भुवनेश्वर। ओडिशा की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने जनभावनाओं और भारी नाराजगी का सम्मान करते हुए विधानसभा से पारित उन चारों विवादित बिलों को वापस ले लिया है, जिनमें वीआईपी कल्चर और भारी वेतन वृद्धि का प्रस्ताव था। इन बिलों के जरिए मुख्यमंत्री, मंत्रियों, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर और विधायकों के वेतन, भत्ते और पेंशन में 3 गुना बढ़ोतरी की जानी थी। गौरतलब है कि ये बिल सदन से पहले ही पास हो चुके थे और केवल राज्यपाल की अंतिम मुहर का इंतजार कर रहे थे, लेकिन चौतरफा दबाव के बाद सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं।
बजट सत्र 5 दिन पहले ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित
मैदानी सूत्रों के अनुसार, यह फैसला मंगलवार रात को उस समय लिया गया जब विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने बजट सत्र को निर्धारित समय से 5 दिन पहले ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। दरअसल, यह सत्र 8 अप्रैल तक चलना था, लेकिन सरकारी मुख्य सचेतक सरोज कुमार प्रधान के प्रस्ताव पर सदन ने कार्यवाही समय से पहले समाप्त करने की मंजूरी दे दी। हालांकि, सत्र समाप्त होने से ठीक पहले सदन ने ओडिशा विनियोग बिल 2026 को पारित कर दिया, जिससे राज्य सरकार को नए वित्तीय वर्ष के लिए 3.10 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का अधिकार मिल गया है।
सैलरी बढ़ाने के फैसले पर क्यों मचा था बवाल
बता दें कि इन संशोधन बिलों को सबसे पहले 9 दिसंबर 2025 को शीतकालीन सत्र के दौरान पेश किया गया था। इस प्रस्ताव के तहत विधायकों का वेतन 1.11 लाख रुपये से बढ़ाकर सीधे 3.45 लाख रुपये प्रति महीने किया जाना था, जो देश में किसी भी राज्य के जनप्रतिनिधियों को मिलने वाले सबसे अधिक वेतन-भत्तों में से एक होता। जैसे ही यह जानकारी सार्वजनिक हुई, विपक्ष के साथ-साथ सत्ताधारी दल के भीतर भी इन बिलों की समीक्षा की मांग उठने लगी। जनता के बीच बढ़ते आक्रोश को देखते हुए संसदीय कार्य मंत्री मुकेश महालिंग ने सदन में इन चारों बिलों को वापस लेने का औपचारिक प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।
विश्वविद्यालय शिक्षक आरक्षण बिल पर हुई लंबी बहस
सैलरी बिलों की वापसी के बीच सदन ने मंगलवार देर रात ओडिशा राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालय (शिक्षक संवर्ग में आरक्षण) बिल 2026 को मंजूरी दे दी। इस बिल पर सदन में करीब 4 घंटे तक तीखी बहस हुई। बीजू जनता दल और कांग्रेस के विधायकों ने इस बिल को चयन समिति के पास भेजने की मांग की थी, लेकिन उच्च शिक्षा मंत्री सूर्यवंशी सूरज ने इसे तत्काल लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। अंततः बहुमत के आधार पर यह बिल पारित हो गया। प्रशासन का मानना है कि वेतन वृद्धि के बिलों को वापस लेना लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत है और इससे जनता के बीच सरकार की छवि में सुधार होगा।