-सुभाष मिश्र
कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता है –
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो
क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
यह कविता हमे अक्सर यह याद दिलाती है कि यदि पड़ोस में आग लगी हो तो यह मान लेना मूर्खता है कि वह केवल वहीं तक सीमित रहेगी। आज की वैश्विक दुनिया में यह चेतावनी और भी अधिक सटीक प्रतीत होती है। जब संयुक्त राज्य अमेरिका और इजऱाइल ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई तेज की, तब दुनिया के बहुत से लोगों को लगा कि यह एक दूर का संघर्ष है, जिसका उनके दैनिक जीवन से कोई संबंध नहीं होगा। लेकिन कुछ ही समय में यह भ्रम टूटने लगा। तेल और गैस की आपूर्ति पर असर पड़ा और उसके साथ ही दुनिया के कई देशों में ईंधन संकट की आशंका बढऩे लगी। भारत में घरेलू रसोई गैस को लेकर जो बेचैनी और घबराहट दिखाई दे रही है, वह इसी वैश्विक अस्थिरता की प्रतिध्वनि है।
दरअसल आज की दुनिया को अक्सर ‘ग्लोबल विलेजÓ कहा जाता है। इसका अर्थ केवल तकनीकी या सांस्कृतिक जुड़ाव नहीं है, बल्कि आर्थिक और ऊर्जा निर्भरता भी उतनी ही गहरी है। ऊर्जा के क्षेत्र में यह परस्पर निर्भरता सबसे अधिक दिखाई देती है। दुनिया के तेल और गैस संसाधनों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र में केंद्रित है-जैसे सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान। इन क्षेत्रों में युद्ध या तनाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। जहाजों के मार्ग, बीमा लागत, आपूर्ति शृंखला और कीमत सब कुछ प्रभावित होता है। परिणामस्वरूप जो संकट हजारों किलोमीटर दूर पैदा होता है, उसकी आंच भारत के रसोईघर तक पहुंच जाती है।
भारत की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि ऊर्जा के मामले में वह बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी आयातित गैस या आयातित कच्चे तेल से तैयार होता है। भारत में एलपीजी वितरण का मुख्य ढांचा सरकारी कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के माध्यम से चलता है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश में एलपीजी के उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 30 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इसका बड़ा कारण पिछले वर्षों में चलाई गई योजनाएँ हैं, विशेष रूप से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, जिसके तहत करोड़ों गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन दिया गया।
इन योजनाओं ने निस्संदेह एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन किया है। कभी ग्रामीण भारत में रसोई का अर्थ लकड़ी, गोबर के उपले या कोयले से जलने वाले चूल्हे हुआ करते थे। धुएँ से भरे रसोईघर और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ सामान्य बात थीं। लेकिन गैस कनेक्शन के विस्तार ने घरेलू जीवन को अधिक सुविधाजनक और अपेक्षाकृत स्वच्छ बनाया। अब स्थिति यह है कि शहरों से लेकर गांवों तक गैस पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। यही कारण है कि जब गैस आपूर्ति को लेकर जरा भी अनिश्चितता पैदा होती है तो उसका असर तुरंत दिखाई देने लगता है।
वर्तमान परिस्थिति में सरकार यह आश्वासन दे रही है कि एलपीजी की आपूर्ति में कोई कमी नहीं है और पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। अधिकारियों के अनुसार लाखों सिलेंडरों की बुकिंग सामान्य ढंग से हो रही है और वितरण व्यवस्था भी चालू है। जमाखोरी और अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी जा रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह इन दावों से पूरी तरह मेल नहीं खाती। कई शहरों में सुबह से गैस एजेंसियों के बाहर कतारें लगने की खबरें हैं। कहीं सॉफ्टवेयर या बुकिंग सिस्टम ठप पड़ गया, तो कहीं सिलेंडर की आपूर्ति देर से पहुंच रही है। इस स्थिति ने लोगों के मन में अनिश्चितता और घबराहट को जन्म दिया है।
यह घबराहट केवल वास्तविक कमी से नहीं, बल्कि संभावित संकट की आशंका से भी पैदा होती है। जब लोगों को लगता है कि आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ सकती है, तो वे पहले से अधिक सिलेंडर जमा करने लगते हैं। यही पैनिक बाइंग बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर देता है। होटल और छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी गैस की उपलब्धता को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि उनकी रोजमर्रा की गतिविधियाँ उसी पर निर्भर हैं।
इस संकट की जड़ में केवल युद्ध नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा संरचना की एक बुनियादी कमजोरी भी है-अत्यधिक आयात निर्भरता। यदि वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होती है या समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ता है, तो उसका असर तुरंत भारत जैसे देशों पर पड़ता है। खाड़ी क्षेत्र से आने वाले तेल और गैस के टैंकरों के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि वहां सैन्य तनाव बढ़ता है, तो न केवल आपूर्ति बाधित हो सकती है बल्कि परिवहन लागत और बीमा प्रीमियम भी बढ़ जाते हैं।
भारत की विदेश नीति इस संदर्भ में संतुलन की नीति अपनाने की कोशिश करती है। एक ओर उसके रणनीतिक संबंध संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी देशों से हैं, तो दूसरी ओर ऊर्जा और व्यापार के लिहाज से उसके संबंध खाड़ी देशों और ईरान जैसे देशों से भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भारत अक्सर इस तरह के संघर्षों में संतुलित रुख अपनाता है और शांति की अपील करता है। लेकिन कूटनीतिक संतुलन के बावजूद आर्थिक प्रभावों से बच पाना आसान नहीं होता।
वर्तमान स्थिति हमें यह भी याद दिलाती है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति का केंद्रीय प्रश्न है। यदि घरेलू ऊर्जा स्रोतों-जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, बायोगैस, या स्थानीय गैस उत्पादन को पर्याप्त रूप से विकसित नहीं किया गया, तो भविष्य में ऐसे संकट बार-बार सामने आ सकते हैं। भारत सौर ऊर्जा और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन घरेलू रसोई ईंधन के स्तर पर अभी भी बड़ी आबादी एलपीजी पर निर्भर है।
इसलिए आज जो गैस संकट दिखाई दे रहा है, वह केवल एक तात्कालिक समस्या नहीं बल्कि एक चेतावनी भी है। यह हमें बताता है कि वैश्विक राजनीति और युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे आम लोगों के जीवन, रसोई और दैनिक खर्च तक को प्रभावित करते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता और विविध स्रोतों की व्यवस्था कितनी आवश्यक है।
अंतत: यह समय केवल घबराहट का नहीं बल्कि दूरदर्शी नीति का है। सरकार को एक ओर तत्काल आपूर्ति और वितरण व्यवस्था को मजबूत करना होगा, ताकि लोगों का भरोसा बना रहे। दूसरी ओर दीर्घकालिक रणनीति के तहत ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन को बढ़ाना होगा। क्योंकि यदि दुनिया सचमुच एक वैश्विक गांव है, तो कहीं भी लगी आग की लपटें देर-सवेर हर घर की देहरी तक पहुंच सकती हैं और आज का गैस संकट उसी सच्चाई की याद दिला रहा है।