Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – नक्सल खात्मे को लेकर सरकार और जनता एकमत

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र

-सुभाष मिश्र

दशकों से माओवाद पीडि़त दक्षिणी छत्तीसगढ़ में शांति स्थापना के लिए युद्धविराम और शांतिवार्ता के लिए नक्सलियों का राज़ी होना इस बात की सूचना है कि राज्य के माओवाद-विरोधी अभियान ‘ऑपरेशन कगार से उन्हें भीषण क्षति हुई है। उधर सरकार माओवाद के उन्मूलन के लिए कटिबद्ध और हालिया सफलताओं से उत्साहित नजऱ आती है। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ने कहा है कि सरकार वार्ता के लिए तैयार है लेकिन उसके लिए कोई शर्त नहीं मानेगी। माओवादियों ने ऑपरेशन कगार को असंवैधानिक निरूपित किया है। उनका कहना है कि नागरिक क्षेत्रों में सेना का प्रयोग अनुचित है। नक्सलियों का दावा है कि सुरक्षा बलों के अभियान के कारण उनके 400 से अधिक नेता, कार्यकर्ता और आम आदिवासी मारे गए हैं। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों से सुरक्षा बलों को तत्काल हटाये जाने और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सैनिकों की तैनाती रोके जाने की माँग की है। तीसरी मांग यह है कि ‘ऑपरेशन कगार जैसे अभियानों को पूरी तरह रोका जाए। माओवादियों के राजनीतिक संगठन सीपीआई (माओवादी) ने सरकार पर जनजातीय समुदायों के खिलाफ ‘नरसंहार युद्ध छेडऩे का आरोप लगाया है। उनकी दृष्टि में ऑपरेशन कगार का असली उद्देश्य क्रांतिकारी आंदोलनों का दमन करना और बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों को पूँजीपतियों के लिए सुलभ कराना है। वे कहते हैं नागरिक क्षेत्रों में सशस्त्र सैन्य कार्रवाई असंवैधानिक और मानवाधिकार सिद्धांतों के खिलाफ है। एक बयान में माओवादी प्रवक्ता ने बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों, छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से सरकार पर शांति वार्ता में शामिल होने के लिए दबाव बनाने की भी अपील की है। सीपीआई (माओवादी) ने कहा है कि यदि सरकार अभियान रोकती है तो वे तुरंत युद्ध विराम की घोषणा कर देंगे। यदि शर्तें मानी जाती हैं तो समाधान संभव है।
नक्सलवाद के ख़ात्मे को लेकर सरकार का दृष्टिकोण और जनता का नजरिया पिछले कुछ वर्षों में काफी हद तक एक जैसा होता दिख रहा है। सरकार ने नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना है। इसके उन्मूलन के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाई है, जिसमें सैन्य कार्रवाई, विकास कार्यों को बढ़ावा देना और प्रभावित क्षेत्रों में लोगों का विश्वास जीतना शामिल है। यह दृष्टिकोण धीरे-धीरे जनता के बीच भी स्वीकार्यता पा रहा है, क्योंकि लोग हिंसा से मुक्ति और विकास की संभावनाओं को प्राथमिकता देने लगे हैं। 4-5 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ के दो दिवसीय दौरे पर आ रहे हैं। अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान ‘बस्तर पंडुमÓ महोत्सव के समापन समारोह में शामिल होंगे और नक्सल विरोधी अभियानों में शामिल सुरक्षाबलों के अधिकारियों के साथ बैठक की अध्यक्षता करेंगे। यह मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खत्मे में अंतिम कील ठोकने की क़वायद है। छत्तीसगढ़ सरकार की नई पुनर्वास और आत्मसमर्पण नीति के ज़रिए नक्सलियों को बातचीत, समर्पण का एक और अवसर देने की कोशिश।
एक अप्रैल को अमित शाह ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है कि सरकार 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि देश में नक्सलवाद से प्रभावित कुल 38 जिलों में से अति प्रभावित जिलों की संख्या 12 से घटकर 6 हो गई है। इनमें छत्तीसगढ़ के चार जिले (बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा), झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम और महाराष्ट्र का गढ़चिरौली शामिल है। इसी प्रकार कुल 38 प्रभावित जि़लों में से डिस्ट्रिक्ट आफ कॉन्सर्न, जहां अतिप्रभावित जिलों के अतिरिक्त संसाधनों को सघन रूप से मुहैया कराने की आवश्यकता है, की संख्या 9 से घटकर 6 रह गई है। ये 6 जि़ले हैं आंध्र प्रदेश (अल्लूरी सीताराम राजू), मध्य प्रदेश (बालाघाट), ओडिशा (कालाहांडी, कंधमाल और मलकानगिरी) और तेलंगाना (भद्राद्रि-कोठागुडेम)। नक्सलवाद के खिलाफ लगातार कार्रवाई