-सुभाष मिश्र
बिहार के भोजपुर जिले की हालिया घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे यहां किसी भी बड़ी घटना का मूल्यांकन तथ्यों और कानून के आधार पर होता है, या फिर उसकी दिशा जातीय पहचान तय करती है? भरत तिवारी को उनके समर्थक सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं और फेसबुक लाइव के जरिए आत्मसमर्पण की बात करते हैं। उसके बाद पुलिस मुठभेड़ में उनकी मौत हो जाती है। पुलिस एनकाउंटर बताती है। आम जनता इसको हत्या मानती है। घटना की निष्पक्ष जांच अपनी जगह आवश्यक है, लेकिन उससे पहले ही सोशल मीडिया, राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों ने इसे जातीय चश्मे से देखना शुरू कर दिया। बहस इस बात पर कम हुई कि मुठभेड़ की परिस्थितियां क्या थीं, इस बात पर अधिक जोर दिया जा रहा है कि मृतक किस जाति का था? भारतीय राजनीति में कोई भी राजनीतिक दल हो, जाति के एंगल से जरूर सोचा जाता है। जातियों में जैसी एकता बढ़ रही है राजनीतिक दल उसे वोट की तरह देखने लग जाते हैं। इस घटना इस बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है कि न्याय, संवेदना और समर्थन भी जाति के आधार पर तय होने लगे हैं।
जब भी भारत में कोई बड़ी घटना होती है, किसी की हत्या, पुलिस एनकाउंटर, बलात्कार, दंगा, आरक्षण का प्रश्न या चुनाव, सबसे पहले जो सवाल उठता है, वह यह नहीं होता कि सच क्या है, बल्कि यह होता है कि वह किस जाति का था? लोग किसी भी निर्णय पर जाति के आधार पर पहुंचते हैं। लोग सोचते हैं यदि मृतक हमारी जाति का है तो वह शहीद है। यदि आरोपी हमारी जाति का है तो उसके बचाव में तर्क खोजे जाने लगते हैं। यदि पीडि़त दूसरी जाति का है तो संवेदनाएं भी जाति के चश्मे से छनकर बाहर आती हैं। आजादी के बाद से भारतीय राजनीति और समाज इसी जाति के आधार से बनता और आगे बढ़ता रहा है। यह केवल राजनीति की विफलता नहीं, बल्कि समाज की गहरी मानसिक बीमारी का संकेत है।
भारतीय संविधान ने नागरिक बनाए, लेकिन समाज आज भी जातियों में बंटा हुआ है। हजारों वर्षों पुरानी वर्ण व्यवस्था से इतर जाति व्यवस्था का प्रभाव आज भी हमारे सामाजिक व्यवहार, रिश्तों, विवाह, गांवों की बसाहट और यहां तक कि राजनीतिक सोच पर दिखाई देता है। दुखद यह है कि लोकतंत्र ने इस विभाजन को समाप्त करने के बजाय कई बार उसे और मजबूत किया है।
हर राजनीतिक दल समानता, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की बात करता है। कोई गांधी का नाम लेता है, कोई डॉ. भीमराव अंबेडकर का, कोई भगत सिंह का, कोई दीनदयाल उपाध्याय का, कोई श्यामा प्रसाद मुखर्जी का, तो कोई कार्ल मार्क्स और लेनिन का। लेकिन जब चुनाव में उम्मीदवार चुनने की बारी आती है, तब सबसे पहले जिस बात पर नजर जाती है, वह उसकी योग्यता नहीं बल्कि उसकी जाति होती है। सवाल यह है कि यदि राजनीति स्वयं जाति से ऊपर नहीं उठ पा रही, तो समाज से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह जातिवाद छोड़ देगा?
