सुभाष मिश्र
कभी गोलियों की आवाज़, बारूदी सुरंगों और लाल आतंक से कांपने वाला बस्तर आज एक नए मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। जंगलों की खामोशी में अब विकास की हलचल सुनाई देने लगी है। सडक़ें बन रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं, पर्यटन की संभावनाएँ आकार ले रही हैं और सबसे बड़ी बात यह कि लोगों के भीतर धीरे-धीरे भय की जगह विश्वास लौट रहा है।
लेकिन यह बदलाव केवल नेताओं के भाषणों और सरकारी दावों तक सीमित नहीं रह सकता। बस्तर का असली परिवर्तन तब माना जाएगा जब बरसात के दिनों में बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और अबूझमाड़ के वे गांव देश से कटना बंद होंगे, जहाँ आज भी बारिश आते ही सडक़ें बह जाती हैं और लोग हफ्तों तक अलग-थलग पड़ जाते हैं।
आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहाँ कोई बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल तक पहुँचाने के लिए खटिया, मोटरसाइकिल या कंधों का सहारा लेना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं को घंटों पैदल चलना पड़ता है। कई गाँव ऐसे हैं जहाँ एम्बुलेंस पहुँच ही नहीं सकती। इसलिए बस्तर में विकास का सबसे बड़ा पैमाना यही होगा कि क्या वहाँ के लोगों तक सडक़, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और संचार वास्तव में पहुँच पाया या नहीं।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रस्तुत च्बस्तर २.०ज् विजन डॉक्यूमेंट उम्मीद जरूर जगाता है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सौंपा गया यह विजन केवल एक योजना नहीं, बल्कि दशकों के संघर्ष के बाद उभरती नई उम्मीद का दस्तावेज़ माना जा रहा है। इसमें सडक़, रेल, एयर कनेक्टिविटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, सिंचाई और निवेश जैसे कई बड़े लक्ष्य शामिल हैं।
दरअसल, बस्तर की कहानी केवल नक्सलवाद की कहानी नहीं रही। यह उस ऐतिहासिक उपेक्षा की कहानी भी है जिसमें शासन और विकास की पहुँच जंगलों के भीतर बसे आदिवासी समाज तक कभी पूरी तरह नहीं पहुँच पाई। इसी खालीपन का फायदा माओवादी संगठनों ने उठाया। गरीबी, बेरोजगारी और प्रशासनिक दूरी ने नक्सलवाद को जमीन दी। परिणाम यह हुआ कि बस्तर दशकों तक देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बना रहा।
हालांकि अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों, नए कैंपों, सडक़ और मोबाइल नेटवर्क के विस्तार तथा आत्मसमर्पण नीति ने माओवादी नेटवर्क को कमजोर किया है। बस्तर के लोगों के भीतर भी अब यह भरोसा पैदा होने लगा है कि नक्सलवाद का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। लोगों के मन में एक तरह का सुकून लौटा है।
लेकिन असली सवाल अब शुरू होता है—क्या नक्सलमुक्त बस्तर वास्तव में विकसित बस्तर बन पाएगा? क्योंकि केवल सुरक्षा अभियान स्थायी समाधान नहीं होते। विकास तभी दिखाई देता है जब आम आदमी की जिंदगी बदलती है। जब गांव तक सडक़ पहुँचती है, जब बच्चे नियमित स्कूल जा पाते हैं, जब अस्पतालों में डॉक्टर मौजूद रहते हैं, जब लोगों को साफ पानी मिलता है और जब युवाओं को रोजगार के अवसर मिलते हैं।
आज भी बस्तर के कई हिस्सों में यह बुनियादी बदलाव अधूरा है। यही वजह है कि सरकारी दावों के बीच जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाल ही में बैलाडीला क्षेत्र से दो ट्रकों में लौह अयस्क की कथित तस्करी पकड़े जाने की खबर यह भी दिखाती है कि बस्तर केवल विकास की कहानी नहीं, बल्कि संसाधनों की लड़ाई का क्षेत्र भी बना हुआ है। खनिज संपदा से समृद्ध यह इलाका लंबे समय से बाहरी हितों और स्थानीय जरूरतों के बीच संघर्ष का केंद्र रहा है।
बस्तर का मूल स्वभाव हमेशा शांत, सामुदायिक और प्रकृति से जुड़ा रहा है। नक्सलवाद ने इस सामाजिक संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। अब जब हिंसा कम हो रही है तो यह अवसर है कि बस्तर अपनी मूल पहचान को फिर से हासिल करे। लेकिन इसके लिए केवल खनन और बड़े निवेश पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरी यह है कि विकास का केंद्र वहां का आदिवासी समाज बने। जल, जंगल और जमीन पर उनका अधिकार सुरक्षित रहे। स्थानीय लोगों को केवल दर्शक नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया का भागीदार बनाया जाए। क्योंकि इतिहास गवाह है कि संवाद और संवेदनशीलता के बिना थोपा गया विकास नए असंतोष को जन्म देता है।
पर्यटन, कृषि, वन उत्पाद, हस्तशिल्प और स्थानीय संस्कृति बस्तर की सबसे बड़ी ताकत हैं। चित्रकोट, तीरथगढ़, कांगेर घाटी और अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र देश-दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर बड़ी पहचान बना सकते हैं। यदि बुनियादी ढांचा मजबूत होता है तो यह इलाका इको-टूरिज्म और सांस्कृतिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और पलायन कम होगा।
आज बस्तर एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। बंदूक की आवाज़ धीमी पड़ी है, लेकिन विकास की असली परीक्षा अभी बाकी है। सडक़ बनाना आसान है, भरोसा बनाना कठिन। पुल-पुलिया खड़ी करना संभव है, लेकिन लोगों के मन में राज्य के प्रति विश्वास पैदा करना सबसे बड़ी चुनौती है।
यदि सरकार सुरक्षा, विकास और संवेदनशीलता इन तीनों के संतुलन को बनाए रखती है, तो आने वाले वर्षों में बस्तर सचमुच देश के सबसे विकसित और संभावनाशील संभागों में शामिल हो सकता है। तब च्बदलता बस्तरज् केवल एक सरकारी नारा नहीं रहेगा, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक विकास मॉडल की एक सफल मिसाल बन जाएगा।