ना तुम जीते, ना हम हारे

ना तुम जीते, ना हम हारे

-सुभाष मिश्र
लोकसभा में महिला आरक्षण को लागू करने की ताज़ा कोशिश जिस तरह अंतत: विफल हुई, उसने भारतीय राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ जीत और हार की पारंपरिक परिभाषाएँ धुंधली पड़ गई हैं। सत्ता पक्ष इसे ‘महिला सशक्तिकरण के अवसर को विपक्ष द्वारा रोकने’ की तरह प्रस्तुत कर रहा है, तो विपक्ष इसे ‘परिसीमन के जरिए शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश को विफल करने’ की उपलब्धि बता रहा है। लेकिन इन दोनों दावों के बीच जो वास्तविकता उभरती है, वह कहीं अधिक जटिल और असहज है।
दरअसल, विवाद का केंद्र महिला आरक्षण कम और उसे परिसीमन से जोडऩे का निर्णय अधिक रहा। 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक पर व्यापक सहमति पहले ही बन चुकी थी। विपक्षी दलों का तर्क यही है कि यदि नीयत साफ होती, तो उसी आधार पर मौजूदा 543 सीटों के ढांचे में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता था। लेकिन सरकार ने इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया और यहीं से संशय की शुरुआत हुई। विपक्ष के नेताओं जैसे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने इसी बिंदु को बार-बार उठाया कि महिला आरक्षण पर सहमति को एक जटिल प्रक्रिया के साथ क्यों जोड़ा गया।

सत्ता पक्ष की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों का समर्थन क्यों नहीं किया और यह तक कहा जा रहा है कि ‘महिलाएं उन्हें माफ नहीं करेंगी।’ दूसरी तरफ विपक्ष यह कह रहा है कि वह महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ जोड़ी गई ‘राजनीतिक शर्तों’ के खिलाफ है। दिलचस्प यह है कि इस बार विपक्ष केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद में संख्या के स्तर पर भी एकजुट दिखाई दिया, यहाँ तक कि सामान्यत: तटस्थ रहने वाली पार्टियाँ भी सरकार के साथ खड़ी नहीं दिखीं।

इस पूरे घटनाक्रम में एक तीसरी परत भी है, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण है, विश्वास का संकट। जब कोई सरकार किसी लोकप्रिय और व्यापक समर्थन वाले मुद्दे जैसे महिला आरक्षण को किसी दूसरी, अधिक विवादित प्रक्रिया जैसे परिसीमन के साथ जोड़ती है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि प्राथमिकता क्या है और उद्देश्य क्या है। क्या यह वास्तव में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की पहल थी, या फिर इसके साथ एक बड़े राजनीतिक पुनर्संतुलन को साधने की कोशिश भी जुड़ी हुई थी?
परिसीमन अपने आप में कोई असामान्य या असंवैधानिक प्रक्रिया नहीं है। जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब यह प्रक्रिया उस समय सामने आती है जब देश के कुछ हिस्सों विशेषकर दक्षिणी राज्यों को यह आशंका हो कि उनकी सापेक्ष राजनीतिक हिस्सेदारी घट सकती है, तब यह केवल प्रशासनिक कदम नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक संवेदनशीलता का प्रश्न बन जाता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने इसे अपनी ‘राजनीतिक जीत’ बताते हुए साफ संकेत दिया है कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि आगे और तेज हो सकती है।

इधर सत्ता पक्ष ने भी इस मुद्दे को केवल संसद तक सीमित नहीं रखा। देशभर में महिला समूहों के माध्यम से एक नैरेटिव गढऩे की कोशिश हो रही है कि विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों को रोका है। विपक्ष इसके जवाब में यह कह रहा है कि वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है और असल सवालों से ध्यान हटाया जा रहा है। इस तरह, महिला आरक्षण जो अपने आप में एक सामाजिक न्याय का विषय था। अब पूरी तरह राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में बदल चुका है।
यह भी एक दिलचस्प विडंबना है कि दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से खुद को ‘विजेता’ घोषित कर रहे हैं। सत्ता पक्ष कह रहा है कि उसने महिलाओं के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया, जबकि विपक्ष का दावा है कि उसने एक संभावित राजनीतिक चाल को विफल कर दिया। लेकिन यदि गहराई से देखें, तो स्थिति कुछ ऐसी बनती है जहाँ न तो महिला आरक्षण लागू हो पाया और न ही परिसीमन पर कोई स्पष्ट सहमति बन सकी।

आगे की राह भी कम जटिल नहीं है। जनगणना के बाद परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया के तहत फिर सामने आएगा, और तब ओबीसी सहित विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी इससे जुड़ जाएगा। यानी यह विवाद टला है, खत्म नहीं हुआ। तब तक यह राजनीतिक विमर्श का एक स्थायी हिस्सा बना रहेगा, जिसमें हर पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या के साथ जनता के सामने जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात जरूर स्पष्ट कर दी है कि भारतीय लोकतंत्र में अब केवल विधेयक पारित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके पीछे की नीयत, प्रक्रिया और समय, तीनों पर समान रूप से सवाल उठेंगे। और शायद यही कारण है कि इस बार संसद के भीतर भले ही कोई बिल पास नहीं हुआ, लेकिन संसद के बाहर एक नई राजनीतिक कहानी जरूर लिखी जा चुकी है, जिसमें हर पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहा है, और जनता अब भी यह तय करने की कोशिश में है कि आखिर वास्तव में जीता कौन और हारा कौन।

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