छत्तीसगढ़ सरकार का सुशासन तिहार

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार एक बार फिर सुशासन तिहार 2026 के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि प्रशासन अब जनता के दरवाजे तक पहुंचने वाला है। 1 मई से 10 जून तक चलने वाले इस अभियान में गांव-गांव, वार्ड-वार्ड शिविर लगाकर वर्षों से लंबित जमीन विवाद, नामांतरण, सीमांकन, राशन कार्ड, आय-जाति प्रमाण पत्र और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मामलों का मौके पर निराकरण करने का दावा किया जा रहा है। कागजों पर सुशासन अभियान जैसी बहुत सी पहल जो पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा भी की गई ,जितनी प्रभावी और जनोन्मुखी दिखती है, जमीन पर उतने ही असहज सवाल भी खड़े करती है। आखिर क्यों एक ऐसी व्यवस्था, जिसके लिए पूरे साल तहसील, जनपद, कलेक्टर और सचिवालय जैसे ढांचे मौजूद हैं, उसे अपनी सक्रियता साबित करने के लिए तिहार का सहारा लेना पड़ता है? क्या यह मान लिया जाए कि सामान्य दिनों में प्रशासन उतना उत्तरदायी नहीं रहता, जितना इन विशेष अभियानों के दौरान दिखता है? अलग-अलग नामों से संचालित हुई है ऐसी सारी पहल बीते वर्षों में भी ऐसे सुशासन शिविर लगे, मुख्यमंत्री खुद जिलों में पहुंचे, और कई मामलों का त्वरित समाधान हुआ। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इन अभियानों से तत्काल राहत मिलती है और लोगों को यह भरोसा भी बनता है कि सरकार उनकी सुन रही है। लेकिन यही तत्काल समाधान कहीं न कहीं इस सच्चाई को भी उजागर करता है कि आम दिनों में वही काम महीनों तक अटका रहता है। ग्रामीणों को नामांतरण या सीमांकन जैसे बुनियादी कामों के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, फाइलें बिना दबाव के आगे नहीं बढ़तीं और कई जगहों पर रिश्वतखोरी की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। ऐसे में जब वही प्रशासन कुछ दिनों के लिए पूरी तत्परता के साथ काम करता है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या समस्या संसाधनों की है या इच्छाशक्ति की?
सुशासन तिहार का एक राजनीतिक पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब मुख्यमंत्री स्वयं जिलों में जाकर शिविरों की निगरानी करते हैं और अधिकारियों को मौके पर निर्देश देते हैं, तो इससे एक सक्रिय और संवेदनशील नेतृत्व की छवि बनती है। कुछ हद तक उसी रणनीति का हिस्सा लगती है, जिसने नीतीश कुमार को “सुशासन बाबू” के रूप में स्थापित किया था। लेकिन फर्क यह है कि छवि तब स्थायी बनती है जब उसके साथ प्रशासनिक ढांचे में स्थायी सुधार भी दिखे। केवल अभियानों और आयोजनों के भरोसे सुशासन की पहचान लंबे समय तक टिक नहीं सकती। बिहार के सुशासन की सच्चाई आज सबके सामने है।
इस बार सुशासन तिहार ऐसे समय हो रहा है जब राज्य की राजनीति में भी हलचल तेज है। केंद्र और राज्य के बीच टकराव, महिला संबंधित मुद्दों पर बहस और विशेष सत्र की तैयारियों के बीच यह अभियान एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी करता दिख रहा है कि सरकार जमीन पर सक्रिय है और जनता के बीच मौजूद है। लेकिन जनता का अनुभव ही इस दावे की असली परीक्षा होगा। अगर तिहार खत्म होने के बाद फिर वही सुस्ती, वही प्रक्रियात्मक जटिलताएं और वही दफ्तरों के चक्कर लौट आते हैं, तो यह पूरा आयोजन केवल एक अस्थायी राहत बनकर रह जाएगा।
सरकार जिन योजनाओं—उज्ज्वला, आयुष्मान, सामाजिक सुरक्षा—को इस अभियान के जरिए अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की बात कर रही है, उनकी अपनी जमीनी चुनौतियां हैं। उज्ज्वला का कनेक्शन मिल जाने के बाद भी गैस रीफिल की कीमत कई परिवारों के लिए बोझ है, आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद अस्पतालों में व्यवहारिक दिक्कतें सामने आती हैं और ऑनलाइन व्यवस्था होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी व जागरूकता की कमी बनी हुई है। ऐसे में शिविरों के जरिए कुछ मामलों का समाधान जरूर हो सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
असल सवाल यह नहीं है कि सुशासन तिहार सफल होगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इसके बाद भी वही गति और जवाबदेही बनी रहेगी। सुशासन का मतलब यह नहीं कि सरकार कुछ तय दिनों में सक्रिय दिखे, बल्कि यह है कि हर दिन, हर स्तर पर प्रशासन बिना दबाव और बिना भेदभाव के काम करे। जनता को अपने अधिकारों के लिए किसी विशेष अभियान या तिहार का इंतजार न करना पड़े, यही वास्तविक सुशासन की पहचान है।
छत्तीसगढ़ की जनता के लिए यह तिहार उम्मीद लेकर आता है, लेकिन उम्मीद तभी विश्वास में बदलेगी जब यह पहल एक स्थायी व्यवस्था में तब्दील हो। अगर विष्णुदेव साय सरकार इस अभियान को केवल आयोजन तक सीमित न रखकर इसे प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बना सके, तो यह वास्तव में “हमारा छत्तीसगढ़” और “सुशासन” दोनों की परिभाषा को मजबूत करेगा। वरना हर साल एक नया तिहार आएगा, कुछ दिन राहत मिलेगी और फिर वही पुरानी समस्याएं जनता के दरवाजे पर दस्तक देती काश सुशासन तिहारों से ये प्रशासनिक जड़ताएं टूटती और तंत्र से जुड़े लोग आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की तरह सहज होते।
इधर के सालों में जितनी तेजी से टेक्नालॉजी से लोग फेमिलियर हुए हैं और उसने लोगों के रोजमर्रा के जीवन को जितना सहज सरल बनाया है ,उसकी तुलना में टेक्नालॉजी अपनाने वाले प्रशासकीय तंत्र से क़तई ऐसा नहीं किया ।इसकी वजह साफ है तंत्र की जड़ता और असंवेदनशीलता।

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