वाणी का संयम खोने का बढ़ता रिवाज

वाणी का संयम खोने का बढ़ता रिवाज

-सुभाष मिश्र
भारतीय परंपरा में वाणी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र का दर्पण माना गया है। कबीर, रहीम, तुलसीदास और गुरु नानक जैसे संतों ने बार-बार यही सिखाया कि वाणी में संयम ही मनुष्य को ऊँचा बनाता है। ‘ऐसी वाणी बोलिए’ से लेकर ‘मीठे वचन’ तक, हमारी सभ्यता ने भाषा को मर्यादा का आधार माना है।
लेकिन आज का सार्वजनिक जीवन इस परंपरा से तेजी से दूर जाता दिख रहा है। राजनीति, धर्म और समाज तीनों ही क्षेत्रों में शब्दों की गरिमा लगातार गिर रही है। अब बयान विचार नहीं, हथियार बन गए हैं। संवाद नहीं, टकराव का माध्यम बन चुके हैं।

हाल के वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जो इस गिरावट को स्पष्ट करते हैं। मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री के लिए ‘आतंकवादी’ जैसे शब्द का प्रयोग हो या राजनीतिक विरोधियों को ‘जहरीला सांप’ कहना ये केवल आलोचना नहीं, बल्कि भाषा की मर्यादा का टूटना है। इसी तरह विजय वडेट्टीवार का देश को ‘बर्बादी के रास्ते पर’ बताना, या पप्पू यादव द्वारा महिला आरक्षण पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी ये बयान समाज में संवाद की जगह अविश्वास और अपमान को बढ़ाते हैं।

राहुल गांधी के जाति और संस्थाओं को लेकर दिए गए बयान भी व्यापक बहस का विषय बने, तो दूसरी ओर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा बेटियों के संदर्भ में हिंसा का संकेत देना चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है। गौरव भाटिया का ‘रोहिंगिया’ संदर्भ वाला बयान भी इसी श्रेणी में आता है, जहां राजनीतिक विमर्श भावनात्मक उत्तेजना में बदल जाता है।
धार्मिक मंच भी इससे अछूते नहीं रहे। रामभद्राचार्य द्वारा कुछ क्षेत्रों को ‘मिनी पाकिस्तान’ कहना, बाबा रामदेव का इस्लाम और ईसाई धर्म पर विवादित कथन, या महंत नरसिम्हानंद की पैगंबर पर टिप्पणी ये सभी उदाहरण बताते हैं कि धर्म, जो जोडऩे का माध्यम होना चाहिए, वह भी विभाजनकारी भाषा का शिकार हो रहा है।
इसी क्रम में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान, देवकीनंदन ठाकुर की टिप्पणियाँ, मौलाना सैयद कल्बे जवाद नक़वी की राजनीतिक प्रतिक्रिया, प्रदीप मिश्रा का धार्मिक प्रसंगों पर विवाद और प्रेमानंद महाराज के महिलाओं को लेकर कथन ये सब मिलकर एक व्यापक तस्वीर पेश करते हैं, जहां शब्दों की मर्यादा लगातार टूट रही है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन बयानों पर ठोस कार्रवाई कम ही दिखती है। कभी-कभार विरोध, एफआईआर, या आयोगों की सक्रियता दिखती है, लेकिन उसका परिणाम अक्सर शून्य रहता है। उल्टा, विवादित बयान देने वालों को तात्कालिक प्रसिद्धि मिल जाती है मानो यह एक ‘पब्लिसिटी टूल’ बन गया हो। चुनावी समय में यह प्रवृत्ति और तेज हो जाती है, जब उत्तेजक भाषा को रणनीति की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
यह स्थिति केवल राजनीति या धर्म की समस्या नहीं है, यह समाज के सामूहिक संस्कारों के क्षरण का संकेत है। जब शीर्ष स्तर (टॉप टू बॉटम) पर भाषा का संयम नहीं रहेगा, तो आम समाज में भी कटुता, अपमान और विभाजन बढऩा स्वाभाविक है। गाली-गलौज, स्त्रियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियाँ, दलितों और कमजोर वर्गों के प्रति तिरस्कार ये सब उसी बीज के फल हैं जो सार्वजनिक मंचों से बोए जा रहे हैं।

समाधान क्या है? कानून अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है सामाजिक और नैतिक दबाव। राजनीतिक दलों को अपने नेताओं के लिए स्पष्ट आचार संहिता बनानी होगी, धार्मिक संस्थाओं को आत्मनियंत्रण दिखाना होगा और समाज को यह तय करना होगा कि वह किस तरह की भाषा को स्वीकार करता है।
कबीर, रहीम और तुलसी की परंपरा केवल किताबों में नहीं, व्यवहार में दिखनी चाहिए। क्योंकि अंतत: शब्द ही वह पुल हैं जो समाज को जोड़ते हैं और वही दीवार भी बन सकते हैं जो उसे तोड़ देते हैं।

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