के कारण अन्य नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी 17 से घटकर 6 रह गई है, जिनमें, छत्तीसगढ़ (दंतेवाड़ा, गरियाबंद और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी), झारखंड (लातेहार), ओडिशा(नुआपाड़ा) और तेलंगाना (मुलुगु), शामिल है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा है कि हमारी नई आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति-2025 का परिणाम है कि नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में नक्सलियों द्वारा आत्मसमर्पण किया जाना ऐतिहासिक है। प्रदेश में बीते 13 महीनों में 305 नक्सली मारे जा चुके हैं, 1177 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है और 985 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है।
पहले जहां विपक्ष और मानवाधिकार कार्यकर्ता नक्सली मुठभेड़ों को अक्सर ‘फर्जी मुठभेड़Ó करार देते थे और सरकार पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते थे, वहीं अब उनकी बयानबाजी में कमी देखी जा रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला, सरकार ने मुठभेड़ों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं, जैसे कि ऑपरेशनों की वीडियो रिकॉर्डिंग और स्वतंत्र जांच की व्यवस्था। दूसरा, जनता का समर्थन सुरक्षा बलों के पक्ष में बढ़ा है, क्योंकि लोग नक्सली हिंसा से तंग आ चुके हैं। तीसरा, नक्सलियों के आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या और हिंसा में कमी ने विपक्ष और कार्यकर्ताओं के नैरेटिव को कमजोर किया है। हाल के समय में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में नक्सलियों के आत्मसमर्पण को सरकार और जनता दोनों ने सकारात्मक कदम माना है।
अमित शाह के बस्तर प्रवास से पहले नक्सलियों ने एक पर्चा जारी किया है। तेलुगू भाषा में लिखे इस पर्चे में साफ तौर पर लिखा है कि वे शांति वार्ता को तैयार हैं। नक्सली संगठन की ओर से जारी पर्चा में कहा गया है कि पिछले 15 महीनों में उनके 400 साथी मारे गए हैं। यदि राज्य और केंद्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन रोकती है तो हम शांति वार्ता के लिए तैयार हैं। हमारा प्रस्ताव है कि केंद्र और राज्य सरकारें झारखंड, मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र (गढ़चिरौली), ओडिशा और तेलंगाना में ऑपरेशन कगार के नाम पर हत्याओं और नरसंहार को रोकें। नए सशस्त्र बलों के कैंप की स्थापना रोकें। यदि केंद्र और राज्य सरकारें इन प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देती है तो हम तुरंत युद्धविराम की घोषणा कर देंगे।
यह सही है कि सरकार बातचीत तो करना चाहती है लेकिन नक्सलियों की शर्त पर नहीं, अपनी शर्तों पर। अब देखना होगा कि रोज़-रोज बड़ी संख्या में मरते अपने नक्सली साथी, जप्त होता असली बारूद, रूपया पैसा, ढहते स्मारक, थकी हुई फौज, बूढ़ा और ख़त्म होता नेतृत्व, समर्पण करते सहयोगियों और जनता के बीच मुक्तिदाता की दरकती छवि की ज़मीनी सच्चाई को समझकर सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं या अपने नक्सलबाड़ी की तरह समूचा ख़ात्मा। गेंद अब सरकार के पाले में है जो अभियान की सफलता के चलते झुकने को तैयार नहीं दिखती लेकिन बस्तर में स्थायी शांति कायम करना यदि उसका लक्ष्य है तो इसके लिए वार्ता की मेज पर आना होगा। अन्यथा हिंसा-प्रतिहिंसा का चक्र बस्तर में चलता रहेगा।
बस्तर में संचार और परिवहन के ढांचे के क्रमश: विकसित होने, दूरस्थ इलाक़ों में बाज़ार की पहुँच होने और शासन तंत्र के प्रभावी होने के साथ परिस्थितियां बदल रही हैं। दुर्गम क्षेत्र अब इतने दुर्गम नहीं रह गये हैं कि वे शासनतंत्र की पहुँच से अब भी अछूते हों। ज़ाहिर है, माओवादी इन बदले हालात में सैन्य अभियानों के आगे अस्तित्व का संकट महसूस कर रहे हों। उनकी ओर से शांति की पेशकश सम्भवत: इसी का परिणाम है लेकिन सरकार को भी नक्सल समस्या के तात्कालिक प्रशासनिक समाधान के बजाय दीर्घकालीन समाधान के लक्ष्य को ध्यान में रखना होगा ताकि इस इलाक़े में स्थायी शांति क़ायम हो। माओवादियों के पुनर्वास के साथ ही सरकार को बस्तर में रोजग़ार और आदिवासी समाज के समुचित आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की समन्वित नीति ईजाद करनी होगी, माओवाद का ख़ात्मा तभी होगा।

Related News