-सुभाष मिश्र
अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप का सबसे प्रभावी हथियार यदि कोई रहा है तो वह टैरिफ नीति है एक ऐसा आर्थिक औजार जिसे उन्होंने कूटनीतिक दबाव, घरेलू राजनीति और वैश्विक व्यापार संतुलन तीनों के लिए इस्तेमाल किया। ट्रंप का दृष्टिकोण पारंपरिक मुक्त व्यापार की जगह अमेरिका फस्र्ट पर आधारित रहा, जिसके तहत उन्होंने अलग-अलग देशों पर समय-समय पर आयात शुल्क बढ़ाए, बदले और फिर कई बार नरम भी किए। इस उतार-चढ़ाव ने केवल व्यापारिक माहौल ही नहीं, बल्कि वैश्विक भरोसे की संरचना को भी प्रभावित किया।
टैरिफ को लेकर ट्रंप की रणनीति हमेशा पूर्वानुमेय नहीं रही। एक ओर वे अचानक कठोर शुल्क लागू करते हैं, दूसरी ओर वार्ता के संकेत देते हैं। अदालतों और संस्थागत जांच के बाद भी नीतिगत दिशा में तेजी से बदलाव उनके राजनीतिक शैली की पहचान बन गया। यही कारण है कि अमेरिकी न्यायिक हस्तक्षेप के बाद भी जब नए टैरिफ लागू करने या बढ़ाने की खबरें आती हैं, तो बाजार और कूटनीति दोनों में अस्थिरता बढ़ जाती है। व्यापारिक साझेदार देशों के लिए यह केवल आर्थिक मसला नहीं बल्कि नीति-विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
ट्रंप के बयान और नीति के बीच बार-बार दिखाई देने वाला अंतर भी चर्चा का विषय रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे कई बार वैश्विक विवादों को सुलझाने का श्रेय लेते हैं चाहे वह दक्षिण एशिया से जुड़े तनाव हों या अन्य क्षेत्रीय संकट और इसी के साथ उन्होंने शांति प्रयासों को लेकर खुद को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में प्रस्तुत किया। हालांकि इस दावे और वास्तविक कूटनीतिक प्रक्रिया के बीच दूरी को लेकर विशेषज्ञ लगातार सवाल उठाते रहे हैं। नोबेल शांति पुरस्कार की आकांक्षा से जुड़ी चर्चाएं भी इसी राजनीतिक छवि निर्माण का हिस्सा मानी जाती हैं।
असल में टैरिफ नीति को केवल ट्रंप के व्यक्तिगत निर्णय के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे अमेरिकी औद्योगिक हित, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबाव, घरेलू रोजगार की राजनीति और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे कई कारक जुड़े रहते हैं। चीन के साथ व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, यूरोप के साथ शुल्क विवाद और भारत जैसे देशों के साथ बाजार पहुंच को लेकर बातचीत इन सभी में टैरिफ एक वार्ताकारी हथियार बनकर उभरा। इस प्रक्रिया में अमेरिका अपनी आर्थिक शक्ति का उपयोग करते हुए वैश्विक व्यापार नियमों को अपने पक्ष में ढालने की कोशिश करता दिखता है। भारत के संदर्भ में यह स्थिति और महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार और उभरती औद्योगिक शक्ति है, इसलिए अमेरिकी टैरिफ नीति का असर यहां निर्यात, आईटी सेवाओं, कृषि उत्पादों और विनिर्माण पर सीधे पड़ता है। जब शुल्क बढ़ते हैं तो प्रतिस्पर्धा कठिन होती है, और जब वार्ता आगे बढ़ती है तो अवसर भी खुलते हैं। यानी ट्रंप की नीति जोखिम और अवसर दोनों का मिश्रण है।
अंतत: प्रश्न केवल टैरिफ का नहीं बल्कि वैश्विक व्यवस्था में नेतृत्व की विश्वसनीयता का है। जब दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति का राष्ट्रपति बार-बार नीति और बयान बदलता है, तो उसका प्रभाव बाजारों, निवेश, कूटनीति और रणनीतिक संबंधों पर व्यापक रूप से पड़ता है। ट्रंप का टैरिफ कार्ड इसी व्यापक परिघटना का प्रतीक है जहां आर्थिक नीति राजनीति का विस्तार बन जाती है और राजनीति वैश्विक व्यापार की दिशा तय करने लगती है। यही कारण है कि ट्रंप युग की टैरिफ बहस केवल शुल्क दरों की चर्चा नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की कहानी भी है।
टैरिफ का ट्रंप कार्ड और वैश्विक अनिश्चितता

23
Feb