सत्तर के दशक का जेपी आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था। वह सामाजिक परिवर्तन का भी सपना था। अनेक युवाओं ने अपने नाम से जातिसूचक उपनाम हटा दिए। यह संदेश था कि पहचान व्यक्ति के विचारों और कर्मों से बनेगी, जाति से नहीं। लेकिन समय बीता, मंडल राजनीति आई और सामाजिक न्याय के नाम पर एक नई राजनीतिक धुरी खड़ी हुई। इससे पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों को सत्ता में प्रतिनिधित्व मिला, जो लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन इसके साथ ही जाति राजनीतिक शक्ति का सबसे प्रभावी हथियार भी बन गई। बिहार और उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वहां कोई भी बड़ी घटना कुछ ही घंटों में जाति की बहस में बदल जाती है। कानून, न्याय और अपराध की चर्चा पीछे छूट जाती है, जबकि जाति बहस का केंद्र बन जाती है। सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक गणित के अनुसार पक्ष और विपक्ष तय करते हैं। ऐसा लगता है मानो न्याय का पैमाना संविधान नहीं, बल्कि जाति समीकरण हो।
यह प्रवृत्ति केवल बिहार या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी सामाजिक और राजनीतिक समीकरण जाति एवं सामुदायिक आधार पर बनते-बिगड़ते हैं। कहीं आदिवासी और गैर-आदिवासी की खाई है, कहीं धर्मांतरण को लेकर तनाव है, तो कहीं आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई। पहचान की राजनीति हर राज्य में अलग रूप धारण कर लेती है, लेकिन उसका मूल स्वरूप एक ही है, समाज को अलग-अलग हिस्सों में बांटना। यह भी सच है कि सदियों तक वंचित रहे समाजों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला, उनकी आवाज सत्ता तक पहुंची और लोकतंत्र अधिक समावेशी बना। इसे नकारना इतिहास के साथ अन्याय होगा। लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि यदि हर घटना को केवल जाति के चश्मे से देखा जाएगा तो कानून का शासन कमजोर होगा और समाज में स्थायी अविश्वास पैदा होगा।
कबीर ने सदियों पहले कहा था— ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।’ दुर्भाग्य यह है कि आज हम ज्ञान नहीं, जाति पूछते हैं। योग्यता नहीं, बिरादरी देखते हैं। विचार नहीं, वोट बैंक तलाशते हैं। यही कारण है कि चुनावी सभाओं से लेकर सोशल मीडिया तक हर बहस का निष्कर्ष अंतत: जाति पर आकर रुक जाता है। चुनाव में लोकतंत्र का प्रतिनिधि चुना जाता है लेकिन बाद में देखा जाता है कि वह तो जाति के प्रतिनिधि में बदल गया है। यदि हर हत्या जाति की हत्या बन जाएगी, हर अपराध जाति के सम्मान का प्रश्न बन जाएगा और हर चुनाव जाति जनगणना का गणित बन जाएगा, तो संविधान की आत्मा कमजोर हो जाएगी।
भारत की राजनीति, समाज और प्रशासन को यह स्वीकार करना होगा कि सामाजिक न्याय और जाति की राजनीति एक ही बात नहीं हैं। सामाजिक न्याय सभी को समान अवसर की बात करता है, जबकि जाति की राजनीति व्यक्ति और समाज को संकीर्ण बनाने की का षड्यंत्र है। एक समाज को जोड़ती है, दूसरी उसे वोट बैंक में बदल देती है। आज सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि किस जाति का वर्चस्व है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी भी इसी जाति बोझ के साथ जीने को अभिशप्त रहेगी, जिसे खत्म करने का सपना कबीर ने देखा था, जिसे जेपी ने जगाया था और जिसे संविधान ने समान नागरिकता के रूप में स्थापित किया था। जिस दिन किसी घटना पर हमारा पहला प्रश्न यह होगा कि ‘सच क्या है, कानून क्या कहता है और न्याय किसमें है?’ यह लोकतंत्र की सफलता होगी। यदि यह पूछा जाता है कि ‘वह किस जाति का था?’ तो भारतीय समाज का दुर्भाग्य बना रहेगा।