प्वाइंटर- 19 प्रजातियों की हुई पहचान
राजकुमार मल
भाटापारा- वरदान हैं वृक्षों की वह 19 प्रजातियां जो शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्र में बढ़िया बढ़वार लेती हैं। इनमें कई ऐसी हैं, जो अधिक गर्मी और असमान बारिश जैसी अनुपयुक्त जलवायु में भी जोरदार परिणाम देतीं हैं।
पौधारोपण की योजना भले ही धीमी गति से बनाई जा रही हो लेकिन वानिकी वैज्ञानिकों ने पहली बार प्रदेश के तीन क्षेत्रों के 11 जिलों को पौधरोपण में शीर्ष स्थान पर रखने को अहम माना है क्योंकि यह जिले अनुपयुक्त जलवायु वाले माने जा चुके हैं। इसलिए प्रजाति चयन अहम होगा। इसमें 19 प्रजातियों को इन जिलों के लिए सही बताया गया है।
उत्तर पश्चिम क्षेत्र में यह प्रजातियां
उत्तर पश्चिम क्षेत्र में बलौदा बाजार, बेमेतरा, मुंगेली, कबीरधाम और राजनांदगांव जिला। हल्की बलुई मिट्टी और सीमित जल स्रोत वाले यह जिले, कम वर्षा वाले माने जाते हैं। वानिकी वैज्ञानिकों ने यहां नीम, सहजन, बरगद, पलाश, खमेर, खैर और बबूल को एकदम सही माना है क्योंकि यह प्रजातियां सूखा सहिष्णु, कम पानी मांगती हैं और घनी छाया के साथ पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखतीं हैं। अच्छी बात यह है कि यह सभी तेज बढ़वार लेती हैं।
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पश्चिम क्षेत्र के लिए बेहतर
कवर्धा, रायगढ़ और महासमुंद। अधिक गर्मी और 1000 से 1200 मिमी बारिश वाले यह जिले पश्चिम क्षेत्र में लिए गए हैं। जल संचयन की समस्या इस क्षेत्र को अनुपयुक्त परिस्थितियों में लाकर खड़ा कर दिया है। यहां के लिए साल, सागौन, महुआ, तेंदू, आंवला और कटहल का रोपण, संरक्षण और संवर्धन को जरूरी माना जा रहा है क्योंकि यह सभी प्रजातियां अल्प सिंचाई की व्यवस्था में तैयार हो जातीं हैं और ताप सहनशील हैं।
दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र
इस क्षेत्र में दंतेवाड़ा, बीजापुर और नारायणपुर जिले का कुछ हिस्सा चिन्हित किया गया है, जो अनुपयुक्त परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। असमान वर्षा वितरण तो है ही उष्णकटिबंधीय लाल और पीली जैसी कम जल धारण क्षमता वाली मिट्टी जैसी दिक्कत भी बनी हुई है। इस क्षेत्र के लिए इमली, कुसुम, चार, जामुन, बेल और बांस के पौधों का रोपण किया जाना इसलिए जरूरी माना गया क्योंकि यह प्रजातियां मिट्टी और जल संरक्षण में मदद करतीं हैं सूखा सहनशील गुण इनमें भी होते हैं।
भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक
स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वृक्षारोपण न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जल संरक्षण में मदद करने और स्थानीय जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
-अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर