-सुभाष मिश्र
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रश्न नया नहीं है, लेकिन हर बार यह प्रश्न अपने समय के राजनीतिक संदर्भों के साथ और अधिक जटिल होता गया है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा महिला आरक्षण कानून में संशोधन को मंजूरी और उसके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का निर्णय एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ले आया है। यह कदम निस्संदेह ऐतिहासिक महत्व का हो सकता है, लेकिन इसके समय और संदर्भ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता खासकर तब, जब पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मियां अपने चरम पर हैं।
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका अब केवल सहायक या प्रतीकात्मक नहीं रह गई है। पिछले कुछ चुनावों में महिलाओं की भागीदारी और मतदान प्रतिशत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे एक निर्णायक मतदाता समूह के रूप में उभर चुकी हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं, आरक्षण और आर्थिक सहायता जैसे वादे करना एक स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया भी है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा महिला आरक्षण विधेयक को आगे बढ़ाने के साथ-साथ व्यापक स्तर पर महिला संपर्क अभियान की तैयारी इसी बदलते परिदृश्य का संकेत है।
हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस पहल को केवल राजनीतिक रणनीति के चश्मे से न देखा जाए, बल्कि इसके वास्तविक प्रभाव और उद्देश्य पर भी विचार किया जाए। महिला आरक्षण का मुद्दा दशकों से लंबित रहा है। कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन यह विधेयक हर बार राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच कहीं न कहीं ठहर गया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आज जो तेजी दिखाई जा रही है, वह क्या वास्तविक प्रतिबद्धता का परिणाम है या फिर चुनावी समय-निर्धारण का हिस्सा।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा पश्चिम बंगाल के संदर्भ में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण, मासिक आर्थिक सहायता और सुरक्षा से जुड़े वादे इस व्यापक प्रवृत्ति को और स्पष्ट करते हैं, जहां चुनावी राजनीति में ‘लाभार्थी वर्गÓ को केंद्र में रखकर घोषणाएं की जाती हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है पहले गरीब, किसान, दलित और आदिवासी वर्गों को लेकर इसी तरह की राजनीति होती रही है। अब महिलाएं भी उसी राजनीतिक विमर्श का एक केंद्रीय हिस्सा बनती दिखाई दे रही हैं।
लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न ‘सशक्तिकरणÓ और ‘प्रतीकवादÓ के बीच संतुलन का है। क्या महिला आरक्षण वास्तव में महिलाओं को निर्णय लेने की शक्ति देगा, या यह केवल प्रतिनिधित्व की संख्या बढ़ाने तक सीमित रह जाएगा? क्या यह पहल समाज और राजनीति में वह संरचनात्मक बदलाव ला पाएगी, जिसकी लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही है?
इन सवालों के जवाब केवल विधेयक पारित होने से नहीं मिलेंगे, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन और सामाजिक स्वीकृति से तय होंगे। यदि आरक्षण के माध्यम से नई नेतृत्वकारी महिलाएं उभरती हैं, जो स्वतंत्र और सशक्त निर्णय ले सकें, तभी इसे वास्तविक परिवर्तन माना जा सकेगा।
यह भी विचारणीय है कि महिलाओं को लेकर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता क्या वास्तव में सामाजिक मानसिकता में बदलाव का संकेत है, या यह केवल एक अनिवार्य चुनावी रणनीति बन चुकी है। संभवत: यह दोनों का संगम है एक ओर महिलाएं शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इस शक्ति को पहचानते हुए उन्हें अपने एजेंडे के केंद्र में ला रहे हैं।
अंतत:, महिला आरक्षण का यह दौर भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। यह अवसर है प्रतिनिधित्व को अधिक समावेशी बनाने का, नीतियों को संवेदनशील और संतुलित दिशा देने का, और समाज में लैंगिक समानता को वास्तविक रूप से स्थापित करने का।
लेकिन यह अवसर तभी सार्थक होगा, जब यह पहल केवल चुनावी लाभ तक सीमित न रहकर एक स्थायी सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का आधार बने। अन्यथा, यह भी उन अनेक प्रयासों की तरह इतिहास के पन्नों में एक अधूरी संभावना बनकर रह जाएगा।