। फर्क सिर्फ इतना है कि आज सोशल मीडिया और चुनावी राजनीति के दौर में हर अपील तुरंत राजनीतिक व्याख्या का हिस्सा बन जाती है।

असल चिंता यह नहीं है कि प्रधानमंत्री ने अपील क्यों की। असली चिंता यह है कि क्या भारत अब भी ऊर्जा और आयात के मामले में इतना आत्मनिर्भर नहीं बन पाया कि वैश्विक संकटों का असर कम हो सके? क्या हमारी आर्थिक संरचना अब भी तेल और डॉलर पर अत्यधिक निर्भर है? और क्या सरकार ने पिछले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक ईंधन और घरेलू उत्पादन को उतनी प्राथमिकता दी, जितनी दी जानी चाहिए थी? यह भी सच है कि जनता से त्याग मांगना आसान है, लेकिन उसका बोझ समान रूप से नहीं बंटता। मध्यम वर्ग और गरीब तबका पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ती जीवन लागत से जूझ रहा है। ऐसे में ‘कम खर्च करो’ जैसी सलाहें तभी प्रभावी लगती हैं जब सरकार खुद भी फिजूलखर्ची कम करती दिखाई दे, नीतिगत पारदर्शिता हो और जनता को भरोसा हो कि यह अस्थायी कठिनाई वास्तव में राष्ट्रीय हित के लिए है।

इस पर विवाद उठने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईंधन बचाने की अपील के ठीक एक दिन बाद केंद्र सरकार ने सोमवार को देश को आश्वस्त किया कि भारत में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी या कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है। सरकार ने स्पष्ट कहा कि देश के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और नागरिकों को किसी भी प्रकार की दौड़-भाग या घबराहट करने की जरूरत नहीं है। अभी भारत के पास 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों की प्राकृतिक गैस और 45 दिनों का एलपीजी भंडार है।
इस पूरे विवाद में सबसे खतरनाक प्रवृत्ति यह है कि हम वास्तविक आर्थिक संकेतों की जगह केवल राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित हो गए हैं। यदि वैश्विक युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत पर असर पडऩा तय है। इसलिए तैयारी, संयम और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। वहीं सरकार को भी केवल भावनात्मक अपीलों के बजाय ठोस आर्थिक रोडमैप, ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति और पारदर्शी संवाद पर अधिक जोर देना होगा।
अंतत: यह समय न तो अंध समर्थन का है और न ही अंध विरोध का। यह समय वास्तविकताओं को समझने का है। क्योंकि युद्ध चाहे हजारों किलोमीटर दूर क्यों न हो, उसकी आंच अंतत: आम आदमी की जेब तक पहुंचती ही है।
प्रसंगवश सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की यह कविता याद आती है
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो
क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।।

इसके साथ एक और महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ता है, क्या मितव्ययिता और संसाधनों की बचत की शुरुआत सत्ता और व्यवस्था के शीर्ष स्तर से नहीं होनी चाहिए? अक्सर कहा जाता है कि “Charity begins at home” , यानी सुधार और अनुशासन की शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। यदि देश की जनता से पेट्रोल-डीजल बचाने, गैर-जरूरी यात्राएं कम करने और सादगी अपनाने की अपील की जा रही है, तो सरकार और नौकरशाही को भी उसका उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। आज भी मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के लंबे-लंबे काफिले, सायरन बजाती कई गाडिय़ां, वीआईपी मूवमेंट पर होने वाला भारी ईंधन खर्च और सरकारी संसाधनों का दिखावटी उपयोग आम जनता के मन में सवाल खड़े करता है। जब एक मंत्री या अधिकारी के साथ कई वाहन चलते हैं, बड़ी संख्या में सुरक्षा और स्टाफ तैनात रहता है, तब जनता यह पूछने लगती है कि बचत का बोझ केवल आम नागरिकों पर ही क्यों डाला जाए। दुनिया के कई विकसित देशों में प्रधानमंत्री और मंत्री सार्वजनिक परिवहन या सीमित सुरक्षा तंत्र के साथ दिखाई देते हैं, जिससे सादगी और जवाबदेही का संदेश जाता है। भारत में भी यदि सरकार वास्तव में राष्ट्रीय संकट के समय मितव्ययिता का संदेश देना चाहती है, तो उसे प्रतीकात्मक और व्यवहारिक दोनों स्तरों पर खुद उदाहरण पेश करना होगा। क्योंकि जनता केवल भाषण नहीं, बल्कि नेतृत्व का आचरण भी देखती है।

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