-सुभाष मिश्र
नई जनरेशन की शादी की कोई जल्दी नहीं है। यदि शादी हो भी जाए, तो बच्चा जल्दी नहीं चाहिए। देश में पहले नारा था— दो या तीन बस, फिर समय के साथ नारा बदला— दो हम, दो हमारे। उसके बाद सिंगल चाइल्ड का कॉन्सेप्ट आया। अब नई पीढ़ी के लोग एक नया ही वाक्य गढ़ रहे हैं— हम हमारे, तुम तुम्हारे। यह केवल भाषा का बदलाव नहीं है, यह उस सामाजिक सोच का संकेत है जो विवाह और संतान को अब जीवन की अनिवार्य शर्त मानने से इंकार कर रही है।
मध्यवर्गीय माता-पिता इस बदलाव से सबसे अधिक असहज हैं। वे बच्चों के विवाह न करने या विवाह के बाद बच्चा न पैदा करने के फैसले को स्वीकार नहीं कर पा रहे। सवाल वही पुराना है—कौन पाले जिम्मेदारी, कौन झेले केयरिंग की मुसीबत? पति-पत्नी दोनों अगर कामकाजी हैं तो बच्चे को कौन संभालेगा? सामाजिक ढांचे में आज भी यह मान्यता बनी हुई है कि बच्चा मां का होता है, इसलिए नौकरी, करियर या काम से ब्रेक भी वही ले। पिता का जीवन तो लगभग अप्रभावित ही रहता है। यही असमानता नई पीढ़ी को सबसे अधिक चुभ रही है।
कोरोना के बाद वर्क फ्रॉम होम ने इस हकीकत को और नंगा कर दिया। एक ही घर में, अलग-अलग कमरों में, लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन के आगे झुके पति-पत्नी जिनके पास न समय है, न ऊर्जा। उनसे यह उम्मीद करना कि वे बच्चे की परवरिश को प्राथमिकता दें, खुद में एक विडंबना है। वीकेंड पर एंजॉयमेंट, बिना जिम्मेदारी कहीं भी घूमने-फिरने, दोस्तों के साथ पार्टी करने और अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी, यह सब नई पीढ़ी अब छोडऩा नहीं चाहती। उनके लिए बच्चा ‘भगवान की देन’ नहीं, बल्कि एक लाइफ-टाइम प्रोजेक्ट है, जिसकी कीमत वे पहले गिनना चाहते हैं।
आबादी के मामले में भारत दुनिया में अव्वल है, लेकिन इसके बावजूद एक नया वर्ग उभर रहा है जिसे विवाह से ही परहेज है। कई धर्मगुरु अधिक बच्चे पैदा करने का उपदेश दे रहे हैं, लेकिन पढ़े-लिखे युवक-युवतियां इन बातों को उसी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसे वे माता-पिता की यह सलाह कि शादी के तुरंत बाद बच्चा हो जाना चाहिए। आस्था और आदेश की जगह अब योजना, खर्च और मानसिक स्वास्थ्य ने ले ली है।
यह बदलाव केवल भावनात्मक या वैचारिक नहीं है, इसके पीछे ठोस सामाजिक आंकड़े हैं। भारत की कुल प्रजनन दर अब दो से नीचे आ चुकी है। शहरी भारत में यह और भी कम है। शहरों में औसतन एक-डेढ़ बच्चे का मॉडल सामान्य होता जा रहा है, जबकि गांवों में भी बड़े परिवार अब अपवाद बनने लगे हैं। शादी की उम्र बढ़ रही है, खासकर पढ़ी-लिखी, कामकाजी महिलाओं में। शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ यह तय करने की क्षमता भी बढ़ी है कि कब शादी करनी है, करनी भी है या नहीं, और बच्चा चाहिए भी या नहीं।
विवाह नामक संस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। बहुत से युवाओं को यह संस्था अब बराबरी की नहीं, बल्कि समझौते की लगती है। इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर झिझक कम हो रही है। वहीं विवाहित जीवन में भी निजी स्पेस, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के सवालों पर टकराव बढ़ रहा है। तलाक के आंकड़े भले ही अभी कम हों, लेकिन रिश्तों में चुपचाप सहने की परंपरा कमजोर हुई है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्त्री अब किसी भी तरह की गुलामी, हिंसा या अपमान को सहने को तैयार नहीं। अपने पैसे पर खड़ी स्त्री अब रिश्ते को जरूरत नहीं, विकल्प की तरह देख रही है।
दरअसल यह पूरी बहस नैतिकता या परंपरा की नहीं है, यह सत्ता और नियंत्रण की बहस है। किसका शरीर, किसका समय और किसकी जि़ंदगी। नई पीढ़ी इस नियंत्रण से बाहर निकलना चाहती है। वह यह मानने से इनकार कर रही है कि जीवन का एक ही तयशुदा रास्ता होता है पढ़ाई, नौकरी, शादी, बच्चा। वह सवाल पूछ रही है और यही सवाल आज के समाज को सबसे अधिक बेचैन कर रहे हैं।