रायपुर में पुलिस कमिश्नरी: अधिकारों का केंद्रीकरण, लेकिन क्या अपराध पर निर्णायक नियंत्रण?

-सुभाष मिश्रछत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य गठन के 25 वर्षों बाद पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था लागू हो चुकी है।...

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रायपुर साहित्य उत्सव-2026 – सत्ता और साहित्य के बीच संतुलन की तलाश

-सुभाष मिश्रछत्तीसगढ़ की पहचान केवल खनिज, वन, आदिवासी संस्कृति और नदियों तक सीमित नहीं रही है। यह वह भूमि है जह...

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सत्ता मिशनरी बनाम नैतिक जिम्मेदारी: जब वर्दी ही शक का विषय बन जाए

-सुभाष मिश्रकर्नाटक के डीजीपी रामचंद्र राव का मामला जहाँ उन्हें महिलाओं को किस करने, ब्रेस्ट चूमने जैसे गंभीर आ...

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विवाह: संस्कार से ‘स्पेक्टेकल’ तक

-सुभाष मिश्रभारतीय समाज में विवाह परंपरागत रूप से संस्कार, मर्यादा और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक रहा है। ले...

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खान-पान, आस्था और क़ानून के बीच संतुलन की ज़रूरत

खान-पान, आस्था और क़ानून के बीच संतुलन की ज़रूरत

हिंदुस्तानी समाज की सबसे बड़ी पहचान उसकी बहुलता रही है—भाषा, पहनावा, आस्था और खान-पान, सबमें विविधता। समुद्र किनारे बसे समाजों के लिए मछली जीवन का स्वाभाविक ह...

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महाराष्ट्र से बिहार तक : क्या बदलती भारतीय राजनीति का संकेत हैं ये चुनावी नतीजे

-सुभाष मिश्रमहाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक, एनडीए और भाजपा को मिली लगातार सफलत...

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क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है?

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है?

-सुभाष मिश्रभारत में भ्रष्टाचार अब केवल नैतिक पतन या व्यक्तिगत लालच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संस्थागत संकट का रूप ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट का भ्र...

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नई जनरेशन की नई चाहत-ना शादी, ना बच्चा

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: नई जनरेशन की नई चाहत-ना शादी, ना बच्चा

-सुभाष मिश्रनई जनरेशन की शादी की कोई जल्दी नहीं है। यदि शादी हो भी जाए, तो बच्चा जल्दी नहीं चाहिए। देश में पहले नारा था— दो या तीन बस, फिर समय के साथ नारा बदल...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – लालच के आगे हारता विवेक

-सुभाष मिश्रभारतेंदु हरिश्चंद्र ने अंधेर नगरी के गीत में बहुत पहले जिस वाक्य को लगभग चेतावनी की तरह रखा था 'लोभ पाप का मूल है। आज वही वाक्य हमारे समय की सबसे ...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – धान के गोदामों में चूहे और तंत्र का सच

-सुभाष मिश्रकई बार मन में यह ख्याल आता है कि यदि चूहे नहीं होते, दीमक नहीं होती, सरकारी दफ्तरों में दैवीय प्रको...

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