सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी यात्री को उसके खर्च के आधार पर कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। अदालत ने रेलवे के नियमों में सेकंड क्लास पैसेंजर शब्द के इस्तेमाल पर गहरी आपत्ति जताई है। कोर्ट ने साफ किया कि इस शब्द का संबंध केवल ट्रेन की बोगी से होना चाहिए, न कि यात्री के दर्जे से।
यह मामला 10 साल पुराना है। साल 2015 में चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद जा रहे थे। इस दौरान ट्रेन से गिरने के कारण उनकी मौत हो गई थी। हादसे में उनका बैग गायब हो गया, जिसमें संभवतः उनका टिकट था। टिकट न मिलने के कारण रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट ने उन्हें वैध यात्री मानने से इनकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन फैसलों को पलट दिया है। मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। केंद्र सरकार को 4 सप्ताह के भीतर यह राशि जारी करनी होगी। देरी होने पर 8 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
अदालत ने कहा कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा कानून एक कल्याणकारी कानून है। इसकी व्याख्या संकीर्ण नहीं बल्कि उदार होनी चाहिए। केवल टिकट नहीं मिलने से किसी का वैध यात्री होना खत्म नहीं हो जाता। दावा साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी यात्री की है, लेकिन उसे गलत साबित करने का भार रेलवे पर होगा।
इसके साथ ही कोर्ट ने यात्रियों को भी सावधान किया है। चलती ट्रेन में चढ़ना, दरवाजे पर लटकना और जोखिम लेना खतरनाक है। कोर्ट ने रेलवे को सलाह दी है कि भीड़ रोकने के लिए स्टाफ की संख्या बढ़ाई जाए। प्रभावी प्रबंधन से ही हादसों को कम किया जा सकेगा।