जनविश्वास की पूंजी और पत्रकारिता की नई चुनौतियां

सीधी और सच बात, साहस के साथ

– सुभाष मिश्र

यह केवल एक सूत्र वाक्य नहीं, बल्कि पत्रकारिता की उस प्रतिबद्धता का उद्घोष है। ऐसे समय में जब मीडिया का बड़ा हिस्सा बाजार, सत्ता और एजेंडा आधारित विमर्शों के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब किसी समाचार-पत्र का अपनी स्थापना के बाद की यात्रा निरंतर आगे बढ़ाते जाना केवल संस्थागत उपलब्धि नहीं, बल्कि जनविश्वास की एक बड़ी परीक्षा में सफल होने जैसा है।
दैनिक आज की जनधारा के बिलासपुर संस्करण का छठा स्थापना वर्ष इसी अर्थ में विशेष महत्व रखता है। यह यात्रा केवल अखबार के विस्तार की यात्रा नहीं है, बल्कि उन सवालों, सरोकारों और आवाजों की यात्रा है जिन्हें अक्सर मुख्यधारा की चमकदार पत्रकारिता में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। लोकतंत्र में पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता होती है और यह विश्वसनीयता किसी मशीन, तकनीक या पूंजी से नहीं, बल्कि जनता के भरोसे से निर्मित होती है।
पिछले एक दशक में मीडिया का स्वरूप तेजी से बदला है। समाचार-पत्रों की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। खबरें अब न्यूज रूम से ज्यादा सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर पैदा और प्रसारित हो रही हैं। हर व्यक्ति संभावित रिपोर्टर है और हर मोबाइल एक संभावित समाचार माध्यम। तकनीक ने सूचना के लोकतंत्रीकरण का रास्ता खोला है, लेकिन इसके साथ भ्रम, फर्जी खबरों और प्रायोजित सूचनाओं का खतरा भी बढ़ा है। ऐसे दौर में पत्रकारिता का मूल दायित्व और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज चुनौती केवल खबर देने की नहीं, बल्कि सच और झूठ के बीच अंतर स्पष्ट करने की है। चुनौती केवल सूचना पहुंचाने की नहीं, बल्कि समाज को उसके वास्तविक प्रश्नों से जोडऩे की है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, आदिवासी समाज के प्रश्न, पर्यावरणीय संकट, महिलाओं की सुरक्षा, लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे विषय अक्सर शोरगुल वाले विमर्शों के बीच पीछे छूट जाते हैं। पत्रकारिता का दायित्व इन्हीं मुद्दों को केंद्र में लाना है।
दुर्भाग्य से हमारे समय में मीडिया का एक हिस्सा सत्ता और बाजार के प्रभाव में अपनी आलोचनात्मक भूमिका खोता दिखाई देता है। बहसों का स्तर गिरा है, संवाद की जगह शोर ने ले ली है और तथ्य की जगह धारणा को स्थापित करने की कोशिशें बढ़ी हैं। ऐसी परिस्थितियों में स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता का महत्व और बढ़ जाता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों को सही और निष्पक्ष जानकारी मिलने से मजबूत होता है।
लेकिन इसी घटाटोप में यह एक विस्मय से भरी सुखद आश्वस्ति है कि आमजन का भरोसा अब अपेक्षाकृत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से वापस प्रिंट मीडिया की ओर लौट रहा है। कुछ चैनलों की वजह से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबरें संदिग्ध हो गई हैं। छोटे नगरों से लेकर महानगरों तक खबरों की विश्वसनीयता के लिए लोग अखबार ही खोजते मिल रहे हैं। हमारे पुरखों द्वारा हासिल की गई शब्द की ताकत बहुत सारे क्षरण के बावजूद आज भी कायम हैं। छपा हुआ शब्द आज भी भरोसा है और हम इसी भरोसे के साथ आगे बढ़ रहे हैं। आज की जनधारा ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद हमेशा जनसरोकारों को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है। समाचार-पत्र के साथ-साथ डिजिटल मंचों, वेब पोर्टल, यूट्यूब और साहित्यिक-सांस्कृतिक पहलों के माध्यम से समाज के विविध पक्षों को सामने लाने का प्रयास किया गया है। यह विश्वास रहा है कि पत्रकारिता केवल सत्ता की गतिविधियों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि समाज की संवेदनाओं का दस्तावेज भी है।
आज जब हम बिलासपुर संस्करण के छठे स्थापना वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब यह अवसर आत्ममंथन का भी है और संकल्प का भी। हम अपने पाठकों, लेखकों, संवाददाताओं, सहयोगियों और शुभचिंतकों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हमारा साथ नहीं छोड़ा। यही सहयोग हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।
आने वाले समय में तकनीक बदलेगी, माध्यम बदलेंगे, सूचना के स्वरूप बदलेंगे, लेकिन पत्रकारिता का मूल धर्म नहीं बदलेगा—सत्ता से प्रश्न पूछना, समाज की आवाज बनना और सच के पक्ष में खड़े रहना।
गजानन माधव मुक्तिबोध की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं—
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे,
तोडऩे ही होंगे मठ और गढ़ सब
जनधारा का विश्वास है कि लोकतंत्र की असली ताकत जनता की आवाज में होती है। हम उसी आवाज को शब्द देने की अपनी जिम्मेदारी आगे भी निभाते रहेंगे।

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