-सुभाष मिश्र
कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े अध्याय को हटाने का निर्णय केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि हमारे समय के सबसे असहज सच से टकराने का संकेत है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पाठ को लेकर उठा विवाद और सुप्रीम कोर्ट की स्वत: संज्ञान कार्यवाही ने यह प्रश्न फिर सामने ला दिया है—क्या हम बच्चों को यथार्थ पढ़ाने से डर रहे हैं या यथार्थ को संतुलित ढंग से पढ़ाने में असफल हो रहे हैं।
दरअसल, समाज की सामूहिक अनुभूति यह कहने लगी है कि भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं रहा, वह धीरे-धीरे सदाचार की तरह स्वीकार्य व्यवहार में बदलता दिखाई देता है। वह ईश्वर की तरह सर्वव्यापी है कहीं दिखाई देता है, कहीं अदृश्य रहता है, पर उसकी मौजूदगी को नकारना अब नादानी से अधिक, नाटक लगता है। ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा जैसे राजनीतिक संकल्प जब रोजमर्रा के अनुभव से टकराते हैं, तो आम आदमी के भीतर व्यंग्य जन्म लेता है।
कभी यह कहा गया था कि दिल्ली से भेजा गया एक रुपया नीचे आते-आते पंद्रह पैसे रह जाता है। यह कथन केवल भाषण नहीं था, बल्कि व्यवस्था की स्वीकृत कमजोरी का प्रतीक था। आज स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार की आलोचना सार्वजनिक मंचों पर होती है, पर स्वीकारोक्ति दबी जुबान से। पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने हैं, व्यवस्था से टकराने वाला नागरिक यह महसूस करता है कि सच सब जानते हैं, बस बोलने का तरीका बदल गया है।
हमारे देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि पंचायत से लेकर राजधानी तक सरकारी तंत्र से जुड़ा लगभग हर नागरिक उसका अनुभव करता है। ट्रेन में बिना आरक्षण यात्रा करने पर टीटी को पैसे देकर सीट पाने की मजबूरी हो या किसी कार्यालय में अटकी फाइल को आगे बढ़ाने के लिए बाबू और दलाल के बीच की अनकही व्यवस्था, यह सब सार्वजनिक रहस्य है। यही वह जमीन है जहां आम आदमी व्यवस्था को समझता है, भले वह उसे बदल न पाए।
समाज लंबे समय तक यह मानता रहा कि राजनीति भ्रष्ट है, फिर उंगली नौकरशाही पर उठी, और अब न्यायपालिका पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीति में सेवा के नाम पर आने वाले लोग जब कुछ वर्षों में असामान्य आर्थिक तरक्की करते दिखाई देते हैं आलीशान मकान, महंगी गाडिय़ां, प्रभाव का विस्तार तो आम नागरिक तुलना करता है उस मेहनतकश से जो दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता है। यह तुलना ही अविश्वास की असली जमीन बनाती है।
ऐसे में यदि पाठ्यक्रम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा होती है तो प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि इसे क्यों पढ़ाया गया, बल्कि यह होना चाहिए कि इसे किस संतुलन से पढ़ाया गया। यदि भ्रष्टाचार पढ़ाना है तो लोकतंत्र के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी के संदर्भ में पढ़ाया जाना चाहिए। क्योंकि सच यही है कि ‘इस हमाम में सब नंगे हैंÓ केवल एक संस्था को अलग करके न तो समस्या समझी जा सकती है, न समाधान।
वर्तमान विवाद इसलिए भी अलग है क्योंकि यह इतिहास की व्याख्या या सांस्कृतिक प्रतीकों पर बहस नहीं, बल्कि समकालीन व्यवस्था की वास्तविक समस्या पर बहस है। पहली बार ऐसा महसूस होता है कि किसी पाठ को इसलिए हटाने की चर्चा हो रही है क्योंकि वह एक असहज प्रश्न उठाता है। यह शिक्षा के उद्देश्य पर मूलभूत सवाल खड़ा करता है, क्या शिक्षा का काम संस्थाओं की छवि बचाना है या नागरिक चेतना बनाना।
यह भी सच है कि बच्चों के मन में संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना शिक्षा नहीं है। पर यह भी उतना ही सच है कि वास्तविक समस्याओं को छिपाना शिक्षा नहीं है। सही रास्ता वही है जहां समस्या, कारण, सुधार और संस्थागत प्रयास चारों साथ पढ़ाए जाएं। संतुलित सत्य ही विश्वास पैदा करता है, चयनित सत्य नहीं।
आम आदमी की सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि उसकी अनुभूति और आधिकारिक कथन में दूरी बढ़ती जा रही है। वह देखता है, समझता है, महसूस करता है, इसलिए जब पाठ्यक्रम से कोई असहज विषय हटता है तो उसे लगता है कि उसकी वास्तविकता को अनदेखा किया जा रहा है। यही कारण है कि यह बहस अकादमिक कम और सामाजिक अधिक बन गई है।
अंतत: पाठ हटाने या रखने से बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम आने वाली पीढ़ी को व्यवस्था का सजाया हुआ चित्र दिखाना चाहते हैं या उसे समझने और सुधारने की क्षमता देना चाहते हैं। भ्रष्टाचार पर चर्चा बंद करने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा पर, उसे ईमानदारी, संतुलन और समाधान के साथ पढ़ाने से नागरिक जिम्मेदारी जरूर मजबूत होगी।
यह जो पब्लिक है सचमुच सब जानती है। वह यह भी जानती है कि समस्या सार्वत्रिक है और समाधान भी सामूहिक ही होगा। इसलिए शिक्षा का काम सच से बचना नहीं, सच को समझने की भाषा देना है। तभी संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी बचेगी और लोकतंत्र का विश्वास भी।