-सुभाष मिश्र
सुप्रीम कोर्ट ने अश्लील कंटेंट को सामाजिक और नैतिक खतरे के रूप में देखा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28 अप्रैल 2025 को केंद्र, ओटीटी और सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। कोर्ट ने इसे राष्ट्रीय चिंता माना। कोर्ट ने बाल यौन शोषण सामग्री पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई और इसे अपराध घोषित किया। रणवीर इलाहाबादिया मामले में कोर्ट ने अश्लील टिप्पणियों की आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अश्लील सामग्री परिवारों और बच्चों पर बुरा प्रभाव डालती है। उसने सरकार से कड़े कानून और निगरानी तंत्र की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में स्वतंत्र समिति की सिफारिश की है और कोर्ट ने सुझाव दिया कि रिटायर्ड जजों और विशेषज्ञों की समिति सामग्री की निगरानी करे।
समाज के बड़े और जिम्मेदार लोगों का ऐसा मानना है कि यह बहुत अचरज की बात है कि लड़कियों के छोटे कपड़े पहनने पर सामाजिक और धार्मिक संगठन जिस तरह के आक्रोश प्रदर्शित करते हैं। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री के लिए ऐसा एक भी आंदोलन नहीं सामने आया है। सरकार का ढीला सा लगता रवैया, सामाजिक संगठनों की उदासीनता और ओटीटी प्लेटफॉर्म की पूंजी की ताकत और लोकप्रियता की शक्ति ने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अश्लीलता परोसने के लिए निर्लज्जता की सारी सीमाएं पार कर दी है।
सोशल मीडिया पर अश्लील कंटेंट और समाज का दोहरा रवैया एक गंभीर चुनौती है। प्रसिद्ध लेखक हरिशंकर परसाई ने बहुत पहले लिखा था कि लोग सार्वजनिक रूप से नैतिकता की बात करते हैं, लेकिन निजी तौर पर अश्लीलता का उपभोग करते हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में पोर्न साइट्स की बढ़ती खपत इस दोहरेपन का जीवंत उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और सरकार के नियामक प्रयास स्वागत योग्य हैं, लेकिन जब तक समाज अपने दोहरे रवैये को नहीं छोड़ेगा, ये प्रयास अधूरे रहेंगे। अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक मर्यादाओं के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। इसके लिए मजबूत कानूनी ढांचे के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और आत्म-अनुशासन की आवश्यकता है। समाज को यह तय करना होगा कि वह नैतिकता के मुखौटे को उतारकर वास्तविक बदलाव की ओर बढ़े। ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने से यह खतरा और बढ़ा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अधिकांश सीरीज और फिल्में लगभग पॉर्न कैटेगरी की हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सेंसर बोर्ड का नियंत्रण नहीं है। सेंसर बोर्ड या सरकार का इस पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं होने से समाज का यथार्थ दिखाने के नाम पर अधिकांश चैनल अश्लीलता परोसने में एक-दूसरे से होड़ ले रहे हैं। भारतीय दर्शकों के लिए यह अप्रत्याशित था। अश्लीलता के प्रति भारतीय जनमानस में एक किस्म की उत्सुकता और ललक किसी से छिपी नहीं है। सार्वजनिक रूप से लोग कुछ भी कहें लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म का एक बड़ा दर्शक वर्ग ऐसी फि़ल्में और ऐसी सीरीज पसंद करते हैं। अब इसमें धीरे-धीरे बच्चे और किशोर उम्र के लड़के-लड़कियां भी शामिल हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में अनेक बार सख्त टिप्पणी की है लेकिन ऐसी टिप्पणियों की अवहेलना भी किसी से छिपी नहीं है।
समाज का अश्लीलता को लेकर रुख अस्पष्ट और जटिल है जो सार्वजनिक और निजी व्यवहार में एक स्पष्ट विरोधाभास दर्शाता है। यह दोहरापन विशेष रूप से सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉम्र्स पर स्पष्ट है, जहां लोग एक ओर अश्लील सामग्री की निंदा करते हैं, लेकिन दूसरी ओर इसे चुपके से उपभोग करते हैं।
हालिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि टायर 2 और 3 के शहरों में पोर्न साइट्स का उपयोग बड़े शहरों की तुलना में अधिक है। 2017 की एक रिपोर्ट (Porn consumption in India rises by as mobile data rates drop) के अनुसार, भारत में पोर्न उपभोग 75 फीसदी बढ़ा है और इसकी 60फीसदी दर्शक टायर 2 और 3 के शहरों से हैं। यह वृद्धि मुख्य रूप से मोबाइल डेटा की सस्ती दरों और स्मार्टफोन की पहुंच के कारण है।
यह दोहरापन कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों से उपजता है। एक ओर, समाज में नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों का दबाव है, जो लोगों को सार्वजनिक रूप से अश्लीलता का विरोध करने के लिए मजबूर करता है। दूसरी ओर, डिजिटल प्लेटफॉम्र्स की गोपनीयता और आसान पहुंच ने निजी तौर पर इस सामग्री के उपभोग को बढ़ावा दिया है।
सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉम्र्स पर अश्लील सामग्री ने समाज के नैतिक ताने-बाने को चुनौती दी है। यह सामग्री कई रूपों में मौजूद है। पोर्नोग्राफिक वीडियो, नग्नता और अश्लील रील्स/शॉर्ट्स, जो यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स, और ओटीटी प्लेटफॉम्र्स (नेटफ्लिक्स, उल्लू, एएलटीटी) पर आसानी से उपलब्ध हैं। बाल यौन शोषण सामग्री की बहुतायत भी सोशल मीडिया पर है। यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे देखने, डाउनलोड करने या शेयर करने को अपराध माना है। अनाचार और विकृत सामग्री जो ऐसी सामग्री सामाजिक मूल्यों को नष्ट करती है और विशेष रूप से युवाओं पर बुरा प्रभाव डालती है।
अश्लील टिप्पणियां और रील्स का चलन भी इधर के दिनों में बढ़ा है। इन्फ्लुएंसर्स द्वारा भद्दी टिप्पणियां और फूहड़ हास्य जैसे रणवीर इलाहाबादिया के मामले में सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ते हैं।
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, टियर-2 और टियर-3 शहरों (जैसे लखनऊ, भोपाल, जयपुर) में पोर्न साइट्स का उपयोग बड़े शहरों की तुलना में अधिक है। यह दर्शाता है कि अश्लीलता का प्रसार केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। समाज का अश्लीलता को लेकर रुख अस्पष्ट और दोमुंहा है। सार्वजनिक मंचों पर लोग अश्लील सामग्री की निंदा करते हैं, लेकिन निजी तौर पर इसे देखने, डाउनलोड करने, और फॉरवर्ड करने में संकोच नहीं करते। पोर्न साइट्स की अधिक खपत इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक और रूढि़वादी माने जाने वाले क्षेत्रों में भी अश्लीलता का उपभोग चुपके से बढ़ रहा है। यह सामाजिक पाखंड को दर्शाता है, जहां लोग सामाजिक दबाव में नैतिकता का मुखौटा पहनते हैं।
अश्लीलता को लेकर जो सरकारी प्रयास हुए हैं वे उतने प्रभावी नहीं है। आईटी नियम, 2021 के अनुसार सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉम्र्स को आपत्तिजनक सामग्री हटाने और शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने का आदेश। प्रस्तावित नियम के अनुसार है। डिजिटल इंडिया विधेयक और इन्फ्लुएंसर्स के लिए कोड ऑफ कंडक्ट, जिसमें रेटिंग और डिस्क्लेमर अनिवार्य होंगे। इस संबंध में जारी याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने नेशनल कंटेंट कंट्रोल अथॉरिटी के गठन की मांग की है जो सामग्री की समीक्षा करे।
डिजिटल इंडिया विधेयक और इन्फ्लुएंसर्स के लिए कोड ऑफ कंडक्ट, जिसमें रेटिंग और डिस्क्लेमर अनिवार्य होंगे। याचिकाकर्ताओं ने नेशनल कंटेंट कंट्रोल अथॉरिटी के गठन की मांग की है, जो सामग्री की समीक्षा करे।
जागरूकता अभियान और जनहित याचिकाएं जैसे उदय माहुरकर और अनिल बनवारिया की याचिकाएं। फिर भी समाज का एक बड़ा वर्ग इस सामग्री को चुपके से उपभोग करता है जिससे रोकथाम के प्रयास कमजोर पड़ते जा रहे हैं।
सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉम्र्स पर अश्लील कंटेंट एक गंभीर सामाजिक चुनौती है जो युवाओं और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। सरकार के मौजूदा नियम और प्रस्तावित कोड ऑफ कंडक्ट सकारात्मक कदम है लेकिन इनका प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख स्वागत योग्य है। विशेष रूप से बाल यौन शोषण सामग्री पर उसकी जीरो टॉलरेंस नीति। समाज को भी जागरूकता और सामूहिक जवाबदेही के माध्यम से इस समस्या का सामना करना होगा। अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक मर्यादाओं के बीच संतुलन बनाना एक जटिल कार्य है, लेकिन एक मजबूत नियामक ढांचा और सामाजिक सहभागिता इसे संभव बना सकती है।