-सुभाष मिश्र
मैं आज मई दिवस पर यह कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा हूं कि ‘दुनिया के मजदूर एक हो। न ही यह कह सकता हूं कि ‘हम मेहनतकश जब अपना हिस्सा मांगेंगे, तो एक खेत नहीं, एक देश नहीं—हम पूरी दुनिया मांगेंगे। क्योंकि जिस समय में हम जी रहे हैं, वह इन नारों से कहीं अधिक जटिल और विडंबनापूर्ण हो चुका है।
आज वैश्विक परिदृश्य में हम देखते हैं कि शक्तिशाली देश जैसे यूनाइटेड स्टेट्स दूसरे देशों के संसाधनों, तेल और खनिज संपदा पर कब्जा जमाने की होड़ में लगे हैं। बड़ी पूंजी, छोटी पूंजी को निगल रही है; मजबूत राष्ट्र, कमजोर राष्ट्रों पर अपना प्रभाव थोप रहे हैं। ऐसे समय में वह मजदूर, जिसके पास अपनी मेहनत के अलावा कुछ नहीं है, सबसे असुरक्षित स्थिति में खड़ा दिखाई देता है
1 मई, अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस, यह दिन केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि उन संघर्षों की याद है जिनके बल पर दुनिया भर के श्रमिकों ने अपने अधिकार हासिल किए। आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपने लिए यह सिद्धांत यूं ही नहीं मिला, बल्कि इसके पीछे लंबा संघर्ष, हड़तालें और शहादतें जुड़ी हैं।
लेकिन आज, जब हम मई दिवस मना रहे हैं, तो एक बड़ा सवाल हमारे सामने है क्या मजदूर आंदोलन आज भी उसी ताकत और दिशा में मौजूद है?
एक समय था जब मजदूर आंदोलन केवल वेतन या भत्तों तक सीमित नहीं था। उसमें व्यापक सामाजिक और राजनीतिक चेतना थी। ट्रेड यूनियनें प्रभावशाली थीं, और उनकी आवाज़ सरकारों की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन बिखरता गया।
आज मजदूर संगठन जाति, धर्म, वर्ग और राजनीतिक झुकाव के आधार पर विभाजित नजर आते हैं। ‘दुनिया के मजदूर एक होÓ का नारा अब छोटे-छोटे आर्थिक लाभों तक सिमट गया है। 10-12 मांगों के साथ आंदोलन शुरू होते हैं, लेकिन एक-दो मांग पूरी होते ही खत्म हो जाते हैं।
इस गिरावट का एक बड़ा कारण मजदूर नेतृत्व में वैचारिक और राजनीतिक स्पष्टता की कमी भी है। कई यूनियनें किसी न किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में काम करती हैं। चुनाव के समय यह झुकाव और स्पष्ट हो जाता है, जहां वर्गीय एकता की जगह जातीय और धार्मिक पहचान हावी हो जाती है।
दूसरी ओर, पूंजीवादी व्यवस्था ने भी मजदूर आंदोलन को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आउटसोर्सिंग, ठेका प्रथा और प्लेसमेंट एजेंसियों के बढ़ते प्रभाव ने स्थायी रोजगार की अवधारणा को कमजोर कर दिया है। श्रम कानूनों का पालन भी अक्सर केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और चिंताजनक हुई है कि मजदूरों की किसी भी मांग को कभी-कभी ‘राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाता है। एनसीआर क्षेत्र में घरेलू कामगारों के आंदोलन को लेकर उठे सवाल इसका उदाहरण हैं, जहां न्यूनतम वेतन की मांग को भी संदेह की नजर से देखा गया।
सरकारी नीतियों में भी एक बदलाव दिखता है। स्थायी रोजगार की गारंटी देने के बजाय प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) और चुनावी योजनाओं पर अधिक जोर दिया जा रहा है। इससे तात्कालिक राहत तो मिलती है, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक सशक्तिकरण नहीं हो पाता।
महिलाओं और कमजोर वर्गों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन उन्हें स्थायी रोजगार और आत्मनिर्भरता से जोडऩे के प्रयास सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की रीढ़ मानी जाने वाली योजनाएं भी अपने अपेक्षित प्रभाव से दूर हैं।
साथ ही, श्रमिकों के लिए बनी स्वास्थ्य और बीमा योजनाओं का लाभ भी पूरी तरह उन तक नहीं पहुंच पाता। बीच में मौजूद भ्रष्टाचार और तंत्र की कमजोरियां इसे और जटिल बना देती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है, क्या मजदूर संगठन इन चुनौतियों को समझ पा रहे हैं? क्या उनके पास वह दृष्टि है, जो उन्हें एक सशक्त सामाजिक और राजनीतिक शक्ति बना सके?
मई दिवस केवल अतीत की गौरवगाथा को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि वर्तमान की कमजोरियों को पहचानने और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी है। आज जरूरत है कि मजदूर आंदोलन फिर से अपनी मूल भावना एकता, संघर्ष और सामाजिक न्याय को समझे। केवल वेतन वृद्धि नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन, सामाजिक सुरक्षा और नीति निर्माण में भागीदारी के लिए संगठित प्रयास किए जाएं।
क्योंकि इतिहास गवाह है अधिकार कभी दिए नहीं जाते, उन्हें हासिल करना पड़ता है। और इसके लिए जरूरी है एकजुटता, जागरूकता और स्पष्ट दिशा।