खान-पान, आस्था और क़ानून के बीच संतुलन की ज़रूरत

खान-पान, आस्था और क़ानून के बीच संतुलन की ज़रूरत

हिंदुस्तानी समाज की सबसे बड़ी पहचान उसकी बहुलता रही है—भाषा, पहनावा, आस्था और खान-पान, सबमें विविधता। समुद्र किनारे बसे समाजों के लिए मछली जीवन का स्वाभाविक ह...

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महाराष्ट्र से बिहार तक : क्या बदलती भारतीय राजनीति का संकेत हैं ये चुनावी नतीजे

-सुभाष मिश्रमहाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक, एनडीए और भाजपा को मिली लगातार सफलत...

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क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है?

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है?

-सुभाष मिश्रभारत में भ्रष्टाचार अब केवल नैतिक पतन या व्यक्तिगत लालच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संस्थागत संकट का रूप ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट का भ्र...

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नई जनरेशन की नई चाहत-ना शादी, ना बच्चा

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: नई जनरेशन की नई चाहत-ना शादी, ना बच्चा

-सुभाष मिश्रनई जनरेशन की शादी की कोई जल्दी नहीं है। यदि शादी हो भी जाए, तो बच्चा जल्दी नहीं चाहिए। देश में पहले नारा था— दो या तीन बस, फिर समय के साथ नारा बदल...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – लालच के आगे हारता विवेक

-सुभाष मिश्रभारतेंदु हरिश्चंद्र ने अंधेर नगरी के गीत में बहुत पहले जिस वाक्य को लगभग चेतावनी की तरह रखा था 'लोभ पाप का मूल है। आज वही वाक्य हमारे समय की सबसे ...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – धान के गोदामों में चूहे और तंत्र का सच

-सुभाष मिश्रकई बार मन में यह ख्याल आता है कि यदि चूहे नहीं होते, दीमक नहीं होती, सरकारी दफ्तरों में दैवीय प्रको...

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जब कुलपति ने साहित्य को ‘अनुशासन’ सिखाया और साहित्यकार प्रतिरोध भूलकर चुप रहे

-सुभाष मिश्रसाहित्य अकादमी और गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़...

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जेएनयू, नारे और राष्ट्र: अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम लोकतांत्रिक विवेक

-सुभाष मिश्रभारत के लोकतंत्र में विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने वाले संस्थान नहीं होते, बल्कि वे उस बौद्धिक च...

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एसआईआर: मतदाता सूची का शुद्धिकरण या लोकतंत्र की परीक्षा?

-सुभाष मिश्रउत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की ड्राफ्ट मतदाता सूची सामने आते ही लोकतंत्र के सबसे बुनियादी आधार—मतदाता—पर ही सवाल खड़े हो गए ह...

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मनरेगा पर नया प्रयोग: ग्रामीण रोजग़ार, नीति और राजनीति

मनरेगा पर नया प्रयोग: ग्रामीण रोजग़ार, नीति और राजनीति

दिसंबर 2025 में संसद द्वारा वीबी-जी-राम-जी अधिनियम का पारित होना केवल एक नई ग्रामीण योजना की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भारत की सामाजिक नीति, संघीय ढांचे और राज...